रेप अपराध है क्योंकि देह एक मंदिर है?

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कई बार अच्छी नीयत वाले फ़ैसले फ़ायदे से ज्यादा नुक़सान कर देते हैं. एक और 'बड़ी भूल' हुई है.

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में अदालत के बाहर किसी भी समझौते को महिलाओं के ख़िलाफ़ क़रार दिया है.

मध्यप्रदेश सरकार बनाम मदनलाल के इस मामले में जस्टिस दीपक मिश्रा ने यह ऐतिहासिक फ़ैसला दिया.

असल में पिछले हफ़्ते मद्रास हाई कोर्ट के एक जज ने बलात्कार के एक मामले में ज़मानत मंज़ूर करते हुए कहा था कि वो पीड़िता के साथ कोई समझौता कर सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बुधवार को ऐसे किसी भी तरह के सुझाव को 'एक बड़ी भूल' बताया. आईए जाने कि फैसला क्या है.

जस्टिस दीपक मिश्रा का फ़ैसला

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हम यह साफ़ तौर बता देना चाहते हैं कि बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के किसी मामले में किसी भी तरह के समझौते पर विचार नहीं किया जा सकता. यह उस औरत के शरीर के ख़िलाफ़ अत्याचार है, जोकि उसका अपना मंदिर है. ये ऐसे अपराध हैं, जो ज़िंदगी का दम घोंटते हैं और इज़्जत पर दाग लगा देते हैं और यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि इज्ज़त व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण होती है.

जब इंसान का शरीर अपवित्र किया जाता है तो उसका सबसे ‘विशुद्ध खजाना’ छिन जाता है. किसी महिला की इज्जत उसके अमर और न ख़त्म होने वाले स्वाभिमान का हिस्सा होती है और किसी को उस पर दाग लगाने की सोचना भी नहीं चाहिए.

ऐसे मामलों में किसी तरह का सुलह या समझौता नहीं हो सकता है क्योंकि यह उसके सम्मान के ख़िलाफ़ होगा जिसका मूल्य सबसे अधिक है. यह पवित्र है. कभी कभी यह ढांढस बंधाया जाता है कि अपराध करने वाला उससे शादी करने को तैयार हो गया है, जोकि ग़लत तरीक़े से दबाव डालने जैसा ही है.

और हम जोर देकर कहते हैं कि इस मामले में नरमी का रुख अख़्तियार करने वाले उपाय से अदालतें पूरी तरह दूर रहें. किसी भी तरह का उदार रुख असाधारण ग़लती मानी जाएगी.

हम ये कहने को मज़बूर हैं कि इस तरह का व्यवहार एक महिला के आत्मसम्मान के प्रति असंवेदनशीलता को दिखाती है. इस मामले में किसी भी तरह का उदार रुख या समझौते का विचार पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है.

क़ानून का तर्क

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मुझे इस फैसले की भाषा पर आप्त्ति है. अपने शरीर पर अधिकार, महिला को संविधान और मानवाधिकार से मिलता है, न कि इज़्जत, सम्मान, पवित्रता जैसे रुढ़िवादी विचारों से.

बलात्कार के मामलों में समझौता क़ानूनन प्रतिबंधित है. सुप्रीम कोर्ट और दूसरी अदालतों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वो अपने फ़ैसले क़ानूनी तर्क के आधार पर दें, इसलिए नहीं कि वो दया कर रही हैं या महिलाओं के प्रति उदरता बरत रही हैं.

अदालतों के हालिया फैसले, पूरे न्यायिक तंत्र में बराबरी को लेकर मानवाधिकार और संवैधानिक अधिकार, महिलाओं के अधिकार और यौन हिंसा पर तुरंत संवाद की ज़रूरत दिखाते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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