तो फिर भीषण गर्मी से कितने लोग मरे?

  • 7 जून 2015
आंध्र प्रदेश की महिला अपने मृत बेटे की तस्वीर के साथ
Image caption एक महिला अपने मृत बेटे बाशा की तस्वीर के साथ.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में गर्मी से सैकड़ों लोगों के मरने की ख़बर आने के बाद, अब अधिकारियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या पहले बताए गए आंकड़ों से काफ़ी कम है.

आंध्र प्रदेश में अब गर्मी के कारण मरने वालों की आधिकारिक संख्या 1719 बताई गई है.

आंध्र सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव जगदीश चन्द्र शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पहले अनुमानित आंकड़े इसलिए ज़्यादा थे क्योंकि यह सिर्फ़ सूचना पर आधारित थे.

गर्मी से एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत

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बाद में सत्यापन के दौरान इन आंकड़ों में कमी आई है.

वो कहते हैं, "शुरू में विभिन्न जिलों से ख़बरें आती हैं. उन ख़बरों को एक जगह सम्मिलित किया जाता है. बाद में ज़िले के अधिकारियों से उन आंकड़ों की पुष्टि कराई जाती है. इससे स्पष्ट हो पाता है कि किसकी मौत गर्मी की वजह से हुई है और किसी स्वाभाविक मौत हुई है."

गर्मी से कौन मरा?

यही हाल, कमोबेश, तेलंगाना राज्य का भी है जहाँ आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव भमबल राम मीना ने बीबीसी से बातचीत में अब 575 लोगों की मौत की पुष्टि की है.

मगर उनका कहना है कि ये आंकड़े पिछले दो महीनों के हैं जबकि पूरा राज्य ही भीषण गर्मी की चपेट में था.

हालांकि आंकड़ों में गिरावट ख़ुश होने वाली बात इसलिए नहीं है क्योंकि इस साल पड़ी भीषण गर्मी की वजह से कई मौतें हुई भी हैं.

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दोनों ही राज्य सरकारों ने इन मौतों के सत्यापन के लिए अपने नियम क़ायदे बना रखे हैं. जिस व्यक्ति की मौत इन नियमों के मुताबिक पुष्ट होती है, उसे ही मुआवज़े का लाभ मिल सकता है.

मसलन, अगर किसी की मौत गर्मी लगने से घर पर ही हो जाती है तो उसे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं. पोस्टमार्टम से पहले स्थानीय पंचायत के सदस्यों को बतौर गवाह पेश करना होगा.

अगर यह सब कुछ नहीं हो पाया तो फिर तहसीलदार, सिविल सर्जन और स्थानीय थाना प्रभारी की कमिटी से मौत का सत्यापन कराना होगा.

यह सब कुछ नहीं हुआ तो उस मौत की कोई गिनती नहीं होगी. गर्मी में मरने वाले बुजुर्गों यानी 70 साल से ऊपर की उम्र वाले लोगों की मौत को तो स्वभाविक मौत की श्रेणी में ही रखा जाएगा.

सड़क पर मरे तभी मुआवज़ा

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कृष्णा ज़िले के नंदिगामा की तहसीलदार लक्ष्मी प्रसन्ना कहती हैं कि जिन लोगों की घर के अन्दर रहते हुए तबियत खराब हो जाती है, उन्हें मुआवज़े का लाभ नहीं मिलेगा.

सिर्फ वही लोग जो गर्मी के दौरान बाहर सड़क पर काम करते हैं और मर जाते हैं, उनकी मौत को ही सरकारी तौर पर गर्मी के प्रकोप से हुई मौत माना जाएगा.

शायद यही कारण है कि सूचित की गई मौतों और आधिकारिक तौर पर स्वीकृत मौतों में अब काफ़ी अंतर आ गया है.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में आधिकारिक तौर पर मानी गई मौतों के बदले मुआवज़ा देने की प्रक्रिया चल रही है.

शर्मा का कहना है कि लोगों को जल्द मुआवज़ा मिल सके इसके लिए ट्रेज़री के कानून में संशोधन किया गया है ताकि ज़िले के अधिकारी अपने स्तर से इसको बाँट सकें.

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