'अब प्रियंका के बिना बाज़ी नहीं मार सकते गांधी'

  • 2 जून 2015
सोनिया, राहुल, प्रियंका गांधी, रॉबर्ट वाड्रा इमेज कॉपीरइट Reuters

साल 2004 के आम चुनाव के समय ये महसूस किया गया कि कांग्रेस की हालत ख़राब है. पार्टी ने एक प्रोफ़ेशनल एजेंसी की सेवाएं लीं जिसने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बताया कि वह अकेले बीजेपी के बड़े नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को टक्कर नहीं दे सकती हैं.

एजेंसी का कहना था कि अगर सोनिया के नेतृत्व में राहुल और प्रियंका की संयुक्त ताकत को जोड़ा जाए, तो हो सकता है कि कांग्रेस वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए के सामने खड़ी हो पाए.

आधिकारिक रूप से राजनीति में प्रवेश के लिए 2004 की शुरुआत में राहुल ने ब्रिटेन में एक अच्छी नौकरी छोड़ दी. सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने अटल बिहारी के नेतृत्व वाले एनडीए को आश्चर्यजनक मात दी.

ग्यारह साल बाद, यह बेहद पुरानी पार्टी एक बार फिर सोनिया के नेतृत्व में अपने पैर ज़माने के लिए संघर्ष कर रही है.

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जानकार बताते हैं कि सोनिया ने फिर उसी एजेंसी की सलाह मांगी है. इस बार भी इसकी सलाह 2004 में दी गई सलाह से बहुत जुदा नहीं है. जोरदार वापसी के लिए राहुल, सोनिया और प्रियंका गांधी की संयुक्त शक्ति की ज़रूरत है.

राहुल के तंज़, प्रियंका की छाप

कई सालों में पहली बार प्रियंका सक्रिय भूमिका में हैं, हालांकि अभी पूरी तरह पर्दे के पीछे हैं. राहुल के प्रभावशाली साथी कनिष्का, लगभग रोज़ प्रियंका के साथ जुड़कर काम कर रहे लोगों के साथ ख़ासा समय बिताते हैं.

अभी तक इसके परिणाम उत्साहजनक रहे हैं. राहुल लगातार ऐसे तंज कस रहे हैं जो निशाने पर लग रहे हैं. सूट-बूट की सरकार तो हिट हो ही गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात जिसे राहुल ने मार्गदर्शन और 'पाठशाला' के तौर पर पेश किया, उसका अपना असर हुआ है. दरअसल राहुल की ज़्यादातर बातों में प्रियंका की छाप को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है.

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प्रियंका लगातार परिवार के गढ़ रायबरेली के दौरे कर रही हैं. इससे उन अटकलों को बल मिला है कि क्या 2019 में सोनिया गांधी की जगह वह वहां से खड़ी हो सकती हैं? हालाँकि, अब तक तो प्रियंका और उनके प्रतिनिधि सार्वजनिक तौर पर अटकलों को ख़ारिज करते आए हैं.

मज़ेदार बात यह है कि लंबे समय तक प्रियंका रायबरेली को अपना 'इलाक़ा' मानती रही हैं. 1999 में कांग्रेस उम्मीदवार कैप्टन सतीश शर्मा के ख़िलाफ़ बीजेपी से खड़े हुए अपने चाचा अरुण नेहरू की खटिया उन्होंने अकेले ही खड़ी कर दी थी.

एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने बहुत तिलमिलाने वाला हमला किया.

जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, "मुझे आपसे एक शिकायत है. मेरे पिता के मंत्रिमंडल में रहते हुए जिसने गद्दारी की, भाई की पीठ में झुरा भोंका, जवाब दीजिए, ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?"

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भीड़ स्तब्ध होकर सुन रही थी. प्रियंका ने आगे कहा, "यहां आने से पहले मैंने अपनी मां से बात की थी. मां ने कहा किसी की बुराई मत करना. मगर मैं जवान हूं, आप से भी यदि दिल से बात न कहूं तो किससे कहूं."

कांग्रेस वालों को आशा

प्रियंका की टिप्पणियां इतनी तीखी थीं कि वाजपेयी जैसे शानदार वक्ता भी इनकी धार कुंद नहीं कर पाए. तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने प्रियंका के भाषण के एक दिन बाद रायबरेली का दौरा किया.

अपने ख़ास अंदाज़ में उन्होंने प्रियंका पर यह कहते हुए तंज किया कि वह 'रायबरेली आने से डर रहे थे क्योंकि यह किसी और का इलाक़ा है.'

लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. अरुण नेहरू हार गए.

लेकिन कांग्रेस समर्थकों के लिए महत्वपूर्ण यह था कि प्रियंका, परिवार की एक सदस्य इस तरह बोल सकती हैं.

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अब तक प्रियंका जानबूझकर ख़ामोश बनी हुई हैं. हालांकि उनका ट्विटर अकाउंट उन्हें 'नेता' बताता है लेकिन वास्तव में वह एक मां, एक गृहणी और कांग्रेस हितैषी बनी हुई हैं. वह कई बार सक्रिय राजनीति में आने को लेकर अपनी अनिच्छा जता चुकी हैं.

कुछ साल पहले उन्होंने पत्रकार बरखा दत्त से कहा था, "सच कहूं तो मुझे यकीन नहीं कि क्यों, लेकिन इतना साफ़ है कि मैं राजनीति में नहीं आना चाहती. मैं अपने तरीके से जीवन जीते हुए ख़ुश हूं और मुझे लगता है कि राजनीति के कुछ पहलू ऐसे हैं जिनके लिए मैं उपयुक्त नहीं हूं."

लेकिन नेहरू-गांधी परिवार के नज़दीकी कांग्रेसी अब भी आशावादी हैं और कहते हैं कि एक बहन के रूप में प्रियंका आधिकारिक रूप से कह चुकी हैं कि वह राहुल की मदद करने के लिए 'किसी भी हद' तक जाएंगी.

राहुल की मुश्किलें

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छुट्टियों के बाद लौटे राहुल एक बदले हुए इंसान लग रहे हैं.

उन्होंने अपनी बात को रखने की अदा, कहने के ढंग और सोशल मीडिया में अपनी सीमित उपस्थिति पर काफ़ी काम किया है जिससे मीडिया ने उन्हें कुछ सकारात्मक रौशनी में देखना शुरू किया है.

पहले भी राहुल में नएपन और विश्वसनीयता के कुछ लक्षण दिखे थे. उदाहरण के लिए दिसंबर 2005 में राहुल ने बिल गेट्स से मुलाकात की थी.

जब आईटी दिग्गज ने अरबों डॉलर वाले बिल गेट्स फ़ाउंडेशन के ज़रिए भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने का इरादा जताया, तो राहुल ने तुरंत कहा, "आप बिहार के लिए कुछ क्यों नहीं करते?"

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फिर अगले कुछ मिनट तक बिल और उनकी पत्नी मिलिंडा मुग्ध होकर उस युवा गांधी को सुनते रहे जो बता रहे थे कि कैसे हर साल बिहार में कालाज़ार सैकड़ों लोगों की जान ले लेता है.

हर क्षण तैयार नेता की छवि

लेकिन यूपीए के दस साल के शासन (2004-14) में राहुल का राजनीतिक कद नहीं बढ़ा. इस दौरान एक होनहार नेता की जगह एक भ्रमित, अनिच्छुक और उदासीन नेता नज़र आया.

इस तरह राहुल को तत्काल एक विश्वसनीय, हमेशा तैयार (24X7) नेता की छवि वापस पाने की ज़रूरत है. संक्षेप में राहुल का काम चुनौतीपूर्ण और डराने वाला है.

इस वक्त उन्हें अपनी पार्टी के साथियों का सम्मान हासिल करने और इस बहुत पुरानी पार्टी के नेतृत्व का मुद्दा जल्द से जल्द सुलझाने की ज़रूरत है.

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कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव इसी साल होने हैं. क्या राहुल पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने में कामयाब हो पाएंगे जिसके वह इतने समर्थक रहे हैं? कांग्रेस पार्टी के चुनाव करवाना आसान नहीं, कहना आसान है.

अगर राहुल ईमानदारी से चुनाव करवाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें कई मुश्किलें पेश आएँगी. इस बेहद पुरानी पार्टी के पास न तो पर्याप्त आधारभूत ढांचा है, न पर्याप्त लोग जो ईमानदारी से काम करने के इच्छुक हों.

उन्हें सफ़लता के हर मुकाम पर प्रियंका गांधी की ज़रूरत पड़ेगी.

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