दो राज्यों की लड़ाई में हाथियों की मौत

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महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच संघर्ष का कारण बने तीन में से दो हाथियों ने आख़िर दम तोड़ दिया, जबकि तीसरे हाथी को लेकर असमंजस का माहौल है.

दोनों राज्यों की सीमा पर सिंधुदुर्ग ज़िले में यह घटना हुई, जिसमें ‘समर्थ’ नाम के हाथी ने 29 मई को आखिरी सांस ली.

पोस्टमार्टम से पता चला है कि पाँव में जख़्म के कारण फैले संक्रमण से इस हाथी की मृत्यु हुई.

साल 2003 में कर्नाटक के दांडेली अभयारण्य से जंगली हाथियों ने महाराष्ट्र के दोडामार्ग में सबसे पहले प्रवेश किया था. इन हाथियों की वजह से कई किसानों की फसलें बर्बाद हुईं.

लोगों के आक्रोश के बाद वन विभाग ने ‘एलिफ़ेंट बैक टू होम’ नामक मुहिम चलाई.

रोकने की कोशिश

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पिछले दस वर्षों में यहां 13 व्यक्ति और 14 हाथी अपनी जान गंवा चुके हैं.

हाथियों के कारण जान-माल के नुक़सान का मुआवज़ा देने में सिंधुदुर्ग ज़िले का भारत में पहला नाम आता है.

कर्नाटक से आनेवाले हाथियों को रोकने के लिए महाराष्ट्र के जंगल विभाग के अधिकारियों ने कई उपाए किए, जैसे, लंबी खाई की खुदाई, सौर कम्पाऊंड, तेल से सराबोर रस्सियां बांधना आदि.

लोगों ने भी अपनी ओर से ढोल बजाने और पटाखे फोड़ने जैसे उपाय किए, लेकिन हाथियों की आवाजाही बंद नहीं हुई.

असम से हाथियों को लाकर जंगली हाथियों को पकड़ने की कोशिश भी की गई, लेकिन इससे भी कोई लाभ नहीं हुआ.

प्रशिक्षण

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पिछले साल दोनों राज्यों के वनाधिकारियों की बैठक बेंगलुरु में हुई थी. उस समय कर्नाटक ने सिंधुदुर्ग ज़िले के हाथियों को अपने राज्य में लेने से मना किया था, क्योंकि वहाँ पहले ही तीन हज़ार जंगली हाथी हैं.

लेकिन इन हाथियों को प्रशिक्षित करने के लिए सहयोग देने में रुचि दिखाई थी.

इसी मुहिम के अंतर्गत साढ़े तीन महीने पहले तीन जंगली हाथियों को पकड़ा गया था. उन्हें आंबेरी स्थित वन विभाग के कैंप में लकड़ी के क्रॉल में रखा गया था.

इन हाथियों का गणेश, समर्थ और भीम से नामकरण भी किया गया था. लेकिन 'गणेश' ने 10 अप्रैल को दम तो़ड़ दिया.

पिछले सप्ताह ‘समर्थ’ की भी मृत्यु हो गई, अब अधिकारियों को ‘भीम’ की चिंता है.

सिंधुदुर्ग के उप वन संरक्षक के अनुसार, "हाथी ‘भीम’ के पुनर्वासन को लेकर विचार विमर्श चल रहा है. उसे कहाँ भेजना है, इस बारे में जल्द ही निर्णय होगा."

इन हाथियों को प्रशिक्षित करने के लिए महाराष्ट्र ने कर्नाटक के हाथी विशेषज्ञ डॉ. उमाशंकर को भी बुलाया था.

पर्यावरण कार्यकर्ता नाराज़

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लेकिन ‘समर्थ’ के पांव इतने ज़ख्मी थे कि उससे उठना भी नहीं हो रहा था. एक बार तो उसे जेसीबी की मदद से उठाया गया था.

इस परिस्थिति से पर्यावरण कार्यकर्ता ख़फ़ा हैं. बेलगांव स्थित कार्यकर्ता श्रीहरी कुगजी पिछले एक दशक से इस समस्या का अध्ययन कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "कर्नाटक-महाराष्ट्र की सीमाएं राजनीतिक हैं, जंगली जानवरों के लिए वे मायने नहीं रखतीं. तुम्हारे जानवर, हमारे जानवर की ये बातें मूर्खतापूर्ण हैं. चूंकि इन जानवरों का आवास समाप्त हो रहा है, वे ज़िंदा रहने के लिए इधर उधर भाग रहे हैं."

उनके मुताबिक़, "जंगली हाथियों को पकड़कर कब्ज़े में रहना अप्राकृतिक है इसलिए उनका मरना तय है. इसलिए इन जानवरों के लिए जंगलों को बचाए रखना और उन्हें प्राकृतिक स्थिति में रहने देना ही इस समस्या का समाधान है."

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