जिधर देखिये उधर हैं अरविंद ही अरविंद

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दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पर केंद्रित, चर्चित और विवादस्पद बन चुके टेलीविज़न विज्ञापन 'अरविंद के साथ' की क्या विशेषता हो सकती है?

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विज्ञापन की ख़ासियत जो प्रमुखता से उभरती है वह यही है कि उसकी हीरोइन को परोक्ष रूप से अपने पति का मज़ाक़ उड़ाते हुए और एक 'परपुरुष' की ज़रूरत से ज्यादा तारीफ़ करते हुए प्रदर्शित किया गया है.

यह 'परपुरुष' कोई और नहीं बल्कि अरविन्द केजरीवाल हैं.

यानी कि दिल्ली महानगर के तमाम पुरुषों के पुरुषत्व को केवल एक 'परपुरुष' के शौर्य के सामने बौना करके दिखाया गया प्रतीत होता है.

यह भी कि देश की राजधानी के मध्यमवर्गीय परिवारों की महिलाएं ही पुरुषों के साथ-साथ घरों को भी चला रहीं हैं.

केजरीवाल भरोसे

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साथ ही विज्ञापन को देखकर ऐसा इम्प्रेशन भी पड़ता है कि सारा काम या तो वे कर रही हैं या फिर अरविन्द केजरीवाल कर रहे हैं.

आम आदमी पार्टी भी नहीं.

नायिका को विज्ञापन में कहते हुए दिखाया गया है, "अकेले में रोया करती थी कि घर का खर्च कैसे चलेगा?"

विज्ञापन में 'पति पुरुष' न तो कोई दावा करता है या कुछ भी बोलता है. वह मूक फिल्मों के किसी निरीह पात्र की तरह टीवी के सामने बैठा रहता है.

विज्ञापन के अंत में बिजली का बिल देखकर उसे ख़ुश होते हुए अवश्य दिखाया जाता है.

क्या है तर्क?

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नायिका के इस तरह के चित्रण और अरविन्द केजरीवाल के 'व्यक्ति पूजा' की हद तक किए गए गुणगान के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पिछले विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को दिल्ली महानगर की महिलाओं द्वारा ही समर्थन दिया गया था.

यानी महिलाओं के कारण ही आम आदमी पार्टी को सड़सठ सीटें प्राप्त हुईं थी (पुरुषों के कारण नहीं !)

''अतः इसमें कुछ भी ग़लत नहीं कि एक महिला पात्र को इतने सशक्त तरीके से 'अपने मन की बात' प्रस्तुत करते हुए दिखाया जाये.''

इतने सशक्त तरीके से क़ि वह एक छोटे से टीवी विज्ञापन में कोई ग्यारह बार केजरीवाल के नाम का गर्व के साथ उल्लेख करे.

आम आदमी पार्टी के नेता यह भी मानने को राज़ी नहीं कि विज्ञापन के ज़रिये सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश का उल्लंघन होता है.

कोर्ट का आदेश है कि सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री के अतिरिक्त किसी और नेता के फोटो नहीं उपयोग में लाये जाएं.

'अरविंद उपासना'

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इस लिहाज़ से विज्ञापन में अरविन्द के 'सगुण निराकार' स्वरूप की सफलतापूर्वक उपासना की गई है.

अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक नायकत्व समान्तर फिल्मों के हीरो अमोल पालेकर के क़द ,काठी और छवि के अनुरूप 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन के गर्भ से उभरा था.

पर विज्ञापन को देखकर आभास होता है कि समान्तर फिल्म के किसी नायक को लेकर 'दबंग' की तर्ज़ पर कोई व्यावसायिक प्रयोग किया जा रहा है.

आम आदमी पार्टी के एक नेता का कहना है कि आज अगर गांधीजी जीवित होते तो कुछ व्यक्तियों और पार्टियों द्वारा उनकी भी वैसे ही आलोचना की जाती (जैसी कि अरविन्द केजरीवाल की आज की जा रही है).

अवमूल्यन!

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जो कुछ भी किया या कहा जा रहा है वह एक जन आंदोलन को एक व्यक्ति में केंद्रित करने का प्रयास ज़्यादा नज़र आता है.

अरविंद केजरीवाल को अगर दिल्ली से बाहर निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर बॉक्स ऑफ़िस सफलता प्राप्त करनी है तो इस तरह की विज्ञापन फिल्मों के ज़रिये अपनी छवि का अवमूल्यन नहीं होने देना चाहिए.

इस काम को प्रोफेशनल राजनेताओं के लिए छोड़ देना चाहिए.

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