कश्मीर में बढ़ती हत्याओं की वजह क्या?

  • 16 जून 2015
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भारत प्रशासित कश्मीर के विभिन्न इलाक़ों में पिछले तीन हफ़्तों में छह लोगों की हत्या हुई है.

हत्याओं का सिलसिला घाटी में मोबाइल टावर को उड़ाने और उनके मालिक की हत्या से शुरू हुआ. बाद में कुछ पूर्व चरमपंथी बताए जाने वाले लोगों की हत्या हुई.

कुछ लोग इन हत्याओं के पीछे चरमपंथी गुटों की आपसी लड़ाई बता रहे हैं.

वहीं कुछ लोग इन हत्याओं को भारतीय रक्षा मंत्री के 'कांटे से कांटा निकलाने' वाले बयान से जोड़ कर देख रहे हैं.

घाटी में अचानक शुरू हुए हत्याओं के सिलसिले के बारे में कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार बशीर मंजर से बात की बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन ने.

पढ़ें बातचीत के ख़ास अंश

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घाटी में हत्याओं में अचानक तेज़ी क्यों आ गई है?

ये हत्याएँ बहुत ही रहस्यमयी हैं. कुछ समझ नहीं आ रहा है. पहले तो ये ख़बर आई थी कि ये हिजबुल मुजाहिदीन का कोई अलग हुआ धड़ा है जिसने अपने संगठन से अलग होकर ये हत्याएँ शुरू की हैं. इसकी शुरुआत मोबाइल नेटवर्क पर रोक लगाने से हुई थी. इस बारे में लश्करे इस्लाम नाम के नए समूह के पोस्टर लगाए गए.

लेकिन जब हुर्रियत कांग्रेस के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने कहा कि ये नया समूह लश्करे इस्लाम भारतीय एजेंसियों की पैदावार है, ये कोई नया संगठन नहीं है, उसके बाद से गिलानी के क़रीबी माने जाने वाले लोगों की हत्या शुरू हो गई. इसकी शुरुआत तहरीके-हुर्रियत के स्थानीय कार्यकर्ता की हत्या से शुरू हुई.

इसके बाद से सोपोर के अलग-अलग इलाक़ों में इस तरह की हत्याएँ होने लगीं.

सरकार ने इन हत्याओं को रोकने के लिए क्या क़दम उठा रही है?

अभी तक सरकार और पुलिस क्लूलेस लग रही है. पुलिस के बयान तो आए हैं, उन्होंने कहा कि उन्हें सुराग मिल रहे हैं लेकिन सोमवार को छठी हत्या हो गई और पुलिस अभी तक नहीं बता पाई है कि इसके पीछे कौन लोग हैं, क्या किसी को इनके संबंध में गिरफ़्तार किया गया है, किसी पर शक़ है?

अजीब बात है कि यहाँ के मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद, जो गृहमंत्री भी हैं, छह हत्याओं के बाद भी उनकी तरफ़ से कोई बयान नहीं आया है.

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Image caption कश्मीरी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी

इस तरह की भी ख़बरें आ रही हैं कि जो लोग मारे गए हैं वो पूर्व चरमपंथी थे. कुछ लोग कह रहे हैं कि भारतीय रक्षा मंत्री के 'कांटे से कांटा निकालने' वाले बयान से भी संबंध हो सकता है.

कोई सीधा संबंध नहीं जुड़ सकता लेकिन जब रक्षा मंत्री का ऐसा बयान आया था उस समय यहाँ के अलगाववादी गुटों ने काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया दी थी.

ऐसा प्रयोग कश्मीर में पहले भी हो चुका है, जिसे इख्वान का दौर कहते हैं. यहाँ के लोग जानते हैं कि सरकार, सेना और पुलिस के समर्थन से इख्वान ने बहुत से अलगाववादियों को मारा था. इसलिए कुछ लोग दो और दो चार करके इसे उससे जोड़ने की कोशिश करते हैं.

सैयद अली शाह गिलानी और बाक़ी अलगावादी समूहों का यही मानना है कि ये रक्षा मंत्री के बयान के बाद शुरू हुआ है.

दूसरी तरफ़ कुछ और ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार जो लोग हत्याओं में शामिल हैं वो ख़ुद चरमपंथी हैं और हिजबुल मुजाहिदीन के लड़ाके रहे हैं. अब इन्हें पाकिस्तान स्थित हिजबुल नेताओं से कुछ दिक्कत आई है, इसलिए वो अपनी ताकत दिखाने के लिए ये सब कर रहे हैं.

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Image caption भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर

एक मोबाइल टावर को धमाके में उड़ाया गया था, मोबाइल के कारोबार से जुड़े कुछ लोगों की हत्या भी हुई?

पुलिस की तरफ़ आई रिपोर्टों के अनुसार चरमपंथियों ने सोपोर में कुछ मोबाइल टावर पर अपने कुछ डिवाइस फिट किए थे. जिसकी मदद से शायद वो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में संपर्क रखते हैं.

चरमपंथियों का कहना है कि उनके कुछ ऐसे डिवाइस चोरी हो गए थे. बाद में पुलिस ने कहा कि उन्होंने कुछ मोबाइल टावर से कुछ डिवाइस बरामद किए थे.

लेकिन मुझे नहीं लगता कि मोबाइल डिवाइस चोरी या बरामद होने का मामला इतना बड़ा मुद्दा नहीं है कि उसके लिए मोबाइल टावर उड़ा दिया जाए, उसके मालिक की हत्या की जाए. मुझे लगता है कि इसके पीछे कुछ और ही मामला है. जो अभी तक सामने नहीं आ रहा है.

मोबाइल फ़ोन के विरोध की क्या वजह है?

लश्करे इस्लाम ने पोस्टर निकाल कर कहा था कि मोबाइल की वजह से उनका बहुत नुकसान हुआ है. मोबाइल की वजह से सेना के लिए ट्रैकिंग आसान हो गई है.

मोबाइल के कारण सुरक्षा बलों का नेटवर्क काफ़ी बढ़ गया है. अब उन्हें कहीं से सूचना मिल जाती है और उसकी वजह से चरमपंथी मारे जा रहे हैं.

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मोबाइल टावर पर हमले को लेकर स्थानीय लोगों में भी आक्रोश होगा?

जब मोबाइल टावर पर हमले शुरू हुए तो लोगों ने इसका विरोध किया. सैयद अली शाह गिलानी और यासीन मलिक समेत सभी अलगाववादी समूहों ने भी इसका विरोध किया है. उन्होंने कहा कि आज मोबाइल के बिना जीवन संभव नहीं है.

शुरू में तो मोबाइल टावर से जुड़े लोगों की हत्या हुई. लेकिन बाद में जो तीन लोग मारे गए वो किसी ने किसी चरमपंथी समूह से जुड़े रहे हैं.

इनमें से एक के गिलानी के समूह से जुड़ा रहा है. दूसरा जो मारा गया उसे जेकेएलएफ़ का पूर्व चरमपंथी कहा जा रहा है. तीसरा व्यक्ति, जो मारा गया है वो भी किसी संगठन का पूर्व चरमपंथी बताया जा रहा है. यानी इन सभी लोगों का कभी न कभी सेना से वास्ता रहा है.

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