उर्दू मीडिया : भारत ही नहीं, पाक एजेसियां भी निशाने पर

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पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बीबीसी की उस रिपोर्ट पर ख़ूब चर्चा हो रही है जिसमें भारत पर पाकिस्तान की एमक्यूएम पार्टी की फंडिंग करने के आरोप लगे हैं.

‘जसारत’ लिखता है कि एमक्यूएम की फंडिंग और ट्रेनिंग से जुड़े जो आरोप भारत पर लगे हैं, ये जानकारी तो पहले भी मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचती रही है, बस नई बात ये है कि इस रिपोर्ट के दावे खुद एमक्यूएम के दो वरिष्ठ नेताओं के इंटरव्यू पर आधारित हैं.

सुरक्षा एजेंसियों की खिंचाई करते हुए अख़बार ने लिखा है कि 'हमारा तो ये हाल है कि हमें अपनी ख़बरें भी बाहर से मिलती हैं.'

इस सिलसिले में बीबीसी की रिपोर्ट के अलावा न्यूयॉर्क टाइम्स की उस रिपोर्ट का ज़िक्र भी किया गया है जिससे हाल में पाकिस्तान एक कथित फ़र्ज़ी डिग्री कांड सामने आया.

‘सामने आए सच’

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‘नवा-ए-वक़्त’ ने भी बीबीसी की रिपोर्ट के सिलसिले में पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल उठाया है.

अख़बार लिखता है कि एमक्यूएम में छिपे देशद्रोही तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए क्या बीबीसी की रिपोर्ट का ही इंतजार हो रहा था.

अख़बार कहता है कि अब इस मामले से जुड़ी सच्चाइयां सामने आनी चाहिए वरना ये सवाल भी उठता रहेगा कि देश की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मज़बूत हाथों में है या नहीं.

रोज़नामा ‘दुनिया’ लिखता है कि अगर बीबीसी की रिपोर्ट में लगे आरोप साबित हो गए तो भारत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मुंह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहेगा.

अख़बार के मुताबिक़ ब्रिटेन ने जांच में सहयोग किया तो इस मामले का सच ज़रूर सामने आएगा.

‘रिश्तों में रोड़ा’

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रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने अफ़ग़ान ख़ुफ़िया एजेंसी के इस बयान पर संपादकीय लिखा है कि अफ़ग़ान संसद पर हालिया हमले में पाकिस्तान के एक ख़ुफ़िया अफ़सर का हाथ है.

अख़बार के मुताबिक़, पाकिस्तान का सैन्य और असैन्य नेतृत्व अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्तों के नए दौर का आग़ाज़ करना चाहता है, लेकिन अफसोस की बात है कि अफ़ग़ान एजेंसियां ऐसे आरोपों से रिश्तों में रोड़े अटका रही हैं.

‘जंग’ ने कराची में गर्मी से एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत के हवाले से पाकिस्तान में बिजली संकट का मुद्दा उठाया है.

अख़बार के मुताबिक़, लोग इस बात से हैरान हैं कि इस संकट को संघीय सरकार के साथ मिलकर सुलझाने की बजाय सिंध के मुख्यमंत्री क़ायम अली शाह अपने साथियों के साथ धरने पर बैठ गए.

अख़बार लिखता है कि एक दूसरे पर आरोप मढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि प्रांतीय और संघीय सरकार को ऐसे कदम उठाने होंगे कि पीड़ित लोगों को राहत दी जा सके और भविष्य में ऐसे हालात पैदा होने से रोके जा सकें.

‘नमो’ और ‘लमो’

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इधर, भारत में आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी के चलते नरेंद्र मोदी सरकार पर बढ़ते दबाव पर ‘रोज़नामा ख़बरें’ का संपादकीय है – नमो और लमो.

अखबार लिखता है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर लगे आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सिर्फ़ इसलिए समस्या नहीं हैं कि ये भ्रष्टाचार से जुड़े हैं बल्कि समस्या इसलिए भी है कि इनके कारण सरकार और सत्ताधारी पार्टी में गुटबाजी का ख़तरा है.

अख़बार के मुताबिक प्रधानमंत्री इसलिए कोई क़दम उठाने से बच रहे हैं कि कहीं कोई नकारात्मक संदेश न जाए, लेकिन इन हालात में क्या संसद का मॉनसून सत्र ठीक से चल पाएगा?

‘अख़बार-ए-मशरिक़’ ने मालेगांव धमाके के मामले में सरकारी वकील रोहिणी सालियान के इस दावे को संपादकीय का विषय बनाया कि एनआईए ने उनपर मामले में नरमी बरतने का दबाब डाला था.

अख़बार कहता है कि अब जब कि सालियान ने ये रहस्योद्घाटन किया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी मुक़दमा एक विशेष अदालत के सौंप दिया है, ऐसे में सरकार को तुरंत हरकत में आना चाहिए और सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए.

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