भारत 'कांटे से कांटा' निकाल सकता है?

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ज़्यादातर भारतीय नेताओं की दिक्कत है कि वह बयान देने से पहले शब्दों के ठीक चयन पर ध्यान नहीं देते.

'बड़बोले' नेताओं की इस जमात में शामिल होने वाले नए महानुभाव हैं, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर.

एक निजी टीवी चैनल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बेवजह छाती ठोकते हुए उन्होंने ऐसी बात कह दी जिससे सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी और विश्लेषकों, कूटनीतिज्ञों की आखें खुली रह गईं.

इसके साथ ही भारत चरमपंथ से कैसे निपटता है, इसे लेकर उनके विचार और वाक्य विन्यास की गड़बड़ी ने सीमापार ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए.

'नीति की घोषणा ऐसे नहीं'

पर्रिकर के अनुसार चरमपंथ को जड़ से ख़त्म करने के लिए 'कांटे से कांटा निकालने' के तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए.

उनके शब्दों में भारत को 'चरपंथियों का मुकाबला चरमपंथियों से' करना चाहिए.

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उनके अनुसार यह चरमपंथ से मुकाबले के बहुत से तरीकों में से एक है. दूसरा तरीका कूटनीति और 'दबाव बनाना' है.

उन्होंने कहा कि सशस्त्र सेनाएँ चरमपंथियों को उनके गुप्त ठिकानों में सफलतापूर्वक 'निशाना बनाएँ' और यह भी कहा कि सेना से 'हथियारबंद घुसपैठियों को गोली मारने' को कहा गया है.

इस टिप्पणी से पाकिस्तान में तूफ़ान खड़ा हो गया. पाकिस्तान महीनों से आरोप लगा रहा था कि भारत (ख़ासकर रॉ) का हाथ वहां हो रही चरमपंथी वारदातों में है.

अंतरराष्ट्रीय जगत में विश्लेषक, कूटनीतिज्ञ और पत्रकार भारत को संदेह की नज़रों से देखने लगे.

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ज़ाहिर है पर्रिकर ने जो कहा उसमें कल्पना ज़्यादा थी और नीति कम.

साथ ही यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे नेता किसी कार्यक्रम में भावनाओं में बहकर बेपरवाह बोलने लगते हैं.

सरकार की नीतियों की घोषणा अक्सर निजी टीवी पर दीर्घकालिक चर्चाओं या रैलियों में नहीं की जाती है.

उनकी घोषणा या तो संसद में की जाती है या फिर किसी औपचारिक बैठक में पूरी गंभीरता के साथ.

'छद्म युद्ध की बात हुई ही नहीं'

भारत अब तक उस स्थिति में नहीं आया है कि अगर सरकार किसी तरह का गुप्त अभियान चला रही हो तो वह एक नीतिगत बयान जारी कर उसकी घोषणा करे.

दूसरे शब्दों में भारत ऐसा देश नहीं है जो छद्म युद्ध की घोषणा करे और वह भी सार्वजनिक रूप से.

ईमानदारी से कहूं तो ज़्यादातर भारतीय इससे ख़ुश ही होंगे कि भारत में चरमपंथ को बढ़ावा देने वालों का भी हिसाब चुकता कर दिया जाए.

असलियत यह है कि ऐसी बाते होती हैं कि चरमपंथ के प्रायोजकों को भारी कीमत अदा करनी पड़े.

लेकिन भारत का अब तक इससे निपटने का तरीका लगभग पूरी तरह पारंपरिक है और इसलिए नीरस भी है.

ये तरीके हैं- आक्रामक कूटनीति, पानी का एक हथियार की तरह इस्तेमाल, हवाई ताकत का इस्तेमाल कर 'सटीक हमले' करना आदि.

और तो और बंद कमरों के अंदर भी रणनीति बनाते हुए छद्म युद्ध की बात कभी भी दृढ़ मत के साथ नहीं की गई है.

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इसकी वजह स्पष्ट है. भारत के पास न तो ऐसी क्षमता है और न ही ज़रिये कि वह पड़ोसी देश में वही कर सके जो वो मानता है कि पड़ोसी देश भारत में कर रहा है.

इसके अलावा चरमपंथ के ख़िलाफ़ पलटकर हमला करने की भारत की क्षमता, गुंजाइश और राजनीतिक हिम्मत को लेकर भी गंभीर सवाल हैं.

हालांकि कुछ लोग उम्मीद कर रहे थे कि पहले की सरकारों के विपरीत मोदी सरकार जैसे को तैसा की तर्ज पर जवाब देगी.

लेकिन जंग पानी के नल या बिजली के स्विच की तरह नहीं होती- जिसे खोला या बंद किया जा सकता हो.

इसके लिए कई साल कोशिश करनी पड़ती है, जो भारत ने नहीं की है.

'बस कोरी डींग'

अगर भारत वह कर रहा है जिसका इस पर आरोप लगाया जा रहा है तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी गुप्त चाल होगी.

इसका मतलब यह हुआ कि भारत ने उस पर हमला करने वाले चरमपंथियो को बदल दिया है और अब वह उन्हें तैयार करने वालों का ही नुक़सान कर रहे हैं.

आह, यह तो बॉलीवुड फ़िल्म का मसाला है. एजेंट विनोद और एक था टाइगर असली ज़िंदगी में नहीं होते, चाहे हम जितना भी चाहें.

यकीनन एक हद तक चरमपंथियों को ख़त्म करने के अपने मक़सद में मोदी सरकार की नीति सक्रियता वाली है.

चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों को खुली छूट देकर- मोदी सरकार दृढ़ दिखती है.

विदेश नीति में भी पारंपरिक लापरवाही के विपरीत वह आक्रामक है- नियंत्रण रेखा के उल्लंघन पर.

यहां तक तो पर्रिकर की टिप्पणी पर भरोसा किया जा जा सकता है. लेकिन इसके अलावा, बाक़ी सब तो सब कोरी डींग थी.

(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

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