'उनका मानव मानव, हमारा-आपका दानव..'

  • 20 जून 2015
ललित मोदी

तो, अब हमें मालूम हुआ कि भारत की सरकार में मानवीयता नाम की एक चीज़ है.

यह भी बताया गया कि जब मानवीयता का इस्तेमाल हो रहा हो तो नैतिकता का सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए.

अब तक तो हम यही समझे थे कि राष्ट्रवाद मानवीयता और नैतिकता से ऊपर है या शायद राष्ट्रवाद ही सबसे बड़ी नैतिकता है, लेकिन अब हमारी जानकारी में इज़ाफ़ा किया गया है और बताया गया है कि मानवीयता इन सबसे ऊपर है.

इससे हमारे उन वोटरों को ज़रा ‘कन्फ्यूज़न’ होगा जिन्होंने राष्ट्रवाद के नाम पर इस सरकार को केंद्र में ला बिठाया था, लेकिन अभी तो शुरुआत है.

अभी नए-नए ‘कन्फ्यूज़न’ होने हैं और उनकी सफाई भी की जानी है.

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यह ग़लतफ़हमी भी अब तक थी कि सरकारों का काम क़ानून की हिफ़ाज़त करना है. अब यह पता पड़ा है कि आप मोबाइल फ़ोन से क़ानून का रास्ता छोड़कर मानवीयता का बाईपास पकड़ कर कहीं का कहीं जा-आ सकते हैं.

ऐसा करने के लिए आपका मिनिस्टर होना काफ़ी है और वह भी अगर आप ‘फॉरेन मिनिस्टर’ हैं तो फिर किसी और बात की दरकार ही नहीं रह जाती.

तो साहब, बताया गया कि आख़िर एक ग़रीब भारतीय अपनी बीमार बीवी से मिलने जाना चाहता था और मिनिस्टर साहिबा ने रहम खाकर उस बेचारे की मदद के लिए एक फ़ोन ही तो किया है, फिर हंगामा क्यों बरपा है: न तो डाका डाला है और न चोरी की है.

कुछ तत्त्व हैं जो हमेशा राई को पहाड़ बनाने पर लगे रहते हैं.

किस्म किस्म के मानव

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जिस काम के लिए मिनिस्टर को मानवीयता का वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए, उसे वे भारतीय क़ानून का उल्लंघन और अपराध बता रहे हैं.

कुछ और भी हैं जो पूछ रहे हैं कि मानवीयता की परिभाषा क्या है!

मानवीयता शब्द मानव से बना है. हर कोई जो दोपाया है, जिसके दो हाथ, दो आंखें, एक दिल और एक दिमाग वगैरह-वगैरह होता है, मानव कहा जाएगा.

लेकिन हर मानव मानव नहीं माना जाता. कुछ ज़्यादा मानव होते हैं, कुछ कम.

मसलन, जो अरबों-खरबों का चूना देश को लगाकर चोर गली से भाग निकले, वह एक ख़ास किस्म का मानव होता है.

फ़ैसला

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अदालतें भले उसका पासपोर्ट रद्द कर दें, मिनिस्टर उनकी तरह संगदिल नहीं कि उसे इंसान के खाने से खारिज कर दें.

न्याय की देवी के आँखों पर पट्टी बंधी होती है. लेकिन इंसानदिल मिनिस्टर को मालूम है कि यह शख़्स जिसके पीछे हिन्दुस्तान का क़ानून लगा है, आखिर मानव है.

तो मानव का काम ही मानव को पहचानना है और उसकी मदद को हाथ बढ़ाना है.

हालाँकि देश की अदालत ने उस शख़्स के कहीं आने-जाने पर रोक लगा रखी है ताकि उसे क़ानून का सामना करने को देश लौटने को मजबूर किया जा सके.

लेकिन मंत्री ने मानवीयता के मारे कहा कि हमें ऐतराज़ नहीं. लोगों ने पूछा कि हमें, यानी किसे?

क्या मिनिस्टर सरकार हैं या सबसे बड़ी अदालत हैं? यह फैसला हुआ कहाँ ?

मानवीयता और गोपनीयता

अभी इस सवाल का जवाब मिला न था कि एक कागज़ फड़फड़ाता आ गिरा, जिसमें इन मिनिस्टर की एक दूसरी दोस्त, जो अब एक राज्य की मुख्यमंत्री हैं, कहती हुई मिलीं कि इस शख़्स की 'विटनेस' होने को वे तैयार हैं, शर्त यह है कि यह बात भारत के किसी अधिकारी को मालूम न पड़े.

लोग इसे ले उड़े हैं. चोरी-चुपके यह काम क्यों, यारों ने शोर मचा दिया है. इससे भी यही ज़ाहिर होता है कि वे परम्परा से कितने कटे हुए हैं.

क्या हमारे बड़े-बूढ़ों ने नहीं कहा है कि अगर दायाँ हाथ भला काम कर रहा हो तो बाएँ को नहीं मालूम होना चाहिए.

इसे आप तुकबंदी न मानें: मानवीयता हमेशा गोपनीयता से की जाती है.

मानव और मानव में अंतर होता है. जो विदेशी मुद्रा की हेरा-फेरी कर ले, फिर भी सुर्खरू बना रहे वह बिज़नेस स्कूलों के लिए केस-स्टडी हो जाता है.

इसलिए उसका मानवाधिकार अधिक होता है. वह राष्ट्रीय मानव, बल्कि धरोहर होता है.

कुछ दूसरे होते हैं जो राष्ट्रीय विकास में रुकावट डालने का काम करते हैं: कबीर कला मंच के कलाकार जो दलित आदिवासियों के लिए और उनकी ज़िंदगी के गीत गाते हैं.

और इनसे ख़तरा है....

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Image caption दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा, जिन्हें पिछले साल गिरफ़्तार किया गया और जो आज भी जेल में हैं.

एक दूसरा जिसका पूरा शरीर लाचार होने पर भी देश के गरीबों के लिए बोलता-लिखता है.

उन्हें पकड़ कर जेल में यों ठूँसा जाता है कि बाहर को उनकी जहरीली हवा न लगे.

ये राष्ट्रविरोधी मानव होते हैं. इनके लिए कोई मिनिस्टर फ़ोन नहीं उठाता.

तो, साहब! मानव और मानव में फर्क होता है. राष्ट्रवादी का मानव मानव होता है, हमारा-आपका दानव.

नागार्जुन की 1978 की कविता जाने क्यों याद आ रही है:

अपना मल परिमल/दूसरों का मल विष्ठा

दूसरों की बात जिद/अपनी जिद निष्ठा

दूसरों का विवेक दुर्बुद्धि/अपना विचार शुद्धि...

कविता बहुत लम्बी नहीं, लेकिन पूरी पढ़नी हो तो ‘पका है यह कटहल’ के आख़िरी पृष्ठ उलटिए.

इस वक्त को दरकार है नागार्जुन और उनके सखा गुरु परसाई के व्यंग्य बाण की. लेकिन वे तो जाने कहाँ हैं?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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