हिंदी दूसरी भाषाओं के लिए ख़तरा बन रही है ?

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केंद्र में सरकार बनाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट के मंत्रियों ने अलग-अलग ढंग से हिंदी और संस्कृत के प्रचार और प्रसार का बीड़ा उठाया है.

सरकार का तर्क है कि हिंदी का अस्तित्व बचाने के लिए इस तरह की कोशिशें लगातार ज़रूरी हैं.

लेकिन इन कोशिशों के चलते क्या हिंदी अपने साए तले दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए ख़तरा बन रही है.

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देवनागरी लिपि के साथ हिंदी केंद्र सहित कुछ राज्यों की भी आधिकारिक भाषा है. एक बड़ी संख्या में इसे बोलने वाले लोगों के कारण ही हिंदी को यह वरीयता हासिल हुई है.

साल 2001 की जनगणना के मुताबिक़ भारत की 41.03 प्रतिशत आबादी हिंदी भाषी थी.

हालांकि जनगणना में जिस हिंदी को शामिल किया गया उसकी परिभाषा बहुत व्यापक है और उन लोगों को भी हिंदी भाषी के रूप में शामिल कर लिया जाता है जो अपनी कभी अपनी भाषा को ‘हिंदी’ नहीं बताते.

इसमें पश्चिमी हिंदी (लेकिन उर्दू नहीं), पूर्वी हिंदी, भोजपुरी समेत गैर मैथिली बिहारी भाषाएं, पहाड़ी भाषाएं और राजस्थानी भाषाओं को भी शामिल किया गया है.

इसलिए हिंदी भाषी लोगों की संख्या, असल में उन भाषाओं की विविधता के साथ इंसाफ नहीं करती जिन्हें ‘हिंदी’ के रूप में गिन लिया गया है.

अपने काम के दौरान मैंने खुद इसे महसूस किया. एक वाकया आपको बताता हूँ.

भाषाई विभेद

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एक शोधकर्ता के रूप में मैं एक ऐसे प्रोजेक्ट के साथ जुड़ा हूँ, जिसमें जन्म से ही दृष्टिहीनता के शिकार बच्चों को उत्तर भारत के दूर दराज के गांवों से दिल्ली लाकर उनका इलाज किया जाता है.

इनमें से अधिकांश बच्चे उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले से आते हैं. चूंकि ये बच्चे जन्म से ही देख नहीं पाते इसलिए वे लगभग पूरी तरह घर पर ही रहते हैं.

ये इतने ग़रीब होते हैं कि उनके पास रेडियो या टेलीविज़न तक नहीं होता है. उनका केवल अपनी मातृभाषा से ही परिचय होता है और वो बड़े कस्बों, स्कूलों और सरकारी कार्यालयों में बोली जाने वाली हिंदी से बेखबर होते हैं.

दिल्ली में जब लोग इन बच्चों से हिंदी में सवाल पूछते हैं तो वो मुश्किल से ही उन्हें समझ पाते हैं.

दिल्लीवालों के लिए इन 'हिंदीभाषी' गोंडी बच्चों की भाषा समझना और भी मुश्किल है.

बातचीत इन बच्चों के रिश्तेदारों के ज़रिए ही हो पाती है जो शहर आते-जाते हैं और बॉलीवुड के ज़रिए हिंदी से परिचित हैं.

पहचान

ये दो समूह एक दूसरे की भाषा समझें या न समझें लेकिन जनगणना के मुताबिक़, ये दृष्टिहीन बच्चे और दिल्ली के निवासी, दोनों एक ही भाषा बोलते हैं और वो है हिंदी.

खुद को हिंदी भाषी के रूप में पहचान दिलाने की प्रवृत्ति पिछले कुछ दशकों के दौरान बढ़ी है.

इसका मतलब, उन परिवारों की युवा पीढ़ी अब हिंदी भाषी होने का दावा करती है, जहां पहले अवधी ही बोली जाती थी.

इस प्रवृत्ति के कारण अवधी जैसी वो भाषाएं खत्म हो रही हैं, जिनमें सदियों तक बेहतरीन साहित्यिक रचनाएं हुईं और वो आज भी उत्तर भारत की लोकसंस्कृति में ज़िंदा हैं.

भोजपुरी के हालात अवधी से कुछ बेहतर हैं इसमें किताबें लिखी जा रही हैं और इसके टीवी चैनल भी हैं.

इसके बावजूद भोजपुरी बोलने वालों की संख्या (चार करोड़) को देखते हुए यह ऊंट के मुंह में जीरा ही लगता है.

दिल्ली की आबोहवा में भोजपुरी बोलना अब मज़ाकिया, गँवई और पिछड़ेपन का सबूत बन गया है.

भोजपुरी

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भोजपुरी बोलने वाले के एक बड़े तबके के बीच ये भाषा फूहड़ संगीत और द्विअर्थी संवादों के ज़रिए ही ज़िंदा है.

कुल मिलाकर मिलाकर मामला भाषा की राजनीति का है.

हिंदी भाषी लोगों की संख्या बढ़ाने की राजनीति अंग्रेज़ों के दौर में शुरू हुई थी, जब 'मुस्लिम-हिंदुस्तानी' और 'हिंदू-हिंदुस्तानी' के बीच होड़ लगी.

इन दोनों धाराओं में विभेद बनाए रखने की मांग ने उस दौरान के राजनीतिक मतभेदों को सामने ला दिया.

इसके बाद जब भाषाई गणना का क़ानून बना, तब हिंदी भाषा पर ऊंची जातियों के दबदबे ने, नीची जातियों की 'गंवई' बोलियों-भाषाओं को पछाड़ दिया

इसके साथ ही, खड़ी बोली को फ़ारसी के प्रभाव से मुक्त कर इसके संस्कृतिकरण की मुहिम चलाई गई थी और नतीजे स्वरुप निकली वो हिंदी जिसे हम आज कानून के दस्तावेज़ों और भारत सरकार के आदेशों में पढ़ते हैं.

ये हिंदी लोगों के लिए इतनी अजनबी थी कि हिंदी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता बलराज साहनी ने एक बार कहा कि रेडियो पर समाचार वाचक जब आम तौर पर कहते हैं कि, ‘अब हिंदी में ख़बरें सुनें’, तो उन्हें सुनाई देता था- ‘अब ख़बरों में हिंदी सुनें.’

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