दो साल बाद भी शेष हैं उत्तराखंड आपदा के निशां...

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पिथौरागढ़ ज़िले में जौलजीवी बाज़ार के पास भारत को नेपाल से जोड़ने वाला एकमात्र पुल पिछले दो साल से टूटा पड़ा है.

नेपाल के लोग सौदा-सुलुफ़ ख़रीदने के लिए जौलजीवी बाज़ार ही आते हैं लेकिन पुल टूट जाने की वजह से अब वो एक रस्सी के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं.

जौलजीवी उत्तराखंड में भारत-नेपाल सीमा पर बहने वाली महाकाली और गोरी नदियों का संगम स्थल है.

राज्य में दो साल पहले भयंकर प्राकृतिक आपदा ने कई इलाक़ों को तहस नहस कर दिया था. राज्य सरकार ने तेज़ी से पुनर्निर्माण के दावे किए.

मगर जौलजीवी और ऐसे कई इलाक़ों में रहने वालों को फिर भी राहत नसीब नहीं हुई.

महाकाली के दूसरे छोर पर नेपाल के कई गांव सीमा के इस पार मौज़ूद जौलजीवी बाज़ार पर ही निर्भर हैं.

बाजार में मंदी

जौलजीवी में पैदल पुल नहीं बनने के कारण नेपाल से भारत आने के लिए रस्सी ही एकमात्र साधन है. इसमें हाथों से खींची जाने वाली एक ट्राली लगी है.

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इस ट्राली से नदी पार करने का अधिकतम किराया 50 रूपये है. पार जाने के लिए अक्सर भीड़ लगी रहती है.

अक्सर लोगों को ट्राली खींचने वाले से अपनी बारी के लिए झगड़ते भी देखा गया है.

ट्राली खींचने वाले लोकेंद्र सिंह धामी कहते हैं, ‘‘ये व्यवस्था नेपाल सरकार ने नहीं बल्कि ग्राम पंचायत ने की है और इसमें हुए हादसे की ज़िम्मेदारी किसी की भी नहीं है.’’

स्थानीय लोगों को दिन में कई बार नदी पार करनी पड़ती है और जौलजीवी बाज़ार का अधिकतम व्यापार नेपाल से आने वाले ग्राहकों पर ही निर्भर है.

लेकिन पुल न बन पाने और रस्सी के पुल के ज़रिए नदी पार करना महंगा हो जाने के चलते जौलजी़वी के भरे-पूरे बाज़ार में इन दिनों धंधा मंदा है.

राष्ट्रीय राजमार्ग को नुक़सान

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महाकाली में साल 2013 में आई बाढ़ ने दोनों ही देशों के सीमाई इलाक़ों में तबाही मचा दी थी.

इस तबाही में जानमाल का केदारनाथ जैसा नुक़सान तो नहीं हुआ था लेकिन स्थानीय लोगों की रिहाइशों, खेती और आजीविका को भारी क्षति पहुंची.

सीमांत के इस पूरे इलाक़े को जोड़ने वाला जौलजीवी से तवाघाट राष्ट्रीय राजमार्ग नदी में आई बाढ़ के चलते जगह-जगह पूरी तरह गायब हो गया.

आपदा के दो साल गुज़र जाने के बाद भी ये राजमार्ग अब तक ख़स्ताहाल है.

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जौलजीवी से धारचूला के बीच गड्ढों भरी सड़क में टैक्सी चलाने वाले पदम सिंह ख़स्ताहाल सड़क की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘‘अब पूरी सड़क का रास्ता बदलना पड़ा है और काम बहुत धीमा चल रहा है.’’

गांव बह गए

बाढ़ के कारण इस इलाक़े के कई गांव नदी में बह गए थे.

बलवाकोट, छारछुम, नया बस्ती, गोठी, तपोवन, दोबाट, ऐलागाड़, तवाघाट, और सोबला में नदी कई मकानों को अपने साथ बहा ले गई.

सोबला गांव में अपनी दुकान गँवा चुके कृष्ण सिंह बताते हैं कि वहां 90 फ़ीसद मकान बाढ़ की चपेट में आ गए थे.

उन्होंने कहा, ''मुझे सात लाख रूपया मुआवजा तो मिला है लेकिन इससे नया घर और नई आजीविका बनाना मुमकिन नहीं है.''

नेपाल के इलाक़े

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बाढ़ ने नेपाल के इलाक़ों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है.

नेपाल का ज़िला मुख्यालय दारचुला एक बाज़ार है. 2013 की आपदा ने इस बाज़ार पर सीधे मार की और नदी अपने तेज बहाव में यहां के तकरीबन 25 इमारतों को बहा ले गई.

डम्मर सिंह खाती के मकान का भी एक हिस्सा नदी में बहा लेकिन उन्होंने फिर से नदी में पिलर डाल अपने मकान को दुरुस्त कर लिया है.

वह कहते हैं, ‘‘नदी ने अपना रास्ता पूरा बदल दिया है. जहां पर नदी अभी बह रही है उसके बीच में मकान हुआ करते थे."

धौलीगंगा परियोजना पर आरोप

फकीर सिंह धामी का मकान भी बह गए मकानों में शामिल था. वह नदी में आई भीषण बाढ़ का दोष भारत में बनी धौलीगंगा जल विद्युत परियोजना को देते हैं.

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उनका कहना है, ‘‘बाढ़ के समय धौलीगंगा बांध से छोड़े गए पानी ने महाकाली का जलस्तर बढ़ा दिया जिससे बाढ़ का पानी बहुत बढ़ गया.'’

इस इलाक़े में बांध परियोजनाओं के प्रभावों पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता थियो फिलस भी कहते हैं, ''धौलीगंगा परियोजना से अचानक छोड़े गए पानी ने तबाही को बहुत बढ़ा दिया था.''

लेकिन एनएचपीसी की इस परियोजना के अधिकारी इन आरोपों से इनकार करते हैं. वह कहते हैं कि धौलीगंगा परियोजना को 2013 की इस बाढ़ से पांच गुना अधिक प्रभावशाली बाढ़ झेल लेने के लिहाज से डिजाइन किया गया है.

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उनका कहना है कि परियोजना के बांध ने नदी के निचले इलाक़ों मे बाढ़ की तीव्रता को रोकने का काम किया.

उपजाऊ खेतों की जगह नदी के एकदम चौड़े हो गए पाट, उस पर फैली रेत, ढेर सारा मलबा और किनारे भूस्खलन से दरके पहाड़ों से गुजरती टूटी-फूटी सड़कें बता रही हैं कि आपदा का असर न इस भूगोल से जा पाया है और न ही इस समाज से.

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