काबुल वाया कोलकाता..तस्वीरों में

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काबुलीवाला नाम सुनते ही बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं.

रविंद्रनाथ टैगोर की कहानी 'काबुलीवाला' से प्रेरित दो फ़ोटो जर्नलिस्ट मोस्का नज़ीब व नाज़ेश अफ़रोज़ की फ़ोटो प्रदर्शनी दिल्ली के मैक्स मुलर भवन में लगी थी.

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कहानी का मुख्य पात्र काबुलीवाला बच्चों को खूबसूरत खिलौने देता है, और जिसके आने का इंतज़ार बच्चे महीनों-महीनों तक करते हैं.

पर अब वो दौर नहीं रहा. अब बच्चों के खिलौने और कहानियां दोनों बदल गई हैं.

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खिलौनों की जगह वीडियो गेम्स और कहानियों की जगह कार्टून चैनल्स ने ले ली है.

पहले कलकत्ता और ब्रिटिश इंडिया की राजधानी के नाम से जाना जाने वाला यह शहर कोलकाता, अफ़ग़ानों के लिए अनजान नहीं रहा है.

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19वीं सदी में जब ब्रिटेन व अफ़ग़ानिस्तान में जंग चल रही थी, तब कई अफ़ग़ान इस शहर में व्यापार करने के लिए आ बसे थे.

कई सदियों से अफ़गान भारत यात्रा करते रहे हैं, पर 1892 में रविंद्रनाथ टैगोर की कहानी 'काबुलीवाला' से उन्हें रुमानी और स्थाई पहचान मिली.

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फ़ोटोजर्नलिस्ट मॉस्का और नाज़ेश अफ़रोज़ ने अपने इस तीन साल लम्बे प्रोजेक्ट में फ़ोटोग्राफ़ी के ज़रिए समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तन की कहानी बयां करने की कोशिश की है.

कोलकाता के रहने वाले नाज़ेस अफ़रोज़ 30 सालों से प्रिंट व ब्रॉडकास्ट पत्रकारिता में हैं.

नाज़ेस का कहना है इस प्रदर्शनी के ज़रिए वे उस शहर को शुक्रिया कहना चाहते हैं, जिसकी वजह से वो आज इस मक़ाम पर हैं.

पर पिछले कुछ अरसे से उन्होंने इस शहर को तेजी से बदलते हुए देखा है और इस प्रदर्शनी के ज़रिए वे उन खोती जा रही यादों को ताज़ा रखने की कोशिश कर रहे हैं.

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मोस्का नज़ीब, अफगान हैं और उन्होंने लगभग अपनी सारी ज़िंदगी भारत में बिताई है.

उनका कहना है, "मातृभूमि से दूर रहते हुए मेरा ध्यान हमेशा नई जगह व नई पहचान ने खींचा, इसी वजह से मैं आज के भारत में रह रहे सबसे पुराने अफ़गान समाज की तस्वीरें खींचने की तरफ प्रेरित हुई."

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यह प्रदर्शनी दर्शकों को मानव संबंधों और अपनी पहचान खोने के नुकसान जैसे मुद्दों और अपनेपन की नई भाषा खोजने के लिए प्रेरित करेगी.

यहां 50 तस्वीरें प्रदर्शित की गई हैं, प्रदर्शनी को तीन भागों में बांटा गया है, जिसकी शुरुआत अफ़ग़ान समाज पर केंद्रित तस्वीरों से हुई है.

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अफ़ग़ानिस्तान में जन्मी मोस्का भारत में रही हैं.

मोस्का पिछले कई सालों से तस्वीरें खींच रही हैं. उनकी तस्वीरें कई प्रकाशनों और बीबीसी वेबसाइट पर भी प्रकाशित हो चुकी है.

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वो बीबीसी के साथ काम कर चुकी हैं. यह उनकी पहली फ़ोटो प्रदर्शनी है.

अफ़रोज़ कोलकाता में प्रिंट और प्रसारण पत्रकार हैं व पिछले कई सालों से फ़ोटोग्राफ़ी कर रहे हैं.

उन्होंने कोलकाता के एक अख़बार से काम शुरू किया और बाद में बीबीसी के साथ भी जुड़े.

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