अब क्या होंगे 'बलात्कार पीड़िता' के विकल्प?

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बलात्कार मामलों में सुलह समझौते को ग़ैरक़ानूनी और ‘असाधारण ग़लती’ बताने वाले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने निचली अदालतों के लिए मिसाल क़ायम कर दी है.

अगर इसे दूसरे पहलू से देखा जाए तो इसका मतलब है कि निचली अदालतें मद्रास हाईकोर्ट के उस फ़ैसले का उदाहरण नहीं दे सकतीं और न ही बलात्कारी को इस बुनियाद पर ज़मानत दे सकतीं हैं कि वो जाकर उस महिला के साथ समझौता कर सके, जिसका उसने बलात्कार किया था.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद तमिलनाडु में पीड़िता के पास क्या विकल्प है. वही औरत जिसके मामले में मद्रास होईकोर्ट ने समझौते का हुक्म सुनाया था.

कुडालोर पीड़िता के विकल्प

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मद्रास हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस के चंद्रू ने बीबीसी को बताया, “कुडालोर बलात्कार मामले में पीड़िता समझौते के लिए बातचीत से इंकार कर सकती है या अनुपस्थित हो सकती है. वो बलात्कारी को दी गई ज़मानत ख़ारिज़ करने की अपील कर सकती है. मध्यप्रदेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसले की रोशनी में जज को ऐसा करने करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.”

कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद कुडालोर की महिला इसके लिए रज़ामंदी नहीं थी.

दोषी ने इस मामले में कुडालोर की महिला कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा के ख़िलाफ अपील की थी.

निचली अदालत ने वी मोहन को सात साल की क़ैद और दो लाख रुपये ज़ुर्माने की सज़ा दी थी.

दिशा-निर्देश की मांग

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मद्रास हाईकोर्ट की वकील गीता रामासेशन कहती हैं, “सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला काफ़ी मददगार है क्योंकि निचली अदालतें मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले का हवाला भी नहीं दे पाएंगी और बलात्कारी को यूं ही जाने नहीं देंगी. हमारा क़ानूनी तंत्र मिसालों पर बहुत चलता है और अगर शीर्ष अदालत का फ़ैसला नहीं आता तो यह बहुत संभव है कि हाईकोर्ट के फ़ैसले को निचली अदालतें नज़ीर मानतीं.”

रामासेशन वकीलों के उस समूह में हैं जिसने जस्टिस पी देवदास के ‘मध्यस्थता’ वाले फ़ैसले को वापस लेने के लिए मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक ज्ञापन दिया था.

इस ज्ञापन में मुख्य न्यायाधीश से अपील की गई थी कि वो ऐसे मामलों में दिशा-निर्देश जारी करें कि किस मामले में मध्यस्थता की जाए और किन मामलों में ऐसा न किया जाए.

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