बिहारः 'भाजपा के पक्ष में हैं 6 फ़ैक्टर'

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सोमवार को जदयू, राजद और कांग्रेस ने आगामी बिहार विधान सभा चुनाव मिलकर लड़ने की घोषणा की.

नीतीश कुमार इस गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए गए हैं.

नीतीश के नाम की घोषणा के बाद राजद नेता लालू यादव ने कहा, "ये गठबंधन सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए बना है."

इस गठबंधन के राजनीतिक परिणामों पर बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से बात की वरिष्ठ पत्रकार उत्तम सेनगुप्ता ने.

पढ़ें बातचीत के चुनिंदा अंश

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Image caption राबडी़ देवी और उनके बेटे तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव.

नीतीश कुमार को गठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में घोषणा करना क्या ये लालू यादव की मजबूरी थी?

लालू यादव की ये मजबूरी तो रही ही है. वो ख़ुद इस दौड़ में नहीं थे, न ही उनके परिवार का कोई सदस्य ऐसा था जिसे वो इस रूप में पेश कर पाते.

लेकिन उनकी पार्टी में कई ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जिनमें मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा है. उनमें से किसी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जा सकता था.

इन्हीं नेताओं ने कहा था कि चुनाव से पहले किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करना है. इसी की वजह से विवाद या भ्रम की स्थिति बनी.

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लालू जी भी जानते हैं कि अगर वो अकेले चुनाव लड़ते तो उनके लिए अच्छी स्थिति नहीं होती. जैसा कि लोग कह रहे हैं ये आत्मघाती क़दम होता, ऐसा होता तो लालू राजनीति में हाशिए पर चले जाते.

बिहार में आरपार की लड़ाई हो रही है. ये गठबंधन नीतीश, लालू और कांग्रेस सबकी मजबूरी है. मुलायम सिंह यादव बिहार में ज़्यादा मायने रखते नहीं हैं.

भाजपा के लिए भी ये कांटे की लड़ाई है. अगर ये गठबंधन नहीं होता तो भाजपा को थोड़ी आसानी होती लेकिन अब कड़ा मुक़ाबला होगा.

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नीतीश कुमार और लालू यादव धुर विरोधी रहे हैं, ऐसे में विधान सभा चुनाव में दोनों पार्टियों के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के लिए क्या कोई मुश्किल होगी?

कई बार ऐसा होता है कि नेता एक हो जाते हैं लेकिन कार्यकर्ता एक नहीं होते. पार्टियाँ मिल जाती हैं लेकिन समर्थक नहीं मिलते. ये इस बार भी होगा.

दिक्कत ये है कि जिस साँप और बिच्छू के बारे में भाजपा शिकायत कर रही है, उसी साँप और बिच्छू के साथ वो भी आठ साल तक रहे.

2005 से 2013 तक भाजपा भी नीतीश कु्मार की तारीफ़ करती रही. वो कहते थे कि भारत में दो ही मुख्यमंत्री हैं एक नरेंद्र मोदी और दूसरे नीतीश कुमार. आज उसी नीतीश की आलोचना वो कर रहे हैं.

सच तो ये है कि दुर्भाग्यवश बिहार में नेतृत्व की कमी है. इन दो-तीन नेताओं के अलावा कोई दिख नहीं रहा है.

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Image caption नीतीश कुमार(बाएँ) और सुशील मोदी.

ख़ुद भाजपा में सुशील मोदी की छवि साफ सुथरी है. उनके चाहने वाले भी हैं. लेकिन विडंबना ये है कि ख़ुद उनकी पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं है.

उनकी पार्टी में दो-तीन ऐसे नेता होंगे जो चाहते होंगे कि वो बिहार के मुख्यमंत्री बने.

भाजपा के बिहार से जो सात केंद्रीय मंत्री हैं उनमें भी कुछ लोग ऐसे हैं जो बिहार वापस आना चाहते हैं.

इसलिए भाजपा हो या जदयू-राजद-कांग्रेस गठबंधन हो, दोनों के सामने नेतृत्व का संकट है. दोनों के लिए ये भी संकट है कि 240 सीटें के लिए प्रत्याशी कैसे चुने जाएँगे.

नीतीश और लालू को सीट बंटवारे में ज़्यादा मुश्किल का सामना करना होगा. दोनों बराबर सीटें चाहेंगे. ऐसे में ये एक बड़ा मसला बनेगा.

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भाजपा के लिए ये गठबंधन कितनी मुश्किल पैदा कर सकता है?

मैं समझता हूँ बिहार में छह फ़ैक्टर भाजपा के पक्ष में हैं.

भाजपा के पक्ष में पहला सबसे बड़ा फ़ैक्टर है, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता.

दूसरा फ़ैक्टर है, केंद्र में भाजपा की सरकार होना. ऐसे में वो कहेगी कि विकास के लिए बिहार में भी भाजपा सरकार की जरूरत है.

तीसरा फ़ैक्टर है, भाजपा का सांगठनिक ढांचा, जो बाक़ी सभी पार्टियों से मजबूत स्थिति में है.

चौथा फ़ैक्टर है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो बिहार के कई इलाक़ों में काफ़ी मजबूत है, वो चुनाव में भाजपा के पक्ष में काम करेगा.

पांचवां फै़क्टर है, आर्थिक संसाधन के मामले में भी भाजपा दूसरी पार्टियों से काफ़ी आगे रहेगी.

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Image caption बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और दलित नेता जीतनराम मांझी.

छठवाँ फ़ैक्टर है, भाजपा के साथ रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, नंदकिशोर यादव जैसे पिछड़े और दलित नेता या पार्टियां भी हैं. जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता.

भाजपा को भी इसका अंदाजा रहा होगा कि ये गठबंधन होगा. दोनों चाहे कितनी भी बयानबाज़ी करें लेकिन दोनों को कहीं न कहीं पता था कि ये गठबंधन होने वाला था.

नीतीश कुमार, लालू यादव और सुशील मोदी सभी के लिए ये निर्णायक लड़ाई है. इस चुनाव की जीत-हार से इन सबके राजनीतिक भविष्य की दिशा तय होगी.

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