कश्मीर में मोबाइल सेवा ही निशाना क्यों?

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पिछले हफ़्ते भारत प्रशासित कश्मीर घाटी में लश्कर-ए-इस्लाम की धमकी की वजह से जब दूरसंचार सेवा ठप पड़ गई थी तो घाटी 2003 के पहले वाले दौर में पहुंच गई थी.

हालाँकि बुधवार को देर रात तक अधिकांश जगहों पर दूरसंचार सेवा फिर से बहाल कर ली गई, लेकिन अनिश्चितता अब भी बनी हुई है.

कश्मीर में मोबाइल सेवा देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में देर से पहुंची थी.

90 की दशक की शुरुआत में घाटी में हथियारबंद संघर्ष के चरम पर होने की वजह से मोबाइल सेवा की शुरुआत करना अधिकारियों को जोखिम भरा क़दम लगा.

लामबंदी का हथियार

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कश्मीर में मोबाइल सेवा साल 2003 में शुरू हुई तब बड़े पैमाने पर लोग सिम कार्ड के लिए मोबाइल दुकानों पर उमड़ पड़े थे.

श्रीनगर में बीएसएनएल के एक कर्मचारी अब्दुल हामिद उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, "उस वक्त पुलिस को मोबाइल दुकानों के बाहर बेक़ाबू हो गई भीड़ पर लाठी चार्ज करना पड़ा था."

जम्मू-कश्मीर में बीएसएनएल ने पहली बार मोबाइल सेवा शुरू की थी. इसके बाद एयरटेल, एयरसेल, रिलायंस और आइडिया जैसी निजी कंपनियों ने सेवा देना शुरू किया.

आधे दशक तक सेवा देने के बाद टाटा इंडिकॉम ने वित्तीय कारणों का हवाला देकर कुछ साल पहले अपनी सेवा बंद कर दी.

कश्मीर में संघर्ष के कारण संचार सेवा अक्सर बाधित होती रही है. साल 2008 में कश्मीर के बैलताल पहलगाम में शिरीन बोर्ड को ज़मीन देने के प्रस्ताव पर लोगों का ग़ुस्सा फूट पड़ा था तब अधिकारियों ने घाटी में मैसेज सेवा पर सुरक्षा कारणों का हवाला देकर अचानक से रोक लगा दी थी.

कश्मीर के एक पुलिस अधिकारी का कहना है, "नौजवान मैसेज की मदद से सरकार के ख़िलाफ़ विरोध को बढ़ा सकते थे. यह नौजवानों को लामबंद करने का हथियार बन चुकी थी, इसलिए अधिकारियों ने इसे बंद करने का फ़ैसला लिया."

बदलाव

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पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के कार्यकाल के दौरान पिछले साल मैसेज सेवा बहाल की गई थी.

दूसरे कई अवसरों पर भी अधिकारियों ने घाटी में क़ानून-व्यवस्था कायम रखने के नाम पर मोबाइल सेवाएं बंद की हैं.

जब फ़रवरी 2013 में अफ़ज़ल गुरु को फांसी दी गई थी तो कश्मीर भर में भारत सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर प्रदर्शन हुए थे.

तब साल 2010 के तरह के विद्रोह को रोकने के लिए सरकार ने घाटी में एक हफ़्ते के लिए प्रीपेड मोबाइल सेवा बंद कर दी.

इतिहासकार और कश्मीरी कवि ज़रीफ अहमद ज़रीफ ने कश्मीर के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों को बचाने की वकालत करते आए हैं, लेकिन मोबाइल के मामले में वे बहुमत का पक्ष लेते हैं.

उनका कहना है, "पहले हमारी जीवनशैली घाटी तक ही सीमित थी. हमारा व्यवसाय ज्यादा नहीं फैला था, लेकिन बदलते वक्त और तकनीक के साथ हमारा व्यवसाय दुनिया भर में फैल गया है. ये हमारी ज़िंदगी में बहुत बदलाव लाया है. ऐसे हालात में मोबाइल सेवा हमारी ज़िंदगी की ज़रूरत बन गई है. "

निर्भरता

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ज़रीफ कहते हैं कि मोबाइल सेवा को घाटी में बंद करने से किसी के लिए भी कुछ भी अच्छा नहीं होने वाला है क्योंकि हर कोई आजकल इस पर निर्भर है.

श्रीनगर के बुजुर्ग व्यवसायी अब्दुल रहमान का कहना है, "जवानी के दिनों में मुझे मोबाइल फोन की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई. फिर भी मैंने ठीक-ठाक कमाई की. लेकिन आज मैं इसके बिना नहीं रह सकता. यह एक तरह से हमारी छठी इंद्री बन चुकी है."

अब्दुल रहमान का मसाले और ड्राई फ्रूट का व्यवसाय था जिसे अब उनका बेटा चलाता है.

पिछले हफ़्ते लश्कर-ए-इस्लाम की धमकी की वजह से मोबाइल सेवा को बंद करना इस बात की गवाही देता है कि कश्मीर में मोबाइल सेवा कितनी बड़ी ज़रूरत बन गई है.

ऐसा मालूम पड़ता है कि कश्मीर घाटी एक अनजाने से मुसीबत की चपेट में है. मोबाइल सेवा के फिर से बहाल होने पर लोगों ने राहत की सांस ली है.

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