बेनज़ीर... पाकिस्तान की 'मिसाइल मदर'

  • 20 जून 2015
इंदिरा गांधी, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो और  बेनज़ीर भुट्टो शिमला हैलिपैड पर इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption इंदिरा गांधी, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो और बेनज़ीर भुट्टो शिमला हैलिपैड पर

बेनज़ीर अपने दोस्तों को ये कहानी बताते नहीं थकती थीं कि किस तरह 1972 में शिमला समझौते के दौरान इंदिरा गाँधी की निगाहें हमेशा उनका पीछा करती रहती थीं.

इंदिरा गाँधी की जिस चीज़ ने उन्हें सबसे ज्यादा आश्चर्य में डाला वो था उनका छोटा कद.

लेकिन बरसाती पहन कर भी उनके लावण्य में कोई कमी नहीं दिखाई देती थी. उनको देखते ही बेनज़ीर के मुंह से बेसाख़्ता निकला था ‘अस्सलाम अलै कुम!‘

इंदिरा गाँधी ने मुस्कराते हुए जवाब दिया था, ‘नमस्ते !’

सुनिए: बेनज़ीर...स्पोर्ट्स कार और मिसाइल

शाम को जब बेनज़ीर भुट्टो शिमला के माल रोड पर चहलकदमी करने निकलीं तो वहाँ उनको देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई.

पूरे भारत में बेनज़ीर भुट्टो के कपड़ों की चर्चा थी, लेकिन बहुत कम लोगों को पता था कि ये कपड़े उन्होंने अपनी दोस्त सामिया की बहन से उधार लिए थे... क्योंकि उनके पास पहनने के लिए थीं सिर्फ़ दो कुर्तियाँ और दो जोड़ी जींस...

पढ़िए रेहान फ़ज़ल की विवेचना विस्तार से

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Image caption किशोर उम्र में बेनज़ीर भुट्टो

बेनज़ीर भुट्टो को कई नामों से पुकारा जाता था. कोई उन्हें शहज़ादी कहता था तो कोई मोहतरमा, बीबी या मिस साहिबा.

माता-पिता उन्हें पिंकी कहकर पुकारते थे. ये अलग-अलग नाम और उनसे जुड़ी छवि लोगों के दिल में भ्रम पैदा करती थी.

पाकिस्तान में वो ठेठ परंपरावादी महिला होतीं, जो अपना सिर हमेशा ढके रखतीं और विदेशी मेहमानों से हाथ मिलाने से परहेज़ करतीं.

लेकिन ऑक्सफ़र्ड में अपनी पढ़ाई के दौरान वो बदरंग जींस और टी-शर्ट पहनतीं और कभी-कभार व्हाइट वाइन का ग्लास लेने में उन्हें कोई गुरेज़ नहीं होता.

पीले रंग की स्पोर्ट्स कार

ऑक्सफ़र्ड में उनसे दो साल सीनियर और ऑब्ज़र्वर अख़बार के विदेशी मामलों के पूर्व संवाददाता और भारत के जाने-माने पत्रकार प्रेम भाटिया के पुत्र श्याम भाटिया ने बेनज़ीर की उठापठक भरी ज़िंदगी को बहुत नज़दीक से देखा है.

बीबीसी से बात करते हुए श्याम भाटिया कहते हैं, ''बेनज़ीर में बहुत जीवंतता हुआ करती थी. उनके बहुत से दोस्त होते थे. पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने उनके लिए पीले रंग की एक कार ख़रीदी थी."

"हम लोग ग़रीब थे उन दिनों. उनके पिता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हुआ करते थे. बेनज़ीर कभी-कभी लंदन जाती थीं अपनी गाड़ी में.''

श्याम भाटिया ने बताया, ''दोस्तों को भी ले जाती थीं अपने साथ फ़िल्म दिखाने. अगर हम उनसे टेलीफ़ोन पर बात नहीं कर पाते थे तो उनकी कार के विंड स्क्रीन पर मैसेज चिपका देते थे. बहुत दिलचस्प औरत थीं. दोस्तों की दोस्त और वफ़ादार. उस समय उनका कोई दुश्मन नहीं हुआ करता था.''

शिमला में देखी पाकीज़ा फ़िल्म

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ऑक्सफ़र्ड के ज़माने की उनकी दोस्त पिक्टोरिया स्कोफ़ील्ड बताती हैं कि बेनज़ीर ने ऑक्सफ़र्ड के लेडी मार्ग्रेट हॉल से पीपीई यानी पॉलिटिक्स, फ़िलोसॉफ़ी और इकॉनॉमिक्स की डिग्री ली थी.

स्कोफ़ील्ड बताती हैं, ''उस ज़माने में उनके लंबे बाल हुआ करते थे वो असाधारण दिखती थीं. लेकिन उनको देखकर ये कतई आभास नहीं मिलता था कि वो अपने पिता के पद चिन्हों पर चलकर राजनीति में चली जाएंगी लेकिन बाद में वो राजनीति में गईं तो वहीं की होकर रह गईं.''

लेकिन ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो उन्हें शुरू से ही राजनीति में लाना चाहते थे. वर्ष 1972 में जब वो शिमला समझौता करने भारत आए तो अपने साथ हॉर्वर्ड से पढ़कर लौटी 18 वर्षीय बेनज़ीर भुट्टो को भी साथ लाए.

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Image caption शिमला समझौते पर दस्तख़त करते इंदिरा गांधी और जु़ल्फ़िकार अली भुट्टो

भुट्टो के पूर्व प्रेस सचिव और शिमला आने वाले पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के सदस्य ख़ालिद हसन ने बीबीसी को बताया था, ''भुट्टो साहब ने बीबी को मेरे चार्ज में दिया हुआ था. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम उस पर निगाह रखो और किसी अख़बार वाले से नहीं मिलने दो."

"मैं बेनज़ीर को पाकीज़ा फ़िल्म दिखाने ले गया. भुट्टो साहब नहीं जाना चाहते थे इसलिए उन्होंने ये ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी. हम लोगों ने मॉल रोड पर सैर की और भुट्टो साहब के लिए 20-22 किताबें ख़रीदीं. उनमें से दो किताबें पंडित नेहरू की लिखी हुई थी जिन्हें उन्होंने मुझे ख़ास तौर से लाने के लिए कहा था.''

जेब में परमाणु कार्यक्रम की सीडी

ऑक्सफ़र्ड के बाद भी श्याम भाटिया बेनज़ीर के लगातार संपर्क में रहे.

बेनज़ीर ने उन्हें कई बातें बताईं लेकिन उनसे वादा लिया कि वो उन्हें उनके जीते जी नहीं छापेंगे. सबसे सनसनीख़ेज बात ये थी कि वो उत्तरी कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के बदले पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की सीडी लेकर खुद प्यॉन्गयॉन्ग गई थीं.

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श्याम भाटिया याद करते हैं, ''एक बार जब हम बैठे थे तो बेनज़ीर ने कहा कि मैं तुमको बहुत सीक्रेट चीज़ बताना चाहती हूँ. मैं जब तक ज़िंदा हूँ, तुम्हें ये बात किसी को बतानी नहीं है."

वो आगे बताते हैं, "उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं कि मेरे पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के पिता थे, लेकिन पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम की कोई माँ है तो वो मैं हूँ. फिर उन्होंने मुझे कहानी बताई कि वो उत्तर कोरिया जा रही थीं. उन्होंने एक मिसाइल बनाई थी नोडॉन्ग. उत्तर कोरिया की सरकार पाकिस्तान के परमाणु सीक्रेट चाहती थी.''

श्याम भाटिया याद करते हैं, ''बेनज़ीर ने अपने ख़ुफ़िया प्रमुख और वैज्ञानिकों से बात कर परमाणु संवर्धन तकनीक की सीडी बनवाई और उत्तर कोरिया की राजकीय यात्रा के दौरान उसे अपनी जेब में रखकर प्यॉन्गयॉन्ग ले गईं."

"उत्तर कोरिया की सरकार ये जानकर बहुत खुश हुई कि पाकिस्तान की प्रधानमंत्री ख़ुद परमाणु सीक्रेट लेकर उनके यहाँ आई हैं. उसके बदले उन्होंने बेनज़ीर को अपनी नोडॉन्ग मिसाइल का डिज़ाइन दे दिया. बेनज़ीर के बहुत वरिष्ठ सलाहकार को, जिनका नाम मैं नहीं बताना चाहूँगा, जब मैंने ये कहानी बताई तो वो हंस पड़े."

"उन्होंने कहा कि बेनज़ीर ने आपको आधी कहानी बताई है. जब वो प्यॉन्गयॉन्ग से वापस आईं तो उसी जहाज़ में पूरी की पूरी नोडॉन्ग मिसाइल अपने साथ लाईं.''

बढ़ाचढ़ा कर बताई गई कहानी

जब ख़ालिद हसन से ये पूछा गया कि इस बात को वो कितना सच मानते हैं तो उनका कहना था कि आमतौर से प्रधानमंत्री इस तरह की सूचनाओं के वाहक का काम नहीं करते.

ख़ालिद हसन ने कहा, ''ये तो लंबी कहानी मालूम होती है. बेनज़ीर ने ख़ुद अपनी किताब में लिखा है और कहा भी है कि पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया को पैसे देकर नोडॉन्ग मिसाइल का डिज़ाइन ख़रीदा था. एक्यू ख़ान ने भी इस बात की पुष्टि नहीं की है. मुझे इस बात की सच्चाई पर शक है."

उन्होंने कहा, "मान लीजिए कि उत्तर कोरिया को कुछ देना ही था, तो ये तो नहीं होता कि प्रधानमंत्री उसको अपने हैंड बैग में लेकर जाएंगी. इस तरह की चीज़ें आमतौर से डिप्लोमेटिक बैग में जाती हैं जिन्हें खोला नहीं जाता.''

बेनज़ीर का खंडन

वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा भी भारत-पाकिस्तान मामलों पर पैनी नज़र रखते हैं.

उनका कहना है कि हो सकता है श्याम भाटिया मामले को थोड़ा बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहे हों, लेकिन इस पूरे मामले को सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता.

इंदर मल्होत्रा का मानना है, ''इस बात में कोई शक नहीं कि फ़ौज के साथ बेनज़ीर के संबंध बहुत अच्छे नहीं थे और पाकिस्तानी फ़ौज ने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर हमेशा पूरा नियंत्रण रखा है."

"लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि बेनज़ीर भुट्टो पहले प्यॉन्गयॉन्ग गई थीं और उसके बाद पाकिस्तान के कुख्यात परमाणु वैज्ञानिक एक्यू ख़ान वहाँ कई बार गए. इस बात पर बहस हो सकती है कि वो अपनी जेब में परमाणु जानकारी लेकर गईं कि नहीं लेकिन बुनियादी बात ये है कि पाकिस्तान ने कहा था कि आप हमें मिसाइल का डिज़ाइन दीजिए. बदले में हम आपको परमाणु संवर्धन का फ़ॉर्मूला देंगे."

"इसमें श्याम भाटिया का क़सूर नहीं है कि उन्होंने ये बात रिकॉर्ड पर नहीं कही और उसके कुछ महीनों बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा और श्याम भाटिया से भी कहा कि उन्होंने इस तरह की बात कभी नहीं की. मेरा मानना है कि श्याम भाटिया जो इतने बड़े पत्रकार का बेटा है, अपनी तरफ़ से इन चीज़ों को गढ़ेगा नहीं.''

जेल में पिता से आख़िरी मुलाक़ात

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Image caption ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो

श्याम भाटिया ने अपनी किताब 'गुडबाई शहज़ादी' में वर्ष 1988 में राजीव गांधी की पाकिस्तान यात्रा का भी ज़िक्र किया है.

उन्होंने बेनज़ीर को ये कहते बताया था कि उन्होंने पंजाब में आतंकवाद को समर्थन न देने का फ़ैसला किया था. बदले में भारत को सियाचिन से अपनी सेना हटानी थी.

लेकिन राजीव गाँधी ये वादा पूरा नहीं कर पाए क्योंकि वो अगला चुनाव हार गए. बेनज़ीर की दोस्त पिक्टोरिया स्कोफ़ील्ड याद करती हैं कि बेनज़ीर भुट्टो के जीवन का सबसे अधिक दुखदाई क्षण था अपने पिता से उनकी आखिरी मुलाकात.

पिक्टोरिया कहती हैं, ''वो हर हफ़्ते अपने पिता से मिलने जेल जाया करती थीं और उनके साथ एक-दो घंटे बिताती थीं. उनके पिता को 4 अप्रैल को फांसी पर चढ़ा दिया गया. एक दिन पहले ही वो अपनी माँ के साथ उनसे मिलने गई थीं. सबसे सदमे वाली बात ये थी कि उन्हें ये नहीं बताया गया था कि ये उनकी आखिरी मुलाकात होगी."

वो आगे बताती हैं, "अचानक भुट्टो ने जेल अधीक्षक से पूछा कि क्या हम आख़िरी बार मिल रहे हैं? जब उसने हाँ में जवाब दिया तो बेनज़ीर ने कहा कि क्या आप जेल का दरवाज़ा खोल सकते हैं ताकि मैं अपने पिता को आख़िरी बार गले लगा सकूँ. लेकिन उन्हें ये अनुमति नहीं दी गई.''

उर्दू में हाथ तंग

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Image caption बेनज़ीर भुट्टो की रावलपिंडी में आख़िरी रैली

बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तानी विदेश सेवा में जाना चाहती थीं, लेकिन नियति उन्हें राजनीति में ले आई.

दिलचस्प बात ये थी कि उर्दू ज़ुबान में उनका हाथ तंग था, लेकिन अंग्रेज़ी भाषा पर उनकी पकड़ ज़ोरदार थी.

दुनिया में बहुत कम महिलाएं ऐसी थीं जो उसी सलीके और निपुणता से स्पोर्ट्स कार चला सकती थीं और पाकिस्तान के परंपरागत समाज में चादर भी ओढ़ सकती थीं.

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