संस्कृत को उसकी संस्कृति ने मारा

संस्कृत, अध्यापिका

संस्कृत क्यों पढ़ें? ‘इससे जन-जन का मन शुद्ध होता है और जग पवित्र.’ गोया संस्कृत भाषा न हुई, गंगा जल हो गई, जिसमें डुबकी लगाने पर जीवन भर के सारे पाप धोने की गारंटी पंडे देते हैं.

संस्कृत भाषा का यह धार्मिक प्रचार कोई पंडा नहीं, भारत की विदेश मंत्री कर रही थीं. वह भी शुद्ध संस्कृत में.

जैसे दुकान पर जाइए तो घी के आगे शुद्ध न लगा होने पर आप उसे खरीदेंगे नहीं. वैसे ही संस्कृत जब कोई बोल रहा हो तो शुद्ध होनी चाहिए, वरना बोलने वाले का मान नहीं. वो भी विदेशी भूमि पर.

तो विदेश मंत्री ने शुद्ध संस्कृत में संस्कृत का गुणगान किया. संस्कृत कैसी है?

गंगा की तरह, जो गोमुख में तो पवित्र होती ही है, वहां से गंगा सागर तक यह पवित्र ही बनी रहती है. रास्ते में मिलने वाली हर नदी-सोते को यह पवित्र करती चलती है. जो गंगा के संपर्क में आया, गंगा ही हो जाता है.

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बाकी बात छोड़ दें, अगर गंगा पवित्र ही बनी रहती है, तो अभी बनारस में जिस नदी को शुद्ध करने का पवित्र अभियान चलाया जा रहा है, उसका नाम क्या है?

‘जैसे गंगा के संपर्क में जो आया वह पवित्र हो जाता है, वैसे ही संस्कृत जिसे छू देती है, वह पावन हो जाता है.’

विदेश मंत्री के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग, उपभोक्तावाद, सभ्यताओं के संघर्ष, गरीबी और आतंकवाद: सबके लिए संस्कृत में समाधान मौजूद है. यह बात न तो ग्रीस को सूझी और न यूरोपीय संघ को, वरना संस्कृत पढ़कर वे अभी अपना आर्थिक संकट सुलझा चुके होते!

और ‘इस्लामिक स्टेट’ के ख़िलाफ़ युद्ध में विजय की रणनीति भी संस्कृत ग्रंथों से सीख ली गई होती.

संस्कृत भाषा है या रामबाण या ओझाजी और फ़कीर साहब का गंडा ताबीज? अगर आप विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का वक्तव्य पढ़ें, जो उन्होंने विश्व संस्कृत सम्मलेन के उद्घाटन के अवसर पर बैंकाक में दिया है, तो आपको ऐसा ही लगेगा.

संस्कृत और शुद्धता

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संस्कृत की बात शुरू होते ही उसे देवी मानकर उसकी पूजा-वंदना शुरू हो जाती है. आप संस्कृत की बात करें तो पवित्रता, शुद्धता का जाप आरम्भ हो जाता है.

किसी भाषा को मार डालने का सबसे अच्छा उपाय है उसे शुद्ध बनाए रखने का आग्रह. जो भाषा रोज़मर्रा के जीवन के कीचड़-कादो, धूल-मिट्टी, पसीने से लथपथ नहीं होती, वह फल-फूल नहीं सकती.

भाषा के साथ पवित्रता नहीं दूषण शब्द सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होना चाहिए.

संस्कृत के शत्रु हैं उसके हिंदू भक्त. उसके सबसे बड़े शत्रु थे वे ब्राह्मण जिन्होंने बड़ी आबादियों को संस्कृत के संपर्क में आने के अयोग्य ठहराया.

यह सवाल सहज ही उठना चाहिए कि क्यों एक समय तक एक ही जाति के लोगों का संस्कृत पर कब्जा रहा!

वह तो भला हो धर्मनिरपेक्षता का और जाति आधारित आरक्षण का, वरना न मुसलमान और न अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग कभी संस्कृत पढ़ने का अवसर पाते, उसे पढ़ाने के लिए उनकी नियुक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए.

आप सिर्फ मराठी में लिखी विद्वान कुमुद पवाड़े की आत्मकथा के उस अंश को पढ़ लीजिए जिसमें वे संस्कृत पढ़ने के अपने कठिन संघर्ष की कथा कहती हैं, जो उन्हें एक दलित स्त्री होने के कारण करना पड़ा.

भाषाई लचीलापन

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संस्कृत के साथ परेशानी यह है कि उसे एक साथ शास्त्रीय (क्लासिकल) और आधुनिक मानने का आग्रह किया जाता है. प्रश्न इसका नहीं कि वह शास्त्रीय या आधुनिक मानी जाए या नहीं, प्रश्न सिर्फ यह है कि वह जीवित और जीवंत भाषा है या नहीं!

उसकी एक जांच इससे होती है कि वह कितने स्रोतों से शब्द और भाषिक प्रयोग ग्रहण कर स्वीकार करती है.

क्या संस्कृत अनुवाद की भाषा है? क्या उसमें अंग्रेज़ी-फ्रेंच, तमिल, उर्दू, संथाली, हो, बोडो, अंगामी भाषाओं से अनुवाद हो रहे हैं?

या वह सिर्फ यह चाहती है कि उसके ग्रंथों का अनुवाद इन भाषाओं में हो? अगर लेन-देन नहीं है, अगर उसमें सिर्फ देने का घमंड है, लेने की विनम्रता नहीं तो वह समकालीन भाषा-जगत की नागरिक नहीं.

संस्कृत की पाठ्यपुस्तक निर्माण से जुड़ी एक विद्वान एक घटना का जिक्र करती हैं. एक बार एक पाठ में एक पंजाबी लड़की का नाम इस्तेमाल करने का मसला सामने आया.

परमिन्दर और परमिन्दरा

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नाम था ‘परमिंदर’. संस्कृत के पंडितों ने कहा कि संस्कृत में अकारांत स्त्रीलिंग शब्द नहीं है तो उसका रूप कैसे चलेगा.

कहा गया कि परमिंदर को संस्कृत की किताब में आने के लिए ‘परमिन्दरा’ होना होगा ताकि आकारांत स्त्रीलिंग शब्द ‘लता’ की तरह उसका शब्दरूप चलाया जा सके.

प्रश्न है कि क्या परमिंदर खुद को बदले या संस्कृत अपनी जिद छोड़ कर परमिंदर को सही-सही पुकारे?

दूसरा हठ है संस्कृत को हर भाषा की जननी मानने का. उसे विश्व की प्राचीनतम भाषा मानने का.

भाषा-विज्ञान का आरंभिक विद्यार्थी भी जानता है कि संस्कृत सिर्फ़ एक भाषा परिवार की सदस्य है और दूसरे भाषा परिवारों का जन्म उससे नहीं हुआ है. वह प्राचीनतम भी नहीं.

लेकिन इन दोनों बातों को मान भी लें तो इससे क्या सिद्ध होता है?

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

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संस्कृत में एक समय के बाद ज्ञान निर्माण का काम रुक गया और सिर्फ़ इसलिए कि उसे इस्तेमाल की जगह पूजा-अर्चना की वस्तु बना दिया गया.

भारतवर्ष में एक विशेष प्रकार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति ने उसे घेर लिया और संस्कृत के विद्वानों ने भी उसका प्रतिरोध नहीं किया.

आप जब राधावल्लभ त्रिपाठी या कमलेशदत्त त्रिपाठी जैसे विद्वानों को भी संस्कृत के मंचों पर नंगे पाँव देखते हैं तो समझ में आ जाता है कि वे अपनी आधुनिक चेतना के बावजूद संस्कृत को सांस्कृतिक राजनीति से मुक्त करने से कुछ डरते हैं.

इस सांस्कृतिक राजनीति का मतलब है, संस्कृत ज्ञान की नहीं, बल्कि मूल्यों की वाहक है. और वे मूल्य एक धर्म विशेष से जुड़े हैं.

संस्कृत को भारत की दूसरी भाषाओं की बराबरी पर आकर भाषा की तरह आचरण करना होगा, अपनी उच्चता का दंभ छोड़कर.

यह प्रश्न संस्कृत के लोगों को भी उठाना होगा कि क्यों भारत के विदेश मंत्रालय में संस्कृत का एक विशेष अफसर होगा!

देव भाषा या जन भाषा

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शेष भारतीय भाषाएँ को इस महत्व का अधिकार नहीं?

यह भी कि विश्व संस्कृत सम्मलेन में संस्कृत भारती के लोगों की अधिकता क्यों थी?

जानी हुई बात है कि यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एक मंच है. फिर उसे भारत के नागरिकों के टैक्स से क्यों प्राथमिकता दी जा रही है?

संस्कृतवादियों से संस्कृत कब आज़ाद होगी? क्या संस्कृत विद्वान-विदुषी को इसका साहस होगा?

क्या वे कह पाएँगे कि संस्कृत को इतनी माला न पहनाओ या बंद कमरे में इतना धूप-अगरबत्ती न दिखाओ कि उसका दम घुट जाए.

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संस्कृत की खिड़कियाँ, दरवाजे खोलो, उसे गली-चौराहे पर घूमने दो, उसे आज के सुख-दुख, संघर्ष, जीत-हार की कहानी कहने दो, उसके गीत गाने दो.

संस्कृत को प्रशंसा के ज़हर से न मारो. उसे अलौकिक दुनिया से उतार कर वास्तविकता की कड़ी ज़मीन पर पाँव रखने दो, लहू-लुहान होने दो.

तभी वह नई हो सकेगी, दूसरी भाषाओं से बोल-बतिया सकेगी. अभी जो उसका कंठ अवरुद्ध हो गया है, खुल सकेगा.

यानी वह देव भाषा बनी रहना चाहेगी या जन भाषा बनेगी?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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