'ना खाऊंगा ना खाने दूंगा' का क्या हुआ

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Image caption ललित मोदी की मदद के मामले में पीएम की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं.

खाऊंगा ना खाने दूंगा', प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनाव अभियान में हमसे यही वादा किया था. भ्रष्टाचार उनका सबसे अहम मुद्दा था. यानी ना वो ख़ुद भ्रष्ट होंगे ना अपने इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार होने देंगे.

भ्रष्टाचार के मामलों में उनकी निजी ईमानदारी को लेकर मुझे कोई शक़ नहीं है. मैं मोदी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और मैं उन्हें ऐसे आदमी के रूप में नहीं देखता जो क़ायदे-क़ानूनों में ढील या किसी एहसान के बदले रिश्वत लें.

मनमोहन भी ईमानदार थे

हालांकि, यही बात मैं अन्य प्रधानमंत्रियों के बारे में भी कह सकता हूँ. मुझे नहीं लगता कि मनमोहन सिंह भ्रष्ट थे, भले ही वो अदालत में एक मामले का सामना कर रहे हों लेकिन उनके विरोधियों की भी यही राय है कि वे ईमानदार हैं.

और जहाँ तक मुझे पता है अटल बिहारी वाजपेयी या इंद्र कुमार गुजराल या बहुत पीछे जाएं तो नेहरू या गुलजारी लाल नंदा पर भी व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था. ये सभी लोग इस मामले में ईमानदार थे.

इसलिए मोदी का 'ना खाऊंगा' का दावा, जो प्रत्यक्ष रूप से सच भी हो कोई मायने नहीं रखता क्योंकि ऐसी मिसालें हैं. उनका 'न खाने दूंगा' का वादा अधिक रोचक है. इसके दो पक्ष हैं.

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Image caption राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भी ललित मोदी की मदद के आरोप हैं.

भ्रष्टचार की संस्कृति

पहला वही रोज़मर्रा के जीवन का भ्रष्टाचार यानी आम लोगों की जेब से ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने या ज़मीन के कागज़ निकलवाने जैसे सरकारी कामों के बदले जो पैसा निकाल लिया जाता है या जो रिश्वत नागरिक अपनी मर्ज़ी से असुविधा या काम में देरी से बचने के लिए देते हैं.

ये एक सांस्कृतिक स्थिति है जो जटिल है. इससे किसी क़ानून या शासन के ज़रिए पूरी तरह से नहीं निबटा जा सकता है. किसी प्रधानमंत्री से संस्कृति और समाज में अंदर तक घुसे रोज़मर्रा के भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की उम्मीद रखना वास्तविक नहीं है. और यह भी सच है कि किसी नेता का ये दावा करना कि वो अकेले भ्रष्टाचार को ख़त्म कर देगा, चतुराई के सिवा कुछ नहीं है.

ये हमें 'न खाने दूंगा' के दूसरे पहलू पर ले आता है. मान लेते हैं कि मोदी का मतलब सिर्फ़ यह था कि वो अपने किसी भी मंत्री को भ्रष्टाचार नहीं करने देंगे. यहाँ ये कहना सही होगा कि इस पहलू पर उनसे पहले के कई प्रधानमंत्री नाकाम रहे है.

मनमोहन सिंह का अपने कैबिनेट के कई मंत्रियों पर इस मामले में कोई नियंत्रण नहीं था और यहाँ तक कि वाजपेयी को भी संघर्ष करना पड़ा था.

दोनों ही मामलों में परिस्थितियां अलग थीं क्योंकि वो दोनों ही गठबंधन की सरकारें थीं और अपने सहयोगियों पर अनुशासन लागू नहीं कर सकती थीं. लेकिन शायद यह कोई बहाना नहीं हो सकता.

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मिसाल क़ायम करने का मौक़ा

मोदी क्या करेंगे जब किसी मंत्री के भ्रष्टाचार का मामला सामने आएगा या आरोप लगेंगे? उनके पास इस महीने हमें ये दिखाने का मौक़ा था लेकिन अब तक तो उन्होंने कुछ किया है नहीं. ना ही उन्होंने व्यक्तिगत रूप से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के व्यवहार का बचाव किया है और ना ही उन्होंने राष्ट्र को ये बताया है कि उनके 'ना खाने दूंगा' के वादे का क्या हुआ.

मेरी राय में सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जो किया उसे मामूली ग़लती मान कर माफ़ कर देना सही नहीं है. उन पर आईपीएल के पूर्व कमिश्नर और क़ानून से भागे हुए ललित मोदी की मदद के आरोप हैं. किसी भी सभ्य लोकतंत्र में एक विदेश मंत्री और एक मुख्यमंत्री ऐसे स्कैंडल के बाद बच नहीं सकते.

सीधे हस्तक्षेप, चालबाज़ी से की गई मदद के ऐसे गंभीर आरोप हैं जिन्हें यूँ खारिज नहीं किया जा सकता. देश और मंत्रियों ने ललित मोदी के साथ जैसा व्यवहार किया उसमें दोहरापन है.

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Image caption कांग्रेस सुषमा स्वराज के इस्तीफ़े की मांग कर रही है.

मामूली ग़लती?

पैसों और अहसानों का जाल इतना व्यापक और विस्तृत है कि उसे झूठ या मामूली ग़लती मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. सुषमा स्वराज का अपने बचाव में एक तर्क यह है कि वे पद नहीं छोड़ेंगी क्योंकि उन्होंने ललित मोदी से जो अहसान लिए उनके बदले में पैसे का कोई लेनदेन नहीं हुआ.

ललित मोदी ने सुषमा स्वराज के एक रिश्तेदार का दाख़िला बड़े कॉलेज में कराया, उनके पति स्वराज कौशल मोदी के वकील हैं इसलिए उनका ललित मोदी की गुप्त रूप से मदद करना, और ये ढोंग करते रहना कि भारत उन्हें वापस लाने की कोशिशें कर रहा है, यह कोई गंभीर अपराध नहीं है.

मुझे लगता है कि इस मामले में सही नज़रिया यह होगा कि प्रधानमंत्री का वादा याद किया जाए. उन्होंने अपने इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार न होने देने का वादा किया था.

Image caption ललित मोदी का कहना है कि किसी अदालत ने उन्हें दोषी क़रार नहीं दिया है.

ऊँचे आदर्शों का क्या?

लेकिन भ्रष्टाचार क्या है? अक़्सर हम इसे रिश्वत समझ लेते हैं और एक तरीक़े से ये सही भी है. लेकिन असल में भ्रष्टाचार वो काम है जिससे कार्यालय भ्रष्ट होता है. एक केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री पर अपने कार्यालय को भ्रष्ट करने के आरोप हैं.

यदि प्रधानमंत्री उन्हें पद पर बनाए रखते हैं तो वो अपना वादा तोड़ रहे हैं. अगर वो ऐसा करते हैं तो मुझे हैरानी ही होगी क्योंकि व्यक्तिगत रूप से तो वो एक उच्च आदर्शों वाले व्यक्ति बनते हैं जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं है.

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