किसान चैनल पर केवल सफल किसानों की कहानी..

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महीने भर पहले शुरू किया गया किसान चैनल किसी भी कसौटी पर खरा उतरता नहीं दिख रहा. इससे दर्शकों को तो निराशा हो ही रही होगी, मगर शायद इसे धूमधाम से लाँच करने वाले भी खुश नहीं होंगे.

लाँचिंग के समय उम्मीद बँधाई गई थी कि ये कृषि पर नए किस्म का चैनल होगा, किसानों और खेत-खलिहानों को दिखाने के लिए कोई नया मुहावरा गढ़ेगा. लेकिन इसे देखकर लगता है मानो चौबीस घंटे दूरदर्शन का पुराना कार्यक्रम कृषि दर्शन चल रहा हो.

किसानों के लिए भी इसमें कुछ ख़ास नहीं है. न उनके दुख-दर्द दिखते हैं, न खेती-किसानी की मुश्किलें. ऐसा लगता है कि इसका देश के किसानों और गाँव-देहात की समस्याओं से कुछ लेना-देना ही न हो.

चैनल पर सरकारी नीतियों की चीर-फाड़ तो दूर उनकी कमियों की भी कोई चर्चा नहीं की जाती. शायद निर्देश, कृषि क्षेत्र के केवल उजले पक्ष को दिखाने के दिए गए हैं. इसीलिए सरकारी कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार इसका मुख्य एजेंडा नज़र आता है.

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चैनल को फ़ील गुड मूड पर रखा गया है यानी सब अच्छा-अच्छा दिखे. इसमें किसानों की आत्महत्या की ख़बरें हरगिज़ नहीं मिलेंगी.

चैनल सफल किसानों की कहानी सुनाता रहता है, मगर किसी रोते-बिलखते किसान को नहीं दिखाता. वह किसानों की आवाज़ बनने का कोई प्रयास नहीं करता.

उन्नत बीज, खाद एवं कीटनाशकों की कमी, सिंचाई के साधनों का अभाव, न्यूनतम खरीद मूल्य में बढ़ोतरी जैसे मसलों को वह किसानों के पक्ष में जोर-शोर से नहीं उठा रहा.

किसान चैनल के लिए सबसे बड़ी चुनौती किसानों की समस्याओं को सही नज़रिए से देखना और दिखाना है. लेकिन सरकारी हदबंदियों की वजह से वह कन्नी काट रहा है.

सरकार की कृषि नीति उद्योग जगत और कार्पोरेट खेती के पक्ष में पहले ही पूरी तरह झुकी हुई है. स्पष्ट है कि सरकार की मुश्किलें बढ़ाने वाले मुद्दों को वह छूने की भी हिम्मत नहीं कर रहा.

खेत-खलिहानों से सीधी रिपोर्टिंग की इसमें बेहद कमी है. अधिकांश समय हैलो किसान, चौपाल चर्चा या विचार-विमर्श जैसे स्टूडियो से संचालित कार्यक्रम ही दिखलाई देते हैं. बाक़ी के वक़्त में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ कैमरे की ओर मुख़ातिब होकर किसानों को ज्ञान बाँटते रहते हैं.

भाषा, जो समझ न आए

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कृषि संबंधी ज्ञान और सलाह किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करने का पुरातन अंदाज़ दृश्य माध्यम की नासमझी को ही ज़ाहिर करता है. इससे प्रभावशाली संप्रेषण संभव नहीं होता.

पता नहीं क्या सोचकर इसमें फिल्में और फिल्मी गानों के कार्यक्रम (गीतांजलि) को भी शामिल कर लिया गया है. इन सबके लिए चौबीस घंटे के ढेर सारे चैनल पहले से हैं. इसे चूँ चूँ का मुरब्बा बनाने के बजाय किसानों और किसानी तक सीमित रखा जाता तो बेहतर होता.

चैनल धारवाहिक भी दिखाता है लेकिन क्वालिटी के मामले में फिसड्डी. ऐसे धारावाहिक मनोरंजन तो नहीं ही कर सकते. शायद ये सरकारी प्रोपेगंडा का ज़रिया भर हैं, क्योंकि इनमें खेती छोड़कर फैक्ट्री लगाने की वकालत की जाती है.

और तो और सामग्री के निर्माताओं ने चैनल की भाषा तक पर काम नहीं किया है. कार्यक्रमों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है जो किसानों के सिर के ऊपर से चली जाती होगी.

उदाहरण के लिए इन शब्दों पर ग़ौर करें- संस्तुति, सृजन, पोषक तत्व, मृदा, जल प्रबंधन, पानी के पात्र, अत्यावश्यक, आर्द्रता, रोग प्रतिरोधक शक्ति, प्रकाशयुक्त आवास आदि.

किसानों से वास्ता नहीं

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ये साफ़ नज़र आता है कि चैनल शुरू करने के पहले सामग्री के संबंध में न तो कोई सर्वेक्षण किया गया और न ही विशेषज्ञों से कोई राय-मशविरा. इसीलिए इसे तैयार करने में एक ऐसी समझ काम करती दिख रही है, जिसका किसानों से कोई वास्ता नहीं हो.

भले ही भारत की साठ से सत्तर फ़ीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती हो मगर मीडिया में इसकी समझ रखने वाले लोग न के बराबर हैं. भारत में कृषि पर आधारित कार्यक्रम कृषि दर्शन से आगे नहीं बढ़ पाए हैं.

टेलीविज़न के आरंभिक दौर में शुरू किया गया ये कार्यक्रम नाम तथा रूप बदल-बदलकर विभिन्न चैनलों में दिखता रहा है. किसान चैनल भी इसी रूप में ढल गया है.

कुछ निजी चैनलों ने भी कृषि पर कार्यक्रम दिखाए मगर उनका मुख्य मक़सद ट्रैक्टर, पंप, खाद एवं कीटनाशक आदि के विज्ञापन हासिल करना था. किसानों को उनके मतलब की सही और सच्ची जानकारी मुहैया करवाने की उन्होंने ज़्यादा परवाह नहीं की.

जल्दबाज़ी

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ये भी ग़ौरतलब है कि देश में कृषि पत्रकारिता जैसी कोई चीज़ नहीं बची है.

खेती और ग्रामीण अंचल को कवर करने वाले पत्रकारों या कार्यक्रम निर्माताओं की प्रजाति लुप्त हो चुकी है. किसान चैनल के कर्णधारों ने नई टीम खड़ी करने की भी कोई कोशिश नहीं की है.

पिछले तीन साल से किसान चैनल शुरू करने की चर्चाएं चल रही थीं, मगर मोदी सरकार ने इसे फटाफट लाँच कर दिया. ज़ाहिर है कि इसकी बड़ी वजह किसानों में बढ़ते असंतोष और भूमि अधिग्रहण विधेयक से होने वाले राजनीतिक नुकसान को कम करना था.

लेकिन किसान चैनल ये काम भी कर पाएगा इसमें संदेह है. प्रसार भारती के मातहत चलने वाले तमाम चैनल सरकारी दखलंदाज़ी और अकुशलता के शिकार है.

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वे सरकारी भोंपू की तरह काम कर रहे हैं. उनको देखने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है.

विश्वसनीयता के अभाव में सरकारी चैनल सरकारी प्रोपेगंडा भी ढंग से नहीं कर पाते. इसलिए फ्लॉप किसान चैनल सरकार की कुछ मदद कर पाएगा इसमें संदेह है. अलबत्ता किसानों के नाम पर जनता के 100 करोड़ बरबाद होते ज़रूर दिख रहे हैं.

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