'गुप्त अभियानों का ढिंढोरा पीटना सही नहीं'

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मणिपुर में चरमपंथियों ने भारतीय सेना के ख़िलाफ़ जब बड़ा हमला किया तो इस पर कोई कड़ी प्रतिक्रिया आवश्यक थी.

इस अभियान से जुड़े अब तक मिले ब्योरे के मुताबिक़ भारतीय सेना ने सीमा पार कर म्यांमार में कार्रवाई की है और काफ़ी तादाद में चरमपंथियों को निशाना बनाया है.

मेरे मुताबिक़ म्यांमार सरकार की भी इस अभियान में सहमति ज़रूर होगी. भारत का म्यांमार के साथ संयुक्त अभियान का एक इतिहास भी है.

म्यांमार कभी भारत विरोधी नहीं रहा है. उम्मीद की जा सकती है कि दोनों देशों की सहमति के साथ ऐसा हुआ होगा.

भारत सरकार का कहना है कि यह अभियान ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहमति से लिया गया फ़ैसला था.

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ज़िम्मेदारी की पहल सही

भारत की आंतरिक सुरक्षा और भारतीय विदेश नीति में बदलाव के लिहाज से देखें तो इसमें दो बातें हैं.

पहली बात यह कि इसे एक सकारात्मक फ़ैसला कहा जा सकता है जिससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक नेतृत्व साफ़तौर पर ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार है.

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ऐसा नहीं है कि इससे पहले सीमा पार सैन्य अभियान नहीं चलाया गया है. इससे पहले भी ऐसा हो चुका है.

पहले भी बांग्लादेश में कई अभियान चलाए गए थे, त्रिपुरा की तरफ़ से सेना वहां जाकर कैंपों पर हमला करती थी.

इसके अलावा और भी कई ऐसे मामले हैं.

लेकिन आमतौर पर इन सभी अभियानों पर सेना, पुलिस और सत्तासीन राजनीतिक दल में से कोई हामी नहीं भरता था बल्कि सभी इससे इनक़ार करते थे.

सतर्कता ज़रूरी

दूसरी बात ये है कि ऐसे अभियानों का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए.

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मुमकिन है कि चरमपंथी संगठन ऐसा सोचने लगें कि उनके साथ भी इस तरह की कार्रवाई हो सकती है तो वे एहतियात बरतना शुरू कर देंगे.

ऐसे में बेहतर यही होगा कि गुप्त अभियानों को गुप्त ही रखा जाए.

इन चीज़ों पर ज़्यादा बातें आम लोगों के बीच या मीडिया में न की जाए और इस क़िस्म का ढिंढोरा न पीटा जाए.

अगर किसी अभियान को अंजाम दिया जाता है, फिर ज़िम्मेदारी की बात आती है और उस वक़्त प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह मेरी सहमति से हुआ तो बात और है. लेकिन इस किस्म के अभियानों पर ज़्यादा बातचीत न की जाए तो अच्छा रहेगा.

(बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)

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