मुलायम को 'संघर्ष का परिवारवाद' पड़ा भारी

  • 9 जून 2015
मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नरेंद्र मोदी, रामगोपाल यादव इमेज कॉपीरइट Vivek Dubey
Image caption (बाएँ से दाएँ) लालू यादव, नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह यादव और रामगोपाल यादव.

पार्टी और सरकार पर पूरा नियंत्रण और राजनीति के सारे रिमोट बटन अपने हाथ में रखने के लिए मुलायम सिंह यादव ने जिस परिवारवाद को जतन से पोसा था वही अब उनके लिए भारी पड़ने लगा है.

परिवार के जो सदस्य कभी डमी थे अब महत्वाकांक्षी राजनेताओं में बदल चुके हैं और उन्होंने मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने से रोक दिया है.

राज्यसभा में पार्टी नेता रामगोपाल यादव के खुले और परिवार के कई सदस्यों के गुपचुप विरोध के बाद अब यह तय हो गया है कि जनता परिवार में समाजवादी पार्टी का विलय नहीं होगा.

विलय की घोषणा

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सांप्रदायिक ताकतों और एक साल सरकार चला चुके नरेंद्र मोदी की बढ़त को रोकने के लिए बीते 15 अप्रैल को मुलायम को नेता मानते हुए राजद, जद (यू) और देवगौड़ा के नेतृत्व वाले जेडी (एस) ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आपस में विलय की घोषणा की थी.

नयी पार्टी का नाम, झंडा और कार्यक्रम तय करने के लिए एक समिति बनाई गई थी जिसके रामगोपाल भी सदस्य थे. लेकिन रामगोपाल ने कहा कि विलय समाजवादी पार्टी के डेथ वारंट पर दस्तखत करने जैसा होगा.

पिछड़ी किसान जातियों और मुसलमानों के एक हिस्से पर प्रभाव रखने वाली इन पार्टियों के नेताओं ने मुलायम को मोदी के प्रतिपक्ष की धुरी के रूप चुन लिया था लेकिन उनके परिवार के सदस्यों को लगता है कि यूपी में पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल के साथ उनकी पहचान भी गुम हो जाएगी.

सबसे बड़ा कुनबा

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फिलहाल संसद में मुलायम का कुनबा सबसे बड़ा है जिसमें तीन पीढ़ियां शामिल हैं. इसमें उनके पोते तेज प्रताप, भतीजे धर्मेंद्र और अक्षय, बहू डिंपल, भाई रामगोपाल और मुलायम सिंह यादव खुद हैं.

यूपी में सबसे अधिक विभागों के मंत्री शिवपाल यादव समेत परिवार के एक दर्जन से अधिक सदस्य पार्टी और सरकार में निर्णायक पदों पर हैं.

बेटे अखिलेश यादव को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने के बाद मुलायम सिंह यादव ज्यादा समय दिल्ली में देने लगे थे ताकि राष्ट्रीय राजनीति में दखल दे सकें लेकिन पार्टी में परिवार के सदस्यों के नेतृत्व वाले गुटों की खींचतान के कारण उनके लिए फैसले लेना पहले की तरह आसान नहीं रह गया है.

मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक की बहू कई मौकों पर अपनी ही सरकार की खिंचाई कर चुकी हैं.

पार्टी में यह चर्चा आम है कि मुलायम के नहीं रहने के बाद इन गुटों में संतुलन बनाए रखने वाला कोई नहीं होगा जिसका नतीजा बंटवारे के रूप में सामने आएगा.

वंशवाद का विरोध

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नेहरू-इंदिरा के वंशवाद का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी में एक खानदान का दबदबा होना आसान नहीं था.

इस परिवारवाद को सैद्धांतिक जामा छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र ने संघर्ष का परिवारवाद कह कर पहनाया था.

यानि मुलायम पहले परिवार के सदस्यों को संघर्ष में उतारते हैं फिर पद देते हैं.

जीवन के आखिरी दिनों में जनेश्वर मिश्र ने मुलायम के लिए ब्राह्मण वोटरों को रिझाने की भी कोशिश की.

इसके लिए बाकायदा समाजवादी ब्राह्मण सभा नाम का एक फ्रंटल संगठन बनाया गया था.

परिवारवाद का विरोध

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Image caption समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह.

पार्टी में परिवारवाद पर उंगली उठाने वालों को बाहर का रास्ता देखना पड़ता है.

अमर सिंह जो मुलायम के बहुत खास हुआ करते थे, उन्हें रामगोपाल से विवाद के बाद ही पार्टी से निकाला गया था.

अब मुलायम उन्हें फिर वापस लेना चाहते हैं लेकिन परिवार आड़े आ रहा है.

पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है, "सपा के खिलाफ परिवारवाद का प्रचार झूठ है, यह एक लोकतांत्रिक पार्टी है."

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