झारखंड में पलते बिन ब्याही माँओं के बच्चे

घरेलू काम करने बड़े शहर गईं झारखंड की बहुत सारी युवतियाँ गर्भवती होकर या बच्चे लेकर घर लौट रही हैं.

यौन शोषण की शिकार ये बिन-ब्याही माँएँ बच्चों को रिश्तेदारों के हवाले कर रोज़ी-रोटी के लिए फिर उन्हीं शहरों में चली जाती हैं.

बिना माँ-बाप के पल रहे ये बच्चे झारखंड के सिमडेगा ज़िले के आदिवासी समाज के लिए एक बड़ी मुश्किल बन गए हैं.

घने जंगलों से घिरे टोलीटुंगरी गांव के एक कच्चे मकान में 'बड़ी मां' अपने नाती सूरज को लोरी सुनाकर सुला रही रही हैं.

'जीना सीख लिया'

इस छोटे से बच्चे की देखभाल करना बूढ़ी की ज़िम्मेदारी बन गई है.

उनकी बेटी महानगर काम करने गई तो ज़रूर थी मगर जब वापस आई तो उसकी गोद में एक बच्चा था लेकिन कुछ ही दिनों के बाद वो किसी को बिना बताए एक बार फिर चली गई और तबसे लौटकर गांव नहीं आई है.

गांव वालों का कहना है कि वो हर माह अपने बेटे के लिए नियमित रूप से पैसे भेजती है.

इन्हीं में से एक है एकता जो अब आठ साल की हो गई है. एकता से मेरी मुलाक़ात पहाड़ी पर बने गांव के सरकारी स्कूल में हुई तो उसका कहना था कि वो पैदा होने के बाद से ही अपने नाना, मामा और मामी के पास ही रह रही है जबकि उसकी मां मुंबई में काम करती है.

एकता को मां की बहुत याद आती तो है, बाप के बारे में वह कुछ नहीं जानती, मगर अब उसने ऐसे ही जीना सीख लिया है.

वो कहती है, "मां जब आती हैं तो मुझे घुमाने ले जाती हैं. उनका मेरे पास होना मुझे बहुत अच्छा लगता है."

ज़िम्मेदारी

Image caption सपना ने अपनी छोटी बहन की दो साल की बेटी के नाम अपनी ज़िंदगी कर दी है.

सूबेदार तिर्की ने अपनी साली की बेटी को अपना नाम दिया है. वे स्थानीय ईसाई मिशनरी के प्रचारक हैं. उन्होंने छह साल की इस बच्ची के भरण-पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी ले रखी है.

वो कहते हैं, "मेरी शादी से पहले ही मेरी साली बच्ची को लेकर आई थी उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा. बाद में जब बच्ची बड़ी होने लगी तो उसका दाखिला स्कूल में करवाना पड़ा. तब बाप के नाम की जगह मैंने अपना नाम लिखवा दिया."

वहीं टोलीटुंगरी की सपना ने भी अपने सब सपनों को अपनी छोटी बहन की दो साल की बेटी के नाम कर दिया है. सपना चाहती तो वो अपना घर बसा सकती थीं, मगर नन्ही महक की सारी ज़िम्मेदारी अब उन्हें उठानी पड़ रही है.

गांव के हैंडपंप के पास महक को नहलाने आई सपना ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "मैं शादी कर लूंगी तो फिर इसे कौन देखेगा. पिताजी फ़ौज से रिटायर हुए हैं. कोई और नहीं हैं घर में. पापा के पेंशन से घर चलता है. अब इसे ठीक तरह से पालना ही हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है."

क़ीमत

Image caption सामजिक कार्यकर्ता नील जस्टिन बेक ने इस समस्या के लिए समाज और सरकार, दोनों को ज़िम्मेदार ठहराया.

सामजिक कार्यकर्ता नील जस्टिन बेक ने इस बढ़ती हुई समस्या के लिए समाज और सरकार, दोनों को ही ज़िम्मेदार ठहराया.

उनका कहना है, "इस तरह के पलायन को रोकने के लिए जिस तरह का प्रयास होना चाहिए था वो दुर्भाग्यवश नहीं हो पा रहा है. यहां रोज़गार के साधन नहीं है, बिजली नहीं रहती, चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है. इसी वजह से यहां की लड़कियों को शहर की ज़िंदगी ज्यादा आकर्षक नज़र आती है. प्रशासन की तरफ से भी इस तरह के पलायन को रोकने की कोई पहल नहीं हुई है."

हालांकि कुरडेग में तैनात राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मनोज कुमार कहते हैं कि उनके इलाके से लड़कियां स्वेच्छा से ही महानगरों की तरफ ज्यादा जा रही हैं, न कि मानव तस्करी की वजह से.

झारखंड के आदिवासी समाज को सरकारी उदासीनता की एक बड़ी क़ीमत चुकाने को अब मजबूर होना पड़ रहा है. और इससे हर कोई किसी न किसी तरह प्रभावित हुआ है चाहे शोषण का शिकार हुई युवतियां हों या फिर उनके बच्चों का पालन-पोषण कर रहे उनके परिजन.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार