एक गांव जहां हर कोई है पेंटर

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Image caption साल 1989 में जनगढ़ सिंह श्याम पेरिस के पोम्पिडो सेंटर में अपनी पेंटिंग के साथ.

मध्यप्रदेश के डिंडोरी ज़िले के आदिवासी गांव पतनगढ़ को गोंड कला के लिए अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है.

एक हज़ार आबादी वाले इस गांव का लगभग हर वयस्क एक कलाकार है. इस गांव के कई पेंटर चित्र-प्रदर्शनी के सिलसिले में भारत और बाहर के कई देशों की यात्रा कर चुके हैं.

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इस सबकी शुरुआत हुई जनगढ़ सिंह श्याम से जिन्हें जे स्वामीनाथन ने ढूंढ निकाला था.

स्वामीनाथन 1980 के दशक की शुरुआत में आदिवासी कला को मुख्यधारा में ले आने के प्रयास के तहत मध्यप्रदेश के गांवों की यात्रा पर थे.

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Image caption पेरिस में वी विश्वनाथन के साथ उनके आवास में मुलाकात करते जनगढ़ सिंह श्याम.

दुर्भाग्य से श्याम ने 39 साल की अवस्था में जापान में आत्महत्या कर ली थी.

आज उनके काम की क़ीमत करीब 10 लाख रुपए के बराबर की है. यह भारत में किसी भी आदिवासी कलाकार के लिए सबसे बड़ी क़ीमत है.

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Image caption पेरिस में दिग्गज कलाकारों के साथ जनगढ़ सिंह श्याम.

लेकिन श्याम की सफलता ने कलाकारों की एक पूरी पीढ़ी को जन्म दिया है.

इसमें रामसिंह उर्वेती, दुर्गा बाई, नानकुसीआ श्याम और इनके जैसे दूसरे कई कलाकार शामिल है जिन्होंने इस कला की परंपरा को ज़िंदा रखा है.

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इन्होंने दूसरों को इस बात के लिए भी प्रेरित किया है कि वे मजदूरी छोड़ कला से अपनी रोजी-रोटी कमाएं.

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आज पतनगढ़ की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह से पेंटिंग्स पर टिकी हुई है. और यह पूर्वी मध्यप्रदेश के गरीब देहाती इलाके में एक संपन्न गांव है.

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1989 में श्याम ने अपनी पेंटिंग 'मैजेशियन ऑफ़ द अर्थ' को पेरिस में दिग्गज पश्चिमी कलाकारों के साथ पोम्पिडो सेंटर में प्रदर्शित किया था.

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जनगढ़ श्याम का जन्म 1962 में हुआ था और उन्होंने अपना बचपन मध्यप्रदेश के मंडला जंगलों में बिताया था.

फिर उन्हें भारत भवन के रूपांकर म्यूजियम के निदेशक जे स्वामीनाथन भोपाल ले आए और उनका परिचय मुख्यधारा की आधुनिक कलाजगत से कराया.

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Image caption जनगढ़ सिंह श्याम की पत्नी जापानी श्याम, बेटी नानकुशिआ और बेटा मयंक श्याम.

3 जुलाई को जनगढ़ सिंह श्याम की पुण्यतिथि है.

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