अब 'धर्म संकट' में फँसी मुख्यमंत्री राजे

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राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए पिछला महीना काफी उथल-पुथल वाला था.

पूर्व आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी से व्यावसायिक और पारिवारिक संबंधों को लेकर उन्हें विपक्षी कांग्रेस के तीखे हमले झेलने पड़े.

वो विवाद अभी ठंडी भी नहीं हुआ है कि अब एक नए 'धर्म संकट' ने उन्हें घेर लिया है.

जयपुर मेट्रो के दूसरे फेज़ के रास्ते में आने वाले मंदिरों को तोड़ने के ख़िलाफ़ शहर में मंदिर बचाओ संघर्ष समिति ने जो चक्का जाम गुरुवार को किया, उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा समर्थन प्राप्त था.

मेट्रो के कारण मंदिर टूटे

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जहाँ शहर में 'विकास बनाम विरासत' पर बहस तेज़ हो गई वहीं ज़्यादा चर्चा इस बात पर छिड़ गई कि यह संघ की 'डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज' थी या मुख्यमंत्री को घेरने की कोशिश?

वहीं कुछ स्थानीय लोगों का मानना है कि जयपुर शहर के 200-300 साल पुराने रोजगारेश्वर और कष्टहरण महादेव मंदिर तोड़े जाने से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर संकट मंडराने लगा है.

राजनीतिक घटनाक्रमों को बारीकी से देखने वाले एक वरिष्ठ पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अरुण कुमार ओझा कहते हैं, "गुजरात में विकास कार्यों के लिए बहुत से धार्मिक स्थलों को हटाया गया पर कोई आंदोलन नहीं हुआ."

अंदरूनी राजनीति

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अरुण कुमार ओझा के मुताबिक़, " राजस्थान में सरकार और नौकरशाही के बीच तालमेल की कमी रही और नौकरशाही ने भी कुछ अति उत्साह से काम लिया है."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चतुर्वेदी का मानना है कि संघ और सरकार दोनों को ही वोट बैंक में रोष पनपने का फीडबैक मिला है.

उनका कहना है, "चक्का जाम से संघ ने जनता का गुस्सा शांत करने का प्रयास तो किया ही है. यह जानने की कोशिश भी कि शहर भाजपा में उसकी पकड़ कितनी मजबूत है."

वे कहते हैं, "मुख्यमंत्री राजे से संघ की नाराज़गी कोई नई बात नहीं है. ललित मोदी प्रकरण के मद्देनज़र केंद्रीय नेतृत्व से भी राजे की दूरियां और बढ़ ही गईं हैं."

धर्म संकट

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पत्रकार अनिल चतुर्वेदी के अनुसार, "वैसे मुख्यमंत्री लम्बे अरसे से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को खुश करने की कोशिश करती आ रही हैं. वे राजस्थान में 'गुजरात जैसे विकास' की बात अक्सर करती हैं और गुजरात की ही तर्ज़ पर 'रिसर्जेंट राजस्थान' को सफल बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं."

उधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मंदिर तोड़ने के मुद्दे का राजनीतिकरण भाजपा स्वयं कर रही है. एक हाथ से तोड़ रही है तो दूसरे हाथ से विरोध कर रही है. इसलिए कि कल जब जनता पूछेगी कि आप लोग कहाँ थे, जब मंदिर टूट रहे थे तो वे कह सकें कि हमने चक्का जाम किया था."

भाजपा विधायकों का धर्म संकट यह रहा है कि वो सरकार के साथ रहें या संघ के साथ.

विरोधी सक्रिय

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चक्काजाम में अधिक सक्रिय राजे के धुर विरोधी भी थे, जैसे मौन व्रत में रहे घनश्याम तिवारी जबकि नरपत सिंह राजवी और सुरेंद्र पारीक मुखर रहे.

संघ पृष्टभूमि वाले सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अरुण चतुर्वेदी चक्का जाम में शामिल नहीं हुए, पर मोटर साइकिल पर बैठ कार्यकर्ताओं को अपना चेहरा ज़रूर दिखाया.

जयपुर सांसद राम चरण बोहरा, शिक्षा मंत्री काली चरण सराफ, भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी ने चक्का जाम में शिरकत नहीं की.

ऐसी सम्भावना जताई जा रही है कि संकट मोचन के लिए सरकार मेट्रो कॉरिडोर निर्माण के बाद पुराने मंदिरों को वहीं बनाने का आश्वासन दे सकती है.

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