जहाँ मुस्लिम गीता की मिसालें देते हैं..

आरिफ़ बेग और दूसरे लोग, सांप्रदायिक सद्भावना बैठक में

रमजान का दिन. दोपहर का समय. जुलाई का पहला रविवार. दिल्ली में मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के पीछे एक मुस्लिम बस्ती है. तंग सड़क से होकर यहाँ पहुँचो, तो दूर तक फैले एक काम्प्लेक्स के अंदर एक मस्जिद है. एक क़ब्रिस्तान और कई घर भी नज़र आते हैं.

ये बस्ती दिल्ली के प्राइम इलाक़े में है. ऐसा लगता है कि बिल्डरों की नज़र इस पर अब तक नहीं पड़ी है. यहाँ अब भी समृद्धि की कमी है. पूरा इलाक़ा पिछड़ा हुआ है.

लेकिन इसका पिछड़ापन केवल आर्थिक स्तर पर है. रूहानी रूप से ये रोशन है. यहाँ की मक्की मस्जिद में हर महीने के पहले रविवार को एक सभा होती है जो संप्रादायिक सदभावना को बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित की जाती है.

इसकी शुरुआत भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक आरिफ़ बेग ने की थी. सभा में मौजूद हिंदू, मुस्लिम और ईसाई लोगों से वो कहते हैं, "जब मैंने ये काम शुरू किया था तब 40 बरस का था. अब मैं 80 साल का हूँ."

लंबी उम्र के बावजूद वो स्वस्थ हैं और हर महीने के पहले रविवार को अपने शहर भोपाल से यहाँ सभा का नेतृत्व करने आते हैं.

अटूट सिलसिला

इस सभा में मेरी रुचि का कारण था इसका 40 साल से चला आ रहा अटूट सिलसिला.

मैंने लंदन और वॉशिंगटन में इस तरह की सद्भावना सभाओं में शिरकत की थी लेकिन भारत में पहले किसी ऐसी सभा में नहीं गया था जहाँ सभी मजहब के लोग आकर अपने विचार प्रकट करते हों.

इस सभा में जाने का दूसरा कारण ये देखना था कि जिस हिंदुत्व परिवार के लोगों पर हाल में घर वापसी और धर्म परिवर्तन के आरोप लगे हों उसी परिवार के सदस्य इस सभा का आयोजन किस तरह से करते हैं और क्या पैग़ाम देते हैं.

सफ़ेद दाढ़ी वाले आरिफ़ बेग 80 वर्ष के ज़रूर हैं लेकिन उनकी आवाज़ दमदार है. सभा के शुरू होते ही सद्भावना पर ज़ोर देते हैं. "श्री कृष्ण सबके हैं, श्री राम सबके हैं जब ये संदेश जाएगा, मंदिर से, मस्जिद से, गुरुद्वारे से और गिरजाघर से तो आपस में मुहब्बत बढ़ेगी."

दो बार लोकसभा का चुनाव जीतने वाले आरिफ़ बेग केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं.

'मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं'

Image caption आरिफ़ बेग दो बार सांसद रह चुके हैं.

आरिफ़़ बेग के एक पुराने साथी जो एक ज़माने में सरकारी अधिकारी थे, आज खुद को योग का विशेषज्ञ कहते हैं. उनके अनुसार देश के मुसलमान माइनॉरिटी या अल्पसंख्यक नहीं हैं.

वो कहते हैं, "मुसलमान माइनॉरिटी नहीं हैं. 18-20 करोड़ लोग कहीं माइनॉरिटी होते हैं? आप सेकंड मेजॉरिटी हैं. माइनॉरिटी तो पारसी हैं जिनकी छोटी सी आबादी है."

ये तर्क संघ परिवार की तरफ से अक्सर सुनने को मिलता है. लेकिन मुस्लिम समुदाय के अलावा देश का संविधान मुसलमानों को अल्पसंख्यक स्वीकार करता है. .

सभा में टोपी और दाढ़ी वाले मुसलमानो की संख्या हिंदू और दूसरे धर्मों के लोगों से अधिक थी.

संस्कृत विश्विदयालय में संस्कृत पढ़ाने वाले हनीफ शास्त्री क़ुरान और भगवत गीता के बीच सामान्य नसीहतों पर बल देते हैं.

अपने तर्क को साबित करने के लिए वो क़ुरान और गीता के श्लोक को ज़बानी सुनाते हैं. ऐसा लगता है उनके अंदर मुसलमान और हिंदू दोनों छिपे हैं.

भारतीय जनता पार्टी के नेता सैयद शहनवाज़ हुसैन एक ज़माने में आरिफ़ बेग के चेले थे. वो कहते हैं, "मैंने इसी जगह पर दस साल काम किया."

धर्मनिरपेक्षता की सीख

इन दिनों उनके चेले हैं पीएचडी स्कॉलर मुहम्मद बिलाल जिनके भाषण पर सभा में जोश आया और तालियों की गड़गड़ाहट में बीच उन्होंने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे पर पुरज़ोर अंदाज़ में अपने विचार रखे.

कांग्रेस के दौर में सालों से विविधता में एकता और धर्मनिरपेक्षता की सीख दी जाती रही है लेकिन इसके बावजूद सांप्रदायिक हिंसा आम बात है.

मोदी सरकार के आने के बाद विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और हिंदुत्व विचारधारा की दूसरी पार्टियों ने कई विवादास्पद बयान दिए हैं और हंगामा होने के बाद उन्हें वापस ले लिया है.

उनके खिलाफ मुसलमानों की घर वापसी या ईसाइयों के धर्म परिवर्तन की कोशिश या फिर गिरजाघरों पर हमलों के आरोप लगे हैं.

फ़रवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत में हर मज़हब के लोगों को आज़ादी है अपने मज़हब पर चलने की और ये कि उनकी सरकार सभों की सुरक्षा करेगी.

क़ुरान और गीता की मिसालें

गिरीश जोयाल आरएसएस के प्रचारक और संघ से प्रेरित राष्ट्रीय मुस्लिम मंच से जुड़े हैं. मैंने उनसे पूछा कि धर्म परिवर्तन और घर वापसी जैसी विवादास्पद मुहिम के बीच वो सदभावना का पैग़ाम लोगों तक कैसे ले जाते हैं, तो उनका कहना था, "इस्लाम में कुनबे की बात कही गई है. कहीं न कहीं हम एक ही कुनबे के ही लोग तो हैं."

उनकी घर वापसी की परिभाषा से शायद मुस्लिम समुदाय संतुष्ट न हो लेकिन अपने तर्क को मनवाने के लिए मुस्लिम गीता से मिसालें दे रहे थे और हिंदू क़ुरान की पंक्तियों से उदाहरण दे रहे थे.

पिछले एक साल की घटनाओं से मुस्लिम समुदाय में पैदा होने वाले भय को और सरकार में उनकी घटती हुई प्रतिनिधि जैसी समस्याएं क्या अधिकारियों तक पहुंचाई जाती है?

अंत में ये सवाल मैंने हनीफ शास्त्री से पूछा. वो बोले, "बिल्कुल. आवाज़ उठाई जाती है लेकिन मुसलमानों के जो हालात हैं वो हमारी ग़लतियों का नतीजा हैं या हमारी नासमझियों का या फिर हमारे अंदर के अलगाववादी मिज़ाज का नतीजा हो. ये सब मिला जुला है."

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