सिक्के, दादा के दादा के ज़माने के...

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बिहार के कैमूर के कुदरा बाजार में एक टूटा फूटा सा घर. इतना छोटा कि जहां शुरू हो, वहीं पर ही खत्म होता सा लगे. पूरा घर लोहे के छोटे-छोटे बक्से से पटा पड़ा है.

लेकिन घर के मालिक मनोज और लल्लू जैसे-जैसे अपने साजो सामान को एक–एक करके दिखाते हैं, आप दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर से होने लगते हैं.

500 से ज़्यादा नए-पुराने सिक्कों का संग्रह और बड़ी तादाद में डाक टिकट.

दिलचस्प बात है कि सिक्कों और डाक टिकटों से सेठ परिवार का ये इश्क कब और कैसे शुरू हुआ, ये परिवार को भी नहीं पता.

पूरे परिवार में मैट्रिक से ज़्यादा किसी ने पढ़ाई नहीं की, लेकिन टिकट और सिक्कों का शौक ऐसा कि शब्दों में बयां करना मुश्किल.

चूंकि परिवार पढ़ा लिखा नहीं है और इसलिए अपने संग्रह के बारे में खुद भी ज़्यादा जानकारी नहीं है.

नशे जैसा...

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मनोज कहते हैं, “हमारे लिए ये नशे जैसा है. कोई नया सिक्का निकला, अगर वो हम नहीं मंगा पाए तो ये हमारे लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब हो जाता है.”

तीस साल के मनोज का खानदानी पेशा अख़बार बेचना है. छोटे भाई लल्लू के साथ मिलकर वो रोज अख़बार बेचते हैं और घर चलाने के बाद जो भी पैसा इन भाइयों के पास बचता है वो सिक्का मंगाने पर ही खर्च होता है.

दरअसल डाक टिकट और सिक्कों के संग्रह का शौक इन्हें विरासत में मिला है. पिता बच्चन प्रसाद सेठ भी अख़बार बेचते थे.

साल 2013 में जब उनकी मृत्यु हुई तब तक डाक टिकट का संग्रह करते रहे थे. उनकी पत्नी फुलझरी देवी डाक टिकट के संग्रह का सही सही वक़्त तो नहीं बता पाती.

लेकिन वो कहती हैं, “जब हम ब्याह के आए तभी से उन्हें टिकट इकट्ठा करते देखते थे. वो खाते मोटा थे, लेकिन टिकट की बड़ी रखवाली करते थे. टिकट पर पाउडर डालकर बक्से में बंद करके रखते थे.”

डाक टिकट से सिक्कों तक

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लेकिन मिट्टी का घर होने के चलते बारिश में अक्सर डाक टिकट खराब हो जाते थे.

लल्लू बताते हैं, “कितने टिकट घर में दब कर बर्बाद हो गए. तो तय किया कि सिक्कों का संग्रह करेंगे. उसके बाद सरकार ने जो भी सिक्का निकाला, उसको हम बंबई, कलकत्ता से मंगा लेते थे. हमारे पास 1000, 100, 150, 75 रू के सिक्के तो हैं ही, इसके अलावा मुस्लिम शासन के ज़माने के भी हैं.”

दिलचस्प है कि तकरीबन 5000 की आबादी वाले कुदरा बाज़ार में अख़बार वाले सेठ परिवार ने बहुत सारे लोगों को टिकट संग्रह की प्रेरणा दी.

55 साल के सुरेंद्र रस्तोगी 80 के दशक से ही डाक टिकट का संग्रह कर रहे हैं. उनको तीन राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं.

वो कहते हैं, “कुदरा बाजार और आस पास के इलाकों में 6 आदमी डाक टिकट मंगाते हैं. राजीव, जगत नारायण सरदार, अजय कृष्ण, सुरेश अग्रवाल, सेठ परिवार इनमें से कुछ नाम हैं. बाकी कई नौजवान हैं जिन्होंने अभी उसे अपनाया ही है. कुदरा जैसी छोटी जगह के लिए ये बड़े गर्व की बात है.”

निवेश

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दरअसल, कुदरा बाजार में अब ये समझ धीरे धीरे फैल रही है कि डाक टिकट में निवेश बहुत अच्छा विकल्प है. यही वजह है कि डाक टिकट संग्रह करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.

अतुल हाल ही में ग्रेजुएट हुए हैं और बीते 2 साल से डाक टिकट का संग्रह करना शुरू किया है.

बकौल अतुल, “इस संग्रह में शौक के साथ साथ आय भी है. मैं टिकट तो जीपीओ से अभी नहीं मंगाता, लेकिन स्टाम्प कलेक्टर से टिकट और सिक्के खरीदता हूँ.”

मनोज कहते हैं, “लोग हमको डरा धमका कर हमसे हमारी ये पूंजी छीनना चाहते हैं, लेकिन हमारे लिए तो ये जान से भी ज़्यादा प्यारे हैं, हम इन्हे पढ़ नहीं सकते, लेकिन इनको देखना ही हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी है.”

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