भिंडरावाले किसे दिलाएंगे पंजाब में वोट?

  • 7 जून 2015
जम्मू में विरोध करते प्रदर्शनकारी इमेज कॉपीरइट EPA

जम्मू में जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर फाड़े जाने को लेकर सिखों के ग़ुस्से से पंजाब में सिखों और हिंदुओं के प्रभाव वाले चुनाव क्षेत्रों में तनाव पैदा होने का ख़तरा है.

नतीजतन, शिरोमणि अकाली दल और पंजाब के सत्ताधारी गठबंधन में साझीदार भारतीय जनता पार्टी ग़ौर से ये देख रही हैं कि क्या जम्मू की घटना का पंजाब के विधानसभा चुनावों में असर होगा.

पंजाब में चुनाव फ़रवरी 2017 में होने हैं.

बदलते समीकरण

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शिरोमणि अकाली दल सिख वोट बैंक तो भाजपा हिंदू वोट बैंक की सबसे बड़ी दावेदार हैं.

भाजपा को इसके एकाधिकार वाली हिंदुत्व की ज़मीन पर छोटे दलों मसलन शिवसेना से अलग हुए धड़े से पहले ही चुनौती मिल रही है.

ख़ालिस्तान समर्थक ताकतें सिखों के हितों की रक्षा को लेकर अकाली दल पर दबाव बना रही हैं.

पंजाब के हिंदू भाजपा और कांग्रेस को एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर वोट देते रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अकाली-भाजपा सरकार पंजाब में तेज़ी से अपना आधार खो रही है, लेकिन अगर किसी तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है तो अकालियों को इसका फ़ायदा मिल सकता है, उस स्थिति में भी जबकि वो एक-तिहाई वोट शेयर पर अधिकार करने में कामयाब हों.

बदतर स्थिति में भी उनका वोट शेयर तीस फ़ीसदी रहा है.

दलितों का सहारा!

भाजपा ने हिंदुओं के ध्रुवीकरण की वजह से जम्मू क्षेत्र में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में जमकर वोटों की फसल काटी, लेकिन पंजाब में उसके पक्ष में हिंदुओँ का वैसा समर्थन दिखाई नहीं देता.

भाजपा अपना आधार बढ़ाने के लिए दलितों के बीच पैठ बढ़ाने की कोशिश में है.

भाजपा ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में सिर्फ़ एक दलित सांसद विजय कुमार सांपला को जगह दी है.

लेकिन, भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की बैठकों का नतीजा बहुत उत्साहवर्धक नहीं है.

पंजाब की कुल आबादी में दलितों की संख्या एक तिहाई है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी कभी राज्य में आधिपत्य नहीं जमा सकी जबकि इसके संस्थापक कांशीराम पंजाब के रोपड़ से ही थे.

पंजाब में बड़ी संख्या में दलितों का झुकाव कांग्रेस की तरफ़ हुआ है.

पिछले कुछ चुनावों में अकाली दल भी वाल्मीकि वोटों का अच्छा हिस्सा हासिल करने में कामयाब रहा है.

बिखरे हुए विरोधी

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मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की अगुवाई वाले बादल परिवार के सत्ता के कथित दुरुपयोग के आरोपों के बाद भी अकाली दल को भरोसा है कि वो गड़बड़ियों से पार पा लेगी.

वजह ये है कि पार्टी को चुनौती देने वाले बिखरे हुए हैं.

चौबीस फ़ीसदी वोटों के साथ तेरह में से चार लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी बंटी हुई है.

कांग्रेस का भी यही हाल है. पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रताप बाजवा को सार्वजनिक तौर पर दरकिनार करने की कोशिश में दिखते हैं.

बना रहेगा साथ

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अकाली दल और इसकी सहयोगी भाजपा के बीच दबदबे की खुली जंग के बाद भी ये माना जा रहा है कि इन दोनों दलों के बीच गठबंधन जारी रहेगा.

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सिखों और पंजाब को राष्ट्रीय नज़रिए से देखता है. उसका मानना है कि सिखों और हिंदुओं के बीच दरार राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाएगी.

पंजाब में शांति अब भी पुख्ता नहीं है.

दूसरा कारण राजनीतिक लाभ है. बादल की पुत्रवधु हरसिमरत कौर बादल नरेंद्र मोदी सरकार में अपना मंत्रिपद खोने के लिए तैयार नहीं दिखतीं.

लेकिन, दोनों पार्टियों का तनाव साफ़ दिखता है. भाजपा शासित जम्मू-कश्मीर में पुलिसकर्मी भिंडरावाले का पोस्टर फाड़ देते हैं.

भिंडरावाले 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान सेना के एक अभियान में मारे गए थे.

यहां तक कि पंजाब में नरमपंथी सिख भी मसहूस करते हैं कि भाजपा ने जम्मू कश्मीर में आक्रामक हिंदू कार्ड खेला है.

भिंडरावाले का असर

पंजाब में भिंडरावाले का महिमामंडन आम है. वाहनों पर शहीद भगत सिंह के साथ उनकी तस्वीर सबसे ज्यादा नज़र आती है.

भिंडरावाले की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई. कट्टरपंथी उन्हें सिख समुदाय के आइकन के तौर पर पेश करते रहे हैं.

बीते दो साल के दौरान उनके पोस्टरों की संख्या बढ़ी है, लेकिन पंजाब में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं हुई.

लुधियाना में एक वाकया सामने आया, जहां कांग्रेस के एक पार्षद ने भिंडरावाले का पोस्टर फाड़ दिया लेकिन हालात क़ाबू कर लिए गए.

जम्मू के कई सिखों को चरमपंथी गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता है और उनमें से एक रंजीत सिंह नीता के बारे में कहा जाता है कि वो पाकिस्तान में बसे हैं.

नीता पर 1990 के दशक में कई बम धमाके करने का आरोप है.

जगतार सिंह जैसे लेखकों की ओर से मुहैया कराए गए सरकारी रिकॉर्ड ये भी बताते हैं कि भिंडरावाले ने सिर्फ़ एक बार ख़ालिस्तान की बात की थी, लेकिन वो राज्यों को अपने मामलों में स्वायत्ता देने के हिमायती आनंदपुर साहिब के प्रस्ताव पर अड़े थे.

चुनाव का इंतज़ार

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पिछले साल भी स्वर्ण मंदिर में खून बहा. अकाल तख्त के दो गुटों के बीच संघर्ष हुआ.

सादे कपड़ों में मौजूद एक पुलिसकर्मी ने युवाओं से ये अनुरोध करते हुए कि वो पवित्र स्थान की मर्यादा भंग न करें, हालात को क़ाबू किया.

शिक्षाविद प्रोफ़ेसर जगरूप सिंह सेखवान कहते हैं कि अगर पंजाब में कांग्रेस की सरकार होती तो अकाली दल ने जम्मू की घटना का फ़ायदा ले लिया होता, लेकिन अब भाजपा और अकाली दोनों ही तनाव बढ़ाने के ज्यादा इच्छुक नहीं हैं.

राजनीतिक लाभ लेने के लिए चुनाव तक का इंतज़ार किया जा सकता है. लेकिन राजनीतिक पैंतरेबाजी से लोगों के मिजाज को भांपा जा सकता है और राजनीति के विभिन्न खिलाड़ियों के हित के हिसाब से मोड़ा जा सके.

(संजय शर्मा 'द संडे गार्डियन' के स्थानीय संपादक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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