परमजीत पम्मा को गुस्सा क्यों आता है?

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परमजीत सिंह पम्मा उस शख़्स का नाम है जिसे सोशल मीडिया ने भारत का 'सबसे ग़ुस्सैल आदमी' होने का ख़िताब दिया.

मीडिया साइट Buzzfeed.com ने कुछ दिन पहले एक शख्स की कहानी जारी की और इसके बाद शुरु हुई 'सबसे ग़ुस्सैल आदमी' की खोज. बीबीसी ने आखिरकार उन्हें खोज निकाला और ये व्यक्ति हैं परमजीत सिंह पम्मा.

पम्मा 'दिल्ली की सड़कों पर विरोध की आवाज़' हैं. वे कुछ सालों से तमाम तरह के मुद्दों पर दिल्ली की सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन करते रहे हैं.

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Image caption साल 2005 में दिल्ली में प्याज के दाम काफी बढ़ गए थे.

43 वर्षीय पम्मा कहते हैं कि उनके पिता ने उन्हें 'धरनों की दुनिया' से जोड़ा.

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Image caption साल 2006 में चरमपंथ के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन.

16 साल की उम्र में वे 'एक ग़ुस्सैल प्रदर्शनकारी' बन गए थे और 'भीड़ का नेतृत्व करना' उन्हें बेहद रास आता था.

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Image caption साल 2008 में रसोई गैस, पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ी हुई क़ीमत के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन.

उन्होंने 14 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया जिसकी वजह से वे माध्यमिक स्तर तक की ही पढ़ाई कर पाए.

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Image caption साल 2009 में बीजेपी के नेता वरूण गांधी के 'मुसलमान विरोधी बयान' ने पम्मा को नाराज़ कर दिया.

लेकिन 'पढ़ाई-लिखाई की ये कमी' देश-विदेश के मुद्दों पर राय बनाने में बाधक नहीं रही. वो अपने आस-पास घटने वाली हर घटना पर एक राय रखते हैं.

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Image caption समलैंगिक संबंध को मान्यता देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले से भी वे चिढ़ गए.

उनका कहना है, "मैं एक आम आदमी हूं और जब एक आम आदमी किसी भी वजह से परेशान होता है तो मुझे ग़ुस्सा आता है."

मसलन अकेले साल 2008 में उन्हें गैस के बढ़ते दाम, टीवी पर बढ़ती नग्नता, महंगाई, समलैंगिकता जैसी तमाम चीज़ों पर गुस्सा आया.

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Image caption टीवी पर 'नग्नता' और 'फूहड़ता' ने भी उन्हें गुस्सा दिला दिया.

साल 1997 में पम्मा ने 'आम नागरिकों की तरफ से आवाज़ उठाने के लिए' राष्ट्रीय अकाली दल की स्थापना की जो "सभी राजनीतिक दलों की ग़लत करतूतों को उजागर करता है. "

पुरानी दिल्ली के सदर बाज़ार में एक छोटी सी सिलाई के सामान की दुकान से लेकर एक प्रदर्शनकारी की भूमिका निभाने के लिए परमिंदर सिंह पम्मा ने अपनी ज़िंदगी में ''बहुत कुर्बानियां'' दी हैं.

भावुक इंसान

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Image caption साल 2008 में स्कूली बच्चों के पगड़ी पहनने पर प्रतिबंध लगाने के फ्रांस सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन.

वो कहते हैं कि शोर-शराबे वाले प्रदर्शनों ने उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है.

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Image caption साल 2009 में लंदन में गुरुद्वारे पर हुए हमले के कारण नाराज़ पम्मा.

उन्होंने बताया, "मैं दो साल पहले दिल की परेशानी से गुजर चुका हूं. दो बार मेरी सर्जरी हो चुकी है. मेरी बीवी हमेशा मेरे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहती है और मुझे तनाव मुक्त होने के लिए कहती है."

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Image caption साल 2010 में भारतीयों पर हुए नस्ली हमलों के ख़िलाफ़ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रड का पुतला जलाते पम्मा.

पम्मा का कहना है कि वे घर में एक बिल्कुल अलग इंसान होते हैं.

उन्होंने कहा, "मैं एक बहुत ही भावुक इंसान हूं. मैं लोगों से जुड़े छोटे से छोटे मुद्दों पर रोने लगता हूं."

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Image caption साल 2012 में अमरीका के विस्कॉन्सिन में एक गुरुद्वारे में हुई गोलीबारी के ख़िलाफ़

यह पूछे जाने पर कि आप कैसे फ़ैसला लेते हैं कि किस बात पर विरोध-प्रदर्शन करना है, उनका जवाब था, "मेरे अख़बार पढ़ने का तरीका दूसरों से अलग है. मेरी नज़र उस मुद्दे को ढूंढती है जिस पर आवाज़ उठाना ज़रूरी होता है. एकबार मुझे पता चल जाता है कि किस मुद्दे पर आवाज़ उठानी जरूरी है तो उसके बाद लोगों को इकट्ठा करने और पत्रकारों को बुलाने का काम शुरू होता है."

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Image caption पम्मा का कहना है, "मैं पूरे दिल से विरोध-प्रदर्शन करता हूं और जब मामला पाकिस्तान का आता है तो मेरी आवाज़ सबसे तेज़ होती है."

कई सालों से पत्रकारों को विश्व के कई नेताओं के ख़िलाफ़ भी उनके गुस्से को कवर करने का बुलावा आता रहा है.

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Image caption वो कहते हैं, "मैं बता नहीं सकता कि जब मैं पाकिस्तान के ख़िलाफ़ या भारतीय सेना से जुड़े किसी मुद्दे पर प्रदर्शन करता हूं तो कितने ग़ुस्से में होता हूं."

लेकिन सवाल ये है कि उन्हें सबसे ज्यादा गुस्सा किस पर आता है?

पम्मा का सीधा-सपाट जबाव है, 'पाकिस्तान'.

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