कोयला आवंटनः ज़मीन भी गई, नौकरी भी गई

  • 17 जून 2015
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छत्तीसगढ़ में जिन कोल ब्लॉक को नीलामी के बाद दूसरी कंपनियों को आवंटित किया गया है उनमें नौकरी करने वाले भू-विस्थापित परेशान हैं.

ताज़ा मामला रायगढ़ की जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड का है. जिंदल ने कोयला खदान में कार्यरत कर्मचारियों को नौकरी से बाहर निकालने के लिए नोटिस जारी किया है.

जिंदल के कोल ब्लॉक और विस्थापन के मुद्दे पर ग्रामीणों की लड़ाई लड़ रही अधिवक्ता सुधा भारद्वाज ने इसे सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन बताया है.

हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड के जनसंपर्क विभाग से इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं मिल पाई.

क्या है मामला

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मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के कार्यकाल में जिंदल को गारे-पलमा की खदानें आवंटित की गई थीं, जिनमें जिंदल ने कोयला खनन का काम भी शुरू कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने जब सारी कोयला खदानों का आवंटन रद्द कर दिया और नए सिरे से नीलामी हुई तो जिंदल स्टील एंड पॉवर ने गारे-पलमा और गारे-पलमा के लिए सबसे ऊंची बोली लगाई थी, जबकि गारे पलमा के लिए बाल्को ने बोली लगाई.

लेकिन इसी साल मार्च में सरकार ने नीलामी में कथित ‘सांठगांठ’ का आरोप लगाते हुए गारे-पलमा की खदानों को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कोल इंडिया को आवंटित कर दिया.

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जिंदल कंपनी ने इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती भी दी है.

नौकरी से निकालने की नोटिस

इस बीच जिंदल ने गारे-पलमा के उन सैंकड़ों भू-विस्थापितों समेत दूसरे कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के लिए नोटिस थमा दिया है, जिन्हें ज़मीन के बदले नौकरी दी गई थी.

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गारे-पलमा के विस्थापितों का कहना है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हमें नौकरी दे. हमें इससे क्या मतलब कि सरकार ने हमारी ज़मीन किसे दी और किसे रद्द कर दी है.

जिंदल के कोल खदान से प्रभावित करम सिंह कहते हैं, “सरकार ही ज़मीन का अधिग्रहण करती है और उसे कंपनी को देती है. इसलिए ये सरकार की ज़िम्मेवारी है कि वह भू- विस्थापितों को नौकरी से निकाले जाने की हालत में नई जगहों पर समायोजन करे.”

कुछ हैं ख़ुश

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हालांकि कुछ लोग इससे ख़ुश भी हैं कि कोयला खदानें जिंदल के बजाय कोल इंडिया को दी गई हैं.

कोसमपाली के कन्हाई पटेल कहते हैं, “हमारे गांव के 76 लोग प्रभावित हुए थे, जिनमें से जिंदल ने केवल 35 लोगों को नौकरी दी थी. कोयले की लूट करके मुनाफा कमाने वाली निजी कंपनियों से तो कोल इंडिया ठीक ही होगी. अब कम से कम कोल इंडिया को खदानें मिली हैं तो सभी लोगों को ढंग की नौकरी तो मिलेगी.”

हालांकि कोल इंडिया की स्थानीय इकाई साउथ इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के जनसंपर्क अधिकारी ने खदानों के आवंटन का मामला अदालत में होने का हवाला देते हुए किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

ग़ैर-क़ानूनी क़दम

आदिवासियों और भू विस्थापितों की ओर से जिंदल के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में मामला दर्ज़ कराने वाली अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, जिंदल के ताज़ा क़दम को ग़ैरक़ानूनी मानती हैं.

सुधा भारद्वाज के अनुसार, “सुप्रीम कोर्ट ने जिस मुक़दमे की सुनवाई करते हुए कोल ब्लॉक का आवंटन रद्द किया है उसमें यह साफ़ निर्देश था कि कोल खदानों में काम करने वालों के हित प्रभावित न हों. ज़ाहिर है, जिंदल का नोटिस उस आदेश का उल्लंघन है.”

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