'यहाँ मिर्ची खाकर गर्मी भगाते लोगां'

  • 13 जून 2015
heatwave

भरी दोपहर में क़स्बे की हदों के बाहर पत्थरों की खदानों की तरफ जाते हुए मुझे कुछ अफरातफरी नज़र आई.

कुछ युवक हाथों में पत्थर लिए दौड़ते हुए नज़र आ रहे थे. पहनावे से लगा ये सब यहीं के रहने वाले हैं.

मैंने गाड़ी रुकवाई और जब उनकी तरफ बढ़ा तो पता चला कि ये जमात दरअसल एक काले ज़हरीले नाग का पीछा रही है.

लड़कों ने बताया कि इस इलाक़े में यह मंज़र आम है क्योंकि इस क़स्बे में गर्मी की वजह से सांप-बिच्छुओं, कीड़े-मकौड़ों की भी बड़ी समस्या है.

दूर-दूर तक फैली पत्थरों की चट्टानों के बीच बसे इस क़स्बे का नाम है 'रेंटाचिन्तला' जो आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले में है.

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इस जगह को पूरे प्रदेश में सबसे ज़्यादा तापमान के लिए जाना जाता है. हर वर्ष यहाँ औसत तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.

इस साल भी मई में यहाँ का तापमान पचास तक जा पहुंचा. 2012 में यहाँ तापमान रिकार्ड 52 डिग्री तक पहुँच गया था.

हालांकि इस इलाक़े में हिंदी बोलने वाले नहीं के बराबर हैं मगर मैकेनिक का काम करने वाले एस के सुब्हानी ने मेरा काम आसान किया.

Image caption सुब्हानी कहते हैं कि गर्मी की वजह से लोगों को ग़ुस्सा बहुत आता है

सुब्हानी की कई पुश्तें 'रेंटाचिन्तला' में रहती आ रही हैं.

तेलुगु मिश्रित हिंदी बोलते हुए उन्होंने मुझे 'रेंटाचिन्तला' की कई ख़ास चीज़ें बतायीं जो इस इलाक़े को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से अलग पहचान दिलाती हैं.

वो कहते हैं : "यहाँ के लोगां कु ग़ुस्सा भोत आता. रात में नींद इच नहीं होती साब गर्मी के चलते. ग़ुस्सा तो आयींगा. वैसे भी हम लोगां मिर्ची भी भोत खाते. उसकी वजा से भी ग़ुस्सा आता. हम मिर्ची से गर्मी भगाते."

क़स्बे की हदों के बाहर बकरियों का यह झुंड घास चरने आया है. मगर, इन्हें पत्थरों के ऊपर कहीं-कहीं पर उग रही घास और जंगली पेड़ों के पत्तों से ही अपना गुज़ारा करना पड़ेगा.

रेंटाचिन्तला की आबादी 16 हज़ार के आस पास है और यहाँ के लोगों का कहना था कि इस बार भी चढ़ते हुए पारे ने उन्हें बेहाल कर दिया.

ज़मीन पर पांव नहीं रखते

यूं तो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के इलाक़े में लू ने कई जाने ले लीं लेकिन आंध्र के इस हिस्से में गर्मी अब भी अपने पूरे शबाब पर ही है जबकि तापमान में पहले से कुछ तो गिरावट देखी गयी है.

मगर दिल्ली से इस इलाक़े में जाने के बाद मुझे काफी बेचैनी महसूस हो रही थी. मानसून ने केरल के तटवर्ती हिस्सों में दस्तक दे दी थी लेकिन रेंटाचिन्तला में गर्मी के साथ-साथ उमस भी अपने परवान पर थी.

क़स्बे के सरकारी हाई स्कूल के हेड मास्टर सोलोमन राजू कहते हैं कि दिनभर विचलित करने वाली गर्मी को स्थानीय लोग 'रोहिणी कारते' के नाम से बुलाते हैं.

Image caption स्कूल के हेड मास्टर सोलोमन राजू

वो कहते हैं, "इस दौरान सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक भीषण गर्मी रहती है. फिर सुबह आठ बजे तक बस हल्की सी राहत मिल पाती है. मगर, दोपहर के 12 बजे से तीन बजे तक का वक़्त ऐसा होता है जब लोग अपने घरों में भी पाँव ज़मीन पर नहीं रख सकते."

ग्लोबल वार्मिंग

मुझे 'रेंटाचिन्तला' में कई बुज़ुर्ग ऐसे मिले जिनका कहना था कि इस इलाक़े में गर्मी इतनी ज़्यादा पड़ती है कि लोगों को पेशाब तक ठीक से नहीं उतरता है.

इलाक़े के पुराने लोग कहते हैं कि वे अपने बचपन से ही ऐसा मौसम देखते आ रहे हैं. मगर उनका मानना है कि गर्मी की शिद्दत अब ज़्यादा बढ़ने लगी है. वे इसके पीछे 'ग्लोबल वार्मिंग' को भी बड़ा कारण मानते हैं.

इस क़स्बे की तंग गलियों की भी अपनी ख़ासियत है क्योंकि पत्थरों की इस नगरी में लगभग हर चीज़ पत्थर की ही बनी हुई है. चाहे वो मकान हों, दुकानें, धार्मिक स्थल या फिर दफ़्तर.

पत्थर के मकान

रेंटाचिन्तला थाने में तैनात अंजि रेड्डी मुझे बताते हैं कि इस क़स्बे के चारों तरफ पत्थरों की खदाने हैं जिसकी वजह से पत्थर ईंट के मुक़ाबले ज़्यादा सस्ता है.

लोग पत्थरों से ही मकान बनाते हैं. अब यह इस इलाक़े का एक आम चलन भी बन गया है.

ज़ाहिर है, पत्थरों पर बसे इस क़स्बे के लोगों के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि यहां भूमिगत जल का कोई स्रोत नहीं है और लोगों को सप्लाई के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

क़स्बे के रहने वाले वड्डा पाटी पेरेड्डी ने बताया कि शहर में उपलब्ध सप्लाई का पानी भी अपर्याप्त और गंदा है. उनकी शिकायत है कि सरकार हर साल गर्मी से जूझ रहे लोगों को राहत पहुंचाने का कोई उपाय नहीं कर रही है.

Image caption क़स्बे के रहने वाले वड्डा पाटी पेरेड्डी

हर बार वो इलाक़े के तहसीलदार के 'जनता दरबार' में जाकर अर्जी देते हैं और पीने के पानी की बेहतर आपूर्ति की गुहार भी लगाते हैं.

मगर उनका कहना है कि उनकी अर्जी पर कभी भी कोई कार्रवाई नहीं की गयी.

शहर-ए-संग यानी पत्थरों के इस शहर के बाशिंदे अब मौसम की मार झेलते-झेलते ख़ुद भी पत्थर की मानिंद हो गए हैं. फिर क्या इंसान क्या जानवर.

कम से कम अगर जिस्म ना सही दिल ही सही. बिना पत्थर का बने मौसम से मुक़ाबला मुश्किल हो जाएगा.

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