रमज़ान में इस्लामी चरमपंथी हमले क्यों?

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फ़्रांस, कुवैत, ट्यूनीशिया. तीन अलग-अलग हमले और इन सभी में इस्लामी चरमपंथियों का हाथ. पिछले हफ़्ते हुए इन हमलों में 70 जानें गईं.

फ़िलहाल रमज़ान का महीना चल रहा है, जब माना जाता है कि मुस्लिम न केवल हिंसक गतिविधियों से दूर रहते हैं, बल्कि हिंसक विचारों से भी तौबा करते हैं.

ऐसी गतिविधियों की निंदा करने के लिए ग़ैर मुस्लिम या सेक्युलर मुस्लिम होने की ज़रूरत नहीं है.

अगर रमज़ान जैसे पवित्र महीने में ऐसी घटनाओं को देखें या धार्मिक इस्लामी मान्यताओं के लिहाज़ से इन घटनाओं पर नज़र डालें तो ये गतिविधियां ख़ुद की निंदा करती दिखती हैं.

लेकिन, हिंसा की कोई यह पहली वारदात नहीं है और ना ही आख़िरी होगी.

इस तरह की घटनाओं के लिए अब केवल इस्लामी चरमपंथ को ज़िम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं रह गया है.

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अब धार्मिक मुस्लिमों को ख़ुद से पूछना होगा - क्या वो अपने विचारों में इस तरह की हिंसा के कीड़े नहीं पालते?

ऐसी हिंसक घटनाओं से हैरान होने वाले आम धार्मिक मुस्लिमों की ज़िंदगी में ये कीड़ा कई तरीक़े से पैठ बनाता है.

उदाहरण के लिए, आप मानते हैं कि अन्य लोगों को सार्वजनिक रूप से अपने ईश्वरों की पूजा करने का दोयम दर्जे का अधिकार है. सऊदी अरब और ईरान जैसे मुस्लिम देशों में ऐसा मानना आम बात है.

यहीं पर आप में एक कीड़ा है जो हिंसा को पैदा कर सकता है और अक्सर करता ही है.

ठीक इसी तरह, अगर आप मानते हैं कि पुरुषों के पास महिलाओं पर अपनी मनमर्जी थोपने और उन्हें ये बताने का अधिकार कि कैसे रहना या पहनना है. तो चरम शारीरिक हिंसा, इस दबंग मर्दवादी सोच से चंद क़दम ही दूर होती है.

यह स्वाभाविक है कि यह सोच केवल मुस्लिमों पर ही लागू नहीं होती. उदाहरण के लिए भारत में अधिकांश हिंदू राष्ट्रवादी, महिलाओं के कपड़ों और उनके रहन-सहन पर अपनी सोच थोपकर उसी राह के राही हो जाते हैं.

और यहां से एसिड हमले, बलात्कार और हत्याएं महज़ एक क़दम दूर ही रह जाती हैं.

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा

इस तरह, की सभी हिंसा - चाहे इनकार करने पर लड़की के ऊपर प्रेमी द्वारा एसिड फ़ेंकने की घटना हो या कम कपड़े पहन कर देर शाम बाहर निकलने वाली महिला का बलात्कार का मामला हो या एक इस्लामी कट्टरपंथी का अपने बॉस का सिर काटकर फ़ैक्टरी के गेट पर टांग देने की घटना, ये इस बात को न समझने से उपजती हैं कि अन्य लोग मान्यता, रहन-सहन, पहनावे आदि में अलग हो सकते हैं.

विविधता को स्वीकार करने से इनकार करना भी एक चरमपंथी गतिविधि है. बहुत सारे धार्मिक और राष्ट्रवादी लोग इस इनकार को अपने दिल में रखे रहते हैं, बिना इस पर प्रतिक्रिया दिए.

आप असहिष्णुता की जड़ों को ऐसे दिलों में तलाश सकते हैं, जहां से चरमपंथ का हिंसक नतीजा सामने आता है.

अपने दिल में दूसरे की भिन्नता को स्वीकार करने से इनकार करने और बलात्कारी, दंगाई और धार्मिक चरमपंथ की हिंसा के बीच एक रेखा होती है.

हम सभी को अपने दिलों में झांकने की ज़रूरत है.

नस्लीय हिंसा

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यह पश्चिम पर भी लागू होता है. फ़्रांस, कुवैत और ट्यूनीशिया में हुए हमलों के एक सप्ताह पहले ही एक और हमला हुआ था लेकिन इसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं था.

बीते 17 जून की शाम अमरीका के साउथ कैरोलिना के चार्ल्सटन में स्थित एमानुएल अफ़्रीकन मेथोडिट एपिस्कोपल चर्च में अंधाधुंध गोलीबारी की गई.

इस हमले में वरिष्ठ फ़ादर और राज्य के सीनेटर क्लेमेंटा सी पिंकने समेत नौ लोग मारे गए.

यह चर्च अमरीका के सबसे पुराने काले लोगों के चर्चों में एक है और लंबे समय से नागरिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की एक जगह रही है.

पुलिस ने उत्तरी कैरोलिना के शेल्बाई से संदिग्ध को गिरफ़्तार किया, जिसकी पहचान 21 वर्षीय डिलॉन रॉफ़ के रूप में हुई. वो गोरा था.

हालाँकि पुलिस इन दोनों तरह के अपराधों के बीच संबंध नहीं बताती है लेकिन तभी मुझे नॉर्वे का कुख्यात घोर दक्षिणपंथी चरमपंथी और 2011 के नॉर्वे हमलों के मुजरिम एंडर्स ब्रेविक का ख्याल आता है, जिसने वामपंथी नॉर्वेजियाई पार्टी के समर्थक क़रीब 100 युवाओं की हत्या कर दी थी.

नफ़रत

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Image caption साल 2011 के नॉर्वे हमले के दोषी एंडर्स ब्रेविक.

ब्रेविक ने आरोप लगाया था कि नॉर्वे के वामपंथी विचार से प्रभावित लोग, देश में काले और मुस्लिमों को घुसने दे रहे हैं.

उसने ये घटना बदला लेने की मंशा से अंजाम दी थी.

रॉफ़ अफ़्रीकी अमरीकियों के प्रति घृणा से प्रेरित दिखे.

ये दोनों ही गोर नस्लवादी लगते हैं, जो ईसाइयत की कट्टर मान्यताओं से प्रेरित थे.

पश्चिमी मीडिया में इन दोनों घटनाओं के बीच संबंध नहीं जोड़ा गया.

लेकिन मुझे ताज़्जुब होगा, यदि रॉफ़, ब्रेविक के कारनामे से प्रेरित नहीं था, जैसा कि इस्लामिक स्टेट से सीधा न जुड़े रहने पर भी अकेला कट्टर इस्लामी, पहले हुए इस्लामी हमलों से प्रेरित होता है.

दिल में झांकने की ज़रूरत

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मेरी समझ से, कट्टर हिंदुत्व, गोरे नस्लवादी या ईसाई कट्टरवादी से इन हमलों का सीधा संबंध तलाशना बेकार लगने लगा है.

किसी को इसकी ज़रूरत नहीं है. अगर ज़रूरत है तो सभी धर्मों के मानने वालों के दिलों में झांकने की ज़रूरत है.

या इन सभी धर्मावलंबियों को खुद अपने दिल में झांकने की ज़रूरत है.

अगर आप अपने दिल में दूसरों की मान्यताओं के लिए जगह नहीं पाते हैं तो मेरा यक़ीन करिए, आपका दिल वही जगह है, जहां से इस तरह की हिंसा जन्म लेती है - इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप वास्तविक ज़िंदगी में कितने शांतिप्रिय व्यक्ति हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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