'भारत पाक: शांति की राह में सुरक्षा आड़े'

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नरेंद्र मोदी एक स्मार्ट आदमी हैं और उनके आसपास भी ऐसे ही लोग मौजूद हैं. जयशंकर से लेकर डोवाल तक, सब से बुद्धिमानी छलक रही होगी.

लेकिन आईक्यू की तरह स्मार्टनेस भी कुछ निश्चित खांचों में ही काम करती है.

बात प्रदर्शन की हो या फिर नज़रिए की, आईक्यू कुछ नया सोचने की बजाय अकसर पारंपरिक, या कहिए कुछ मानक खांचों में ही सोच को समेट देता है.

और जब बात पाकिस्तान जैसे मुद्दे की आती है तो दमदार कदमों के साथ ऐसे कौशल की भी उम्मीद की जाती है जो मौक़े की नज़ाकत को तुरत भांप पाए.

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नरेंद्र मोदी अगले साल पाकिस्तान जाएंगे. इस दौरान दोनों देशों के विदेश सचिवों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच कई बैठकें होंगी.

मुख्य मुद्दे रहेंगे सुरक्षा, सीमा, चरमपंथ और पर्यटन. एक तरह से देखें तो इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि ये सभी मुद्दे कितने अहम हैं.

हालांकि दूसरे स्तर पर देखें तो, इनमें से कोई भी मुद्दा किसी को हैरान नहीं करेगा.

मोदी और नवाज़ शरीफ़ इस बात के लिए सम्मान के हक़दार तो हैं ही, कि वे बातचीत के बिंदु या मुद्दे खोज रहे हैं लेकिन ऐसे समझौते शांति से ज़्यादा सुरक्षा पर ही केंद्रित होते हैं.

सुरक्षा के लिहाज़ से देखें, तो बातचीत का ये दौर उन दो खुर्राट नेताओं के बीच ज़ोर आजमाइश बन जाएगा, जिनमें हर कोई ये साबित करने के लिए तैयार बैठा है कि वो अपनी पुराने रुख़ से एक इंच भी नहीं डिगा है.

हालांकि इसी पूरी कवायद में कुछ भी नया नहीं दिखाई पड़ता है.

अड़ियल रुख़

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एक दूसरे के प्रति कठोर रवैया रखने वाले देशों के बीच हर पक्ष ऐसा कोई भी क़दम उठाने से डरता है जिसे ग़लती समझा जाए और जो प्रतीकात्मक कमज़ोरी माना जाए.

आम लोग अपनी राय अकसर अख़बारों के संपादकियों या फिर टीवी पर आने वाली बहसों के आधार पर भी बनाते हैं.

ये लोग आपसे फट से पूछ देंगे, क्या हम अलग तरीके से सोच सकते हैं? क्या हम रोक-टोक से सहयोग की तरफ़ बढ़ सकते हैं? क्या हम सुरक्षा वाली भाषा से परे जा सकते हैं?

वैसे भी एक शर्त के रूप सुरक्षा, शायद ही शांति की भाषा बोलती है.

कल्पना कीजिए, हम नई संभावनाओं के बारे में सोचने के लिए संस्कृति और अतिसंवेदनशीलता जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं.

शांति की ओर क़दम

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भारत और पाकिस्तान सार्क आंदोलन की धुरी रहे हैं, इसलिए हम और ज़्यादा कल्पनाशील मुलाक़त की उम्मीद कर सकते हैं.

परिवेश और किसी चीज़ को सतत जारी रखने के बारे में सोचिए. और शांति के उस विज्ञान के बारे में सोचिए जिसकी ज़िम्मेदारी दोनों देशों पर है.

क्या हम बातचीत के ऐसे नए तरीक़ों के बारे मे सोच सकते हैं, जिसके नतीजे में साझा परियोजनाएं और प्रयोग सामने आए.

यहां तक कि हिमालय पर दोनों देश साझा शोध संस्थान तक बना सकते हैं. ऐसा कोई शोध संस्थान क्षेत्र को लेकर एक नए विचार में बड़ा योगदान दे सकता है.

असल में, इंडोनेशिया के बाद सबसे ज़्यादा मुसलमान आबादी भारत और पाकिस्तान में ही है.

ख़ास कर भारत देवबंद के कारण एक नई तरह की विचारधारा वाला देश रहा है.

सवाल यह है कि क्या इस्लाम को दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान का ज़रिया बनाने की संभावनाओं पर हम नए सिरे से सोच सकते हैं, जिसमें भाषा के रूप में उर्दू मौजूद है.

चरमपंथ से मुक़ाबला

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सउदी अरब के हालिया उभार या फिर आतंक की भाषा बोलने वाले उभरते कट्टरपंथी इस्लाम के साथ धर्म के सिद्धांत और धार्मिक संवाद के ज़रिए ही लड़ना होगा.

चरमपंथ के असर को संस्कृति, आर्थिक मज़बूती और मुक्त विचारों के प्रवाह के ज़रिए ख़त्म किया जाना चाहिए.

भारत और पाकिस्तान दोनों को यह समझना चाहिए कि सुरक्षा शांति की संभावना को और कमज़ोर बना देती है.

धार्मिक पर्यटन की तरह ही मेडिकल पर्यटन की इजाज़त दे कर, हम अधिक लोगों का दिल जीत सकते हैं. ऐसे लोग निश्चित रूप से शांति चाहेंगे.

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1947 के बाद जन्म लेने वाले बच्चों के लिए सबसे बड़ी आकांक्षा, भारत पाकिस्तान की एक साझा टीम को देखने की थी, जो दुनिया की अजेय टीम होगी.

फिर शांति के नए अवसर पैदा करने के लिए कोई इस नेक विचार को क्रिकेट से विज्ञान, पारिस्थितक तंत्र, धर्म और प्रशासन तक ले जाना की इच्छा भी होगी.

समझदार भारत और पाकिस्तान शांति के पनाहगाह बन सकते हैं, जिसे चंद बाहरी लोग ही नष्ट कर पाएंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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