दिग्विजय का रिकॉर्ड तोड़ेंगे शिवराज?

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इमेज कॉपीरइट Vipul Gupta BBC

तमाम कथित घोटालों के आरोपों के बावजूद यदि शिवराज सिंह चौहान अगले पांच महीने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहे तो वह एक नया रिकॉर्ड बनाएंगे.

लगातार 10 बरस तक सीएम पद पर रहने का रिकॉर्ड.

अभी यह उपलब्धि 1993 से 2003 तक मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के नाम है.

कुर्सी कायम

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मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान पर सबसे पहला आरोप डंपर ख़रीद का लगा था.

आरोप था कि उनकी पत्नी साधना सिंह के नाम पर कथित तौर पर चार डंपर खरीदे गए थे, जो फायनेंस कराने वाली सीमेंट कंपनी में लगाए गए थे.

इस मामले में कांग्रेस ने विधानसभा से लेकर सड़क तक हंगामा मचाया मगर शिवराज को कोर्ट से क्लीन चिट मिल गई.

डंपर केस के बाद व्यापम ऐसा घोटाला है, जिसमें लगा था कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी को ख़तरा है.

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लेकिन शिवराज ने जिस तरह डंपर प्रकरण संभाला, लोगों को लगने लगा है कि वैसा ही हाल व्यापम घोटाले का हो सकता है.

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Image caption दिग्विजय सिंह के दस साल मुख्यमंत्री रहने के रिकॉर्ड के करीब हैं शिवराज सिंह चौहान

ग़ौर करने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में बड़े घोटालों के जितने आरोप शिवराज के साढ़े नौ साल के कार्यकाल में लगे, उतने उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों के ज़माने में नहीं दिखे.

चाहे वह डंपर के बाद व्यापम का महाघोटाला हो या फिर ताजा़तरीन सुर्खियों में आए डीमेट व पीएससी परीक्षाओें में गड़बड़ी के मामले, सब शिवराज युग के ही हैं.

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भ्रष्टाचार के मामले

भ्रष्टाचार की बात की जाए तो मध्य प्रदेश में छापों में चपरासी और पटवारी जैसे मामूली वेतन पाने वालों की तिजोरियों से करोड़ों की दौलत निकलती है.

हेल्थ विभाग के एक अफसर के यहां जब सर्च होती है तो उनकी पत्नी लोकायुक्त की टीम पर चिल्लाती है, ''हमारे यहां क्यों छापा मारने आए हो, जाओ उस मंत्री के घर छापा मारो, जो हर महीने हमसे करोड़ रूपए रिश्वत वसूलता है.''

आईएएस दंपति अरविंद-टीनू जोशी के पास मिली अरबों की संपत्ति का मामला तो मशहूर है ही.

कई आरोप

Image caption शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में उनकी सरकार पर कई आरोप लगे हैं.

खनिज माफ़िया को कथित तौर पर संरक्षण देने का आरोप भी शिवराज सरकार पर है.

यह आरोप भी कि उनके नज़दीकी रिश्तेदार रेत खनन के कारोबार में ख़ासा पैसा बना रहे हैं.

आरोप है कि माफिया को संरक्षण भी इस सीमा तक मिल रहा है कि एक आईपीएस और दो पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया.

ज़ाहिर है, तमाम विवादों और गंभीर किस्म के आरोपों के बाद भी शिवराज अपने पद पर जमे हुए हैं तो राजनीतिक प्रेक्षकों का हैरान होना लाज़मी है.

शिवराज का जतन

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दरअसल बीते सालों में शिवराज ने मैनेजमेंट, कूटनीति और रणनीति में खुद को पारंगत किया है.

वह अपनी भाव भंगिमाएं हमेशा दीन हीन की तरह रखते हैं.

ख़ासकर जब पब्लिक में होते हैं, तो उनकी बॉडी लैंग्वेज देखने लायक होती है.

जनता को हमेशा यही जताने का जतन करते रहते हैं कि मुख्यमंत्री आम जनता के बीच में से बनता है और वह भी आम आदमी ही हैं.

शिवराज का यही 'रूप' क्लिक करता है और उनकी लच्छेदार बातें, अपने घर पर क़िस्म-किस्म की पंचायतें पब्लिक को पसंद आती हैं.

उनकी यही शैली उन्हें राजनीतिक से ज्यादा कूटनीतिक बनाती है.

इसीलिए सियासी तौर पर न तो बीजेपी और न कांग्रेस में ही उनकी काट अभी तक है.

वो आरएसएस के दफ्तर में हर पंद्रह दिन में हाज़िरी बजाने जाते हैं.

विरोधी किनारे

उनकी अपनी पार्टी में यदि कुछ चुनौतियां थीं भी तो धीरे धीरे वे भी दूर होती गईं.

मसलन उमा भारती, अनूप मिश्रा, राघवजी भाई, लक्ष्मीकांत शर्मा और प्रहलाद पटेल.

उमा तो अब उत्तर प्रदेश की बना दी गई हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप और भाजश में उमा के साथ रहे प्रहलाद सांसद बनने के बाद प्रदेश की सियासत से कट गए हैं.

सीडी कांड में जेल से लौटे राघवजी पार्टी से बाहर हैं और व्यापम मामले में जेल की हवा खा रहे लक्ष्मीकांत की ज़मानत कब होगी, यह कोई नहीं जानता.

ले देकर नरेंद्र सिंह तोमर और कैलाश विजयवर्गीय बचते हैं, पर ये दोनों भी फिलहाल सूबे से बाहर हैं.

एक को केंद्र सरकार में मंत्रिपद तो दूसरे को भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव की मिल गई है.

कुल मिलाकर तमाम आरोपों और घोटालों के बावजूद शिवराज की यात्रा जारी है.

और अब तो सुषमा स्वराज व वसुंधरा राजे सिंधिया को अभयदान मिलने के बाद वह और बेफ़िक्र हो सकते हैं

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