मोदी सरकार : बेदाग होने के दावे पर उठे सवाल

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भारतीय राजनीति ने पिछले कुछ वक्त में तेज पलटा खाया है.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी एक साल बाद अचानक विपक्ष के निशाने पर है इसकी तीन महत्वपूर्ण नेता आरोपों के घेरे में हैं.

मोदी के नेतृत्व के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है या वह इससे आसानी से पार पा जाएंगे.

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का विश्लेषण

भारतीय जनता पार्टी के जिन भी नेताओं पर आरोप लगे हैं उनमें कोई भी मामला अब तक भ्रष्टाचार का, कम से कम धन के संदर्भ में, नहीं है. नैतिक सवाल उठे हैं और वसुंधरा राजे सिंधिया के मामले में कानूनी पक्ष भी है.

ऐसे में भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की साख पर सवाल तो उठे हैं. जिन आशाओं और उम्मीदों से सरकार बनी थी उन्हें देखते हुए लगता है कि 13 महीने में भाजपा के लिए यह सबसे निराशाजनक समय है.

पार्टी में एक राय नहीं?

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कीर्ति आज़ाद, शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह को छोड़ दें तो पार्टी के सभी बड़े नेता सलाह-मशविरा कर एक ही बात बोल रहे हैं.

उनकी बातों से यह समझा जा सकता है कि पार्टी नेतृत्व ने तय किया है कि फ़िलहाल इन तीनों में से किसी का इस्तीफ़ा नहीं लिया जाएगा.

सभी मामले अलग-अलग हैं. सुषमा स्वराज के मामले में कांग्रेस और वाम दलों को छोड़कर कई दल और नेता ऐसे हैं जो उनके पक्ष में हैं या सहानुभूति रख रहे हैं.

सुषमा स्वराज के मामले का असर यह हुआ था कि जो विपक्षी एकता कॉंग्रेस ने एक साल में बनाई थी वह टूट गई थी. एक तरह से भाजपा को उसका लाभ हुआ.

वसुंधरा का बचाव मुश्किल

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वसुंधरा राजे के मामले में भाजपा के लिए बचाव करना, उनके पक्ष में दलील देना बहुत मुश्किल होगा, ख़ास तौर पर उनके हस्ताक्षरित दस्तावेज़ के सामने आने के बाद.

साल 2010 से पहले का मामला होता तो बात अलग थी. यह मामला अभी बड़ा नहीं दिख रहा है लेकिन इसका असर बिहार चुनावों पर भी पड़ सकता है और आगे आने वाले अन्य विधानसभा चुनावों पर भी.

स्मृति इरानी का पेंच

तकनीकी पेंच यह है कि 2004 और 2011 में जब उन्होंने यह घोषणा की थी कि तब यह दंडनीय नहीं था, वह प्रावधान 2012 में आया. ऐसे मामले में एक साल के अंदर अपील करनी होती है, इसलिए उन्हें तकनीकी लाभ है इस मामले में.

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साल 2014 के मामले में उनका पक्ष सही है या ग़लत है यह अदालत देखेगी. इसीलिए अभी उन्हें समन नहीं किया गया है.

किरकिरी

जो पार्टी तीन हफ़्ते पहले तक यह दावा कर रही थी कि उस पर कोई दाग नहीं है, कोई आरोप नहीं है वह घिर गई है- एक तरह से आरोपों की झड़ी लग गई है.

संसद का मानसून सत्र इस सरकार के लिए अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी. यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भी परीक्षा होगी कि वह उस चुनौती का कैसे सामना करते हैं.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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