पहले औरत, फिर हिंदुस्तानी और मुसलमान: शबाना

  • 24 जून 2015
इमेज कॉपीरइट Star

शबाना आज़मी की गिनती उन कलाकारों में होती है जिन्होंने अंकुर, मंडी, निशांत, पार, अर्थ जैसी फिल्मों में अभिनय से अलग जगह बनाई तो परवरिश और अमर अकबर एंथनी जैसी कमर्शियल फ़िल्मों भी की.

बीबीसी ने उनसे कई मुद्दों पर ख़ास बातचीत की.

सुनिए शबाना आज़मी से बीबीसी संवाददाता वंदना की बातचीत

समानांतर और कमर्शियल फ़िल्मों में से कौन सा तुर्जबा बेहतर रहा?

इमेज कॉपीरइट Getty

दोनों अलग अलग दुनिया है. हमारे ज़माने में फिल्मों में स्क्रिप्ट नाम की कोई चीज़ नहीं होती थी. कई बार ऐसा होता था कि मैं और राजेश खन्ना जब कोई सीन कर रहे होते थे तो पहले पेज के बाद दूसरे पेज का कुछ अता पता नहीं होता था.

क्योंकि कादर खान किसी तीसरे स्टूडियो में बैठकर सीन लिख रहे होते थे. ज़ाहिर है ऐसे माहौल में सीन में किसी तरह की सच्चाई लाना लगभग मुश्किल था. जबकि श्याम बेनेगल और सामानांतर सिनेमा की फिल्मों में गहरे उतर कर काम करने का मौका मिलता था. क्योंकि इनकी पूरी स्क्रिप्ट होती थी, हक़ीक़त से उसका वास्ता था.

अगर सामानांतर फ़िल्में नहीं होती तो मुझे कभी अच्छे महिला प्रधान फ़िल्में नहीं मिलती. मेरे दौर में बॉलीवुड में औरत या तो देवी का रूप थी या फिर खलनायिका. लेकिन आर्ट हाउस फ़िल्मों ने औरत के मन के कई पहलुओं को टटोला.

पर इसके बाद आपने अमर अकबर एंथनी जैसी फ़िल्मों में काम किया?

इमेज कॉपीरइट

मुझे याद है फ़िल्म परवरिश में एक महीने तक मैंने और नीतू सिंह ने एक कुँए से लटकते हुए काम किया था. जिसमें एक मगरमच्छ था और उसे हमारी टाँगों को खाना था.

आप सोच सकते हैं कि चेहरे पर किस तरह के भाव होंगे. लेकिन मैंने इन फ़िल्मों को इंजॉय किया वरना मैं इनमें काम ही नहीं करती.

एक्टिंग को करियर बनाने के बारे में कब सोचा?

तब मैं केवल चार महीने की थी. मां शौकत कैफ़ी मुझे अपनी पीठ पर लाद कर पृथ्वी थियेटर रिहर्सल में ले जाया करती थीं.

अब्बा कैफ़ी आज़मी मुझे मुशायरों में भी ले जाया करते थें.

नौ साल की उम्र तक मैं कम्यूनिस्ट पार्टी के परिवेश में रही. वहां हर कॉमरेड के पास केवल 225 वर्गफीट के साइज़ का एक कमरा होता था. 8 परिवार एक बाथरुम और टॉयलेट शेयर करते थे.

इमेज कॉपीरइट Junior Mehmood

इस माहौल में धीरे -धीरे थियेटर की तरफ रुझान हुआ. बाद में मैने पूना के फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीच्यूट जाना शुरू किया. वहाँ वर्ल्ड सिनेमा देखने का मौका मिला. इस सब ने मुझ पर गहरा असल डाला.

आप फ़िल्म एक्टर हैं, थिएटर भी करती हैं, सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, आप ख़ुद को कैसे देखती हैं?

इमेज कॉपीरइट Getty

सबसे पहले मैं एक औरत हूं. फिर एक हिंदुस्तानी हूं, मां हूँ, बेटी हूं, बीवी हूँ, अभिनेत्री हूँ, मुस्लिम हूँ. ..सब एक साथ. एक्टिंग और एक्टिविज़्म को मैं एक दूसरे से अलग नहीं मानती.

मैं सामाजिक कामों और अदाकारी दोनों से उन चीज़ों को बढावा देती हूं जिनमें मैं विश्वास करती हूं. मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई है जहां मैंने सामाजिक बदलाव के लिए कला को हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीखा.

फ़िल्म फ़ायर में लेस्बियन का किरदार किया. विवादों के बावजूद ऐसे किरदार निभाने का निश्चय कहाँ से आता है.

ऐसा नहीं है कि मैं जानबूझकर विवाद पैदा करती हूँ. लेकिन मुझे सिखाया गया है कि जो सही है उसके लिए आवाज़ उठाओ. मुझे लगता है कि समलैंगिक लोगों के भी समान अधिकार हैं. इस किरादर को देखकर बहुत सारे लोग भौचक्के रह गए, कई नाराज़ थे, कुछ कशमकश में थे. पर कम से कम एक बहस शुरू हुई और किसी भी मुद्दे से निपटने का पहला कदम यही होता है.

आपकी कई बार आलोचना भी हुई है, ख़ासकर सामाजिक सरोकारों से जुड़े मु्द्दों पर. इससे कैसे निपटती हैं.

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption एक विवाद में शबाना का नाम दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के साथ आया.

आलोचना को न नज़रअंदाज करती हूं न गुस्सा आता है. अल्पसंख्यकों के अधिकार, एड्स, औरतों से जुड़े कई मुद्दों पर काम किया. नेल्सन मंडेला वाली घटना भी हुई जहाँ बिन बात के विवाद खड़ा कर दिया गया.

लोगों ने मुझे बेपनाह मोहब्बत और इज़्ज़त दी है. लेकिन एक तबका ऐसा भी होगा ही जिसे वाकई मेरा काम पसंद नहीं होगा. इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि हर इंसान को अपना नज़रिया ज़ाहिर करने की आज़ादी है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार