'फ़िल्मों में चाहते हैं अपनी कहानी देखना'

वेलकम टू कराची

भारतीय फ़िल्म उद्योग ने एक बार फिर भारत प्रशासित कश्मीर की ओर रूख किया है. कई नई फ़िल्मों की शूटिंग इन दिनों कश्मीर में हो रही है.

यहां के लोगों ने फ़िल्मी सितारों और फि़ल्मकारों का तहेदिल से स्वागत किया है लेकिन कश्मीर की छवि गलत तरीके से पेश करने का मलाल सबके दिलों में हैं.

फ़िल्मों के शौकीन शफ़त फारूक का कहना है, "कश्मीर एक ख़ूबसूरत जगह है. यहां फ़िल्मों की शूटिंग होना अच्छी बात है. इससे रोज़गार पैदा होता है लेकिन हम हिंदी फ़िल्मों में सिर्फ कश्मीर की नदियों और पहाड़ों को ही नहीं देखना चाहते. हम उनमें अपनी कहानी देखना चाहते हैं."

मार्च से मई के बीच यहां आधा दर्ज़न फिल्मों की शूटिंग पूरी हो चुकी है.

फ़िल्म पर्यटन को बढ़ावा

सलमान ख़ान कश्मीर में अपनी नई फ़िल्म बजरंगी भाईजान की शूटिंग के सिलसिले में एक पखवाड़े तक ठहरे थे.

जानेमाने प्रोड्यूसर वासु भगनानी ने हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म वेलकम टू कराची का प्रमोशन कश्मीर में किया है.

इस मौके पर भगनानी ने कहा, "कभी नहीं हुआ कि ऐसी फ़िल्म जिसकी शूटिंग यहां नहीं हुई हो, उसका यहां प्रमोशन हो रहा हो. यह एक बेहद ख़ूबसूरत जगह है और मेरा मानना है कि यह बॉलीवुड फ़िल्मों की लॉन्चिग के लिए बेहतर जगह है."

कश्मीर में सत्ता की बागडोर संभालने के कुछ ही दिन बाद मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद मुंबई गए थे.

वहां से लौटकर उन्होंने कहा था, ''मैंने मुंबई में दिलीप कुमार, अनुपम खेर, शाहरूख खान और कई अन्य फ़िल्मी हस्तियों से मुलाकात की. वे कश्मीर आने को तैयार हैं. हम यहां फ़िल्म पर्यटन को बढ़ावा देंगे.''

कड़वाहट

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नब्बे के दशक में चरमपंथ के उभार के बाद यहां के सारे सिनेमाघर बंद हो गए थे.

अब यहां आने वाले फ़िल्मी सितारों ने इन बंद पड़े सिनेमाघरों को फिर से खोलने का अभियान शुरू किया है.

अलगाववादी नेता असिया अंद्राबी ने कहा, "हमारे भाइयों ने इन सिनेमाघरों को बंद करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है. अब सरकार दोबारा इन्हें खोलना चाहती है लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे."

भारतीय सिनेमा के प्रति इस कड़वाहट के और भी कई कारण हैं.

यहां के लोग महसूस करते हैं कि कश्मीर में बनने वाली फ़िल्मों में उन्हें नज़रअंदाज़ तो किया ही जाता है बल्कि उन्हें गलत तरीके से भी दिखाया जाता है.

कहानी

शफ़त एक संघर्षशील फ़िल्मकार हैं. वे कहते हैं, "अगर आप कभी भी किसी कश्मीरी को फ़िल्म में देखते हैं तो या तो उसे एक चरमपंथी के रूप में दिखाया जाता है या फिर हिंसा की ओर लौटने का अफसोस करते हुए दिखाया जाता है. यह एकतरफा साज़िश हमें गुस्सा दिलाती है."

प्रसिद्ध अभिनेत्री और लेखिका दीप्ति नवल यहां के स्थानीय लोगों को अपनी कहानी लिखने के लिए प्रोत्साहित करती हैं.

उनका कहना है, "यहां बनने वाली फ़िल्में पूर्वाग्रह से ग्रस्त होती है. हम यहां ख़ूबसूरती के लिए आते हैं. यह बिल्कुल ऐसा है जैसे हीरो और हीरोइन बागों में टहलते हैं, रोमांस करते हैं और फिर चले जाते हैं. आप एक कश्मीरी को या तो नाविक या टैक्सी ड्राइवर के रूप में देखते हैं."

उनका कहना है कि स्थानीय लोगों को ख़ुद अपनी कहानी और स्क्रीन-प्ले के साथ सामने आना चाहिए.

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