वो इमाम जिसकी इबादत हाथी हैं

हाथी इमेज कॉपीरइट Chandan

50 साल के अख़्तर का हाथियों से याराना 12 बरस की उम्र से ही शुरू हुआ. पटना के सटे फुलवारी शरीफ़ के मीरग्यासचक के रहने वाले अख़्तर के पड़ोस में एक महावत रहता था.

गाहे बगाहे जब कभी वो महावत हाथी अपने घर ले आता, अख़्तर उसे घंटो देखते रहते . अख़्तर के जमींदार परिवार को ये बात रास नहीं आई.

नतीजा ये हुआ कि अख़्तर को जहां हाथी होने का पता लगता, वह वहां के लिए घर से भाग जाते.

बकौल अख़्तर, “कई बार घर पकड़कर लाया गया लेकिन जब बात नहीं बनी तो अब्बा ने एक दिन पूछा कि क्या करें कि तुम घर पर रहो. मैने जवाब दिया हाथी ला दीजिए और उसके बाद मुझे हाथी खरीदकर दिया गया.’’

अख़्तर के पास फिलहाल दो हाथी है. हाथी से इस इश्क के चलते अख़्तर कंगाल होने की हालत में हैं.

पुरखों से उनके हिस्से में आई 30 बीघा जमीन बिकते-बिकते सिर्फ़10 बीघा बची है.

अख़्तर की बेगम और तीन बच्चे उनसे दूर रहते है. लेकिन अख़्तर की जान अपने हाथियों में ही बसती है.

इमेज कॉपीरइट Chandan

जायदाद में हिस्सा

वो कहते है, “ये हाथी तो मेरा परिवार हैं और इनका भी मेरी जायदाद पर पूरा हक़ है.”

अख़्तर बिहार में एक हाथी-गांव बसाना चाहते है. ऐसी जगह जहां हाथियों की सुरक्षा के लिए कॉल सेंटर, महावतों की ट्रेनिंग से लेकर हाथी की सेहत तक का प्रबंध हो.

बिहार सरकार ने इसके लिए 2013 में ही सहमति दे दी थी हालांकि अभी तक काम शुरू नहीं हो सका है.

बिहार सरकार के मुख्य वन्य प्राणी प्रतिपालक एस एस चौधरी के मुताबिक, “हमने 25 एकड़ ज़मीन देख ली है और हाथी गांव जल्द बसाने की कोशिश है. अख़्तर इमाम की इसमें बड़ी भूमिका है.”

इमेज कॉपीरइट Getty Images

हाथी सेंटर

इस बीच अख़्तर की संस्था एरावत ने हाथियों के लिए एक सेंटर बोधगया में खोला है जिसका पूरा ख़र्चा फ़िलहाल अख़्तर उठा रहे है.

2013 के वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में महज़ 64 हाथी बचे है.

दरअसल 2002 से हाथियों की ख़रीद बिक्री पर लगी रोक से हाथी मालिकों और हाथियों की मुश्किलें बढ़ा गई हैं.

इस बदलाव से महावतों का धंधा भी बैठ गया. महावतों के गांव उजड़ गए.

इमेज कॉपीरइट Reuters

हाथी ही नहीं तो महावत कैसे?

23 साल के सोनू आरा के रानीसागर गांव के है. रानीसागर गांव में तकरीबन 200 घरों में महावत का काम ही पुश्त दर पुश्त होता आया था. पर अब नहीं.

सोनू बताते है, “परिवार के 4 भाई इस काम में दिल्ली, जयपुर, करनाल में लगे है लेकिन ज़्यादातर लोगों ने काम छोड़ दिया. हाथी ही नहीं बचे तो लोग महावती करके क्या पेट पालेंगें.”

जहां सोनू को अपने पेशे पर ये संकट मंडराता दिख रहा है वही अख़्तर बातचीत में इससे भी बड़े संकट को जाहिर करते है.

वो कहते है, “हाथी का खाना, उसका घर आप सब छीन रहे है. अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो हाथी किताबों में ही रह जाएगें. फिर कैसे बनाएगें आप हाथी मेरे साथी जैसी फ़िल्म. कैसे हाथी दिखाएगें आप अपने बच्चों को ? ”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार