जुगाड़ पर चलती डिजिटल इंडिया की गाड़ी

  • 15 जुलाई 2015
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'मेक इन इंडिया' के बाद 'डिजिटल इंडिया' मोदी सरकार का अगला महत्वाकांक्षी अभियान है.

भारत के ढाई लाख गाँवों को इंटरनेट से जोड़ना, सरकारी योजनाओंको गाँव-गाँव तक पहुँचाना इसका लक्ष्य है.

इस अभियान के तहत क्या हो रहा है? मंसूबे कैसे पूरे होंगे? अचड़नें क्या हैं? एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं? डिजिटल इंडिया अभियान के हर पहलू की बारीक़ी से पड़ताल कर रही है बीबीसी हिंदी की विशेष सिरीज़.

आज की कड़ी में जानिए कैसे 'जुगाड़' के ज़रिए भारत में खुद को 'डिजिटल' बना रहे हैं गांव-देहात के लोग.

'मुफ्त का 3-जी'

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भारत के दूर दराज़ इलाकों में सबसे बड़ी समस्या है मोबाइल सिग्नल और इंटरनेट स्पीड.

अव्वल तो हर जगह मोबाइल टॉवर नहीं और टॉवर हैं भी तो स्पीड का कोई भरोसा नहीं. ऐसे में पेशे से किसान और तकनीक में रुचि रखने वाले गिरींद्रनाथ झा कैसे एक जुगाड़ के ज़रिए अपनी मुश्किलें आसान करते हैं? जानिए.

गिरींद्र बताते हैं, "जुगाड़ बेहद सीधा सा है. अपने मॉडम को एल्युमीनियम फॉयल में लपेट दीजिए और सिस्टम से कनेक्ट कर सर्च चालू कर दीज़िए. आपका डिवाइस जैसे ही इंटरनेट पकड़ेगा आप पाएंगे कि स्पीड पहले से कहीं बेहतर है."

गिरींद्र कहते हैं, "कई बार हम इसके लिए दवा की एल्युमीनियम पैकिंग का इस्तेमाल भी करते हैं. जहां टूजी सिग्नल भी उपलब्ध नहीं वहां फॉयल लगाकर सर्फिंग लायक जुगाड़ हो ही जाता है. एक तरह से ये मुफ्त का 3-जी है. ये तरीक़ा आप गांव में कई जगह देखेंगे."

रेडियो राघव!

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रेडियो रिपेयरिंग की दुकान चलाने वाले राघव महतो ने साल 2003 में एक ऐसा जुगाड़ किया कि भारतभर में उसकी चर्चा हो गई.

पेशे से मकैनिक राघव ने बैटरी से चलने वाले एक टेप रिकॉर्डर से कुछ तार और एक कॉर्डलैस माइक्रोफोन जोड़कर रेडियो प्रसारण कर दिखाया.

राघव एफएम के नाम से मशहूर हुए रेडियो प्रसारण को 15 किलोमीटर के दायरे में सुना जा सकता था.

इस रेडियो किट को बनाने की लागत आई 50 रुपए.

रेडियो की बेहतर फ्रीक्वेंसी के लिए राघव ने इस्तेमाल किया अपने पड़ोस में बने अस्पताल की इमारत का.

इस इमारत पर लगे बांस के एक डंडे पर बंधे एंटीना ने राघव एफएम को घर-घर पहुंचाया और फरमाइशी गानों से लेकर, एचाईवी के प्रति जागरूकता, खोए बच्चों की जानकारी और मनोरंजन सबकुछ लोगों को परोसा गया.

पांच साल बाद कानूनी कारणों से ये रेडियो स्टेशन तो बंद हो गया, लेकिन राघव का ये जुगाड़ डिजिटल युग में बहुतों के काम आ रहा है.

राघव कहते हैं, "इस तकनीक के आधार पर मुझे कई जगह कम्युनिटी रेडियो शुरू करने का मौका मिला. मैंने बिहार और राजस्थान में कई लोगों के साथ काम किया. अब मैं बेहद कम क़ीमत और सीमित साधनों से पूरा रेडियो स्टेशन खड़ा कर सकता हूं."

एक अदद टीला...

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गांव का पठारी इलाका, नदी किनारे ऊंचा टीला और कुछ न मिले तो घना-ऊंचा पेड़. गांव में मोबाइल सिग्नल पकड़ने का ये जुगाड़ अब लगभग हर किसी की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है.

पूर्णिया के रहने वाले गिरींद्र बताते हैं, "ये एक तरह से गांव के इंटरनेट जोन हैं. हर किसी को पता रहता है कि गांव की वो कौन सी जगह है जहां सिग्नल अच्छा रहता है. किसी खास व्यक्ति से बात करनी हो, कोई ज़रूरी मेल हो, किसी का रिज़ल्ट देखना हो तो हर कोई इन इलाकों की तरफ दौड़ता है."

सिग्नल से जुड़ा एक दूसरा जुगाड़ जो हर कहीं नज़र आता है वो है बांस पर लगे मॉडम और डॉंगल. जितना ऊंचा बांस उतना बेहतर सिग्नल.

लंबे से लंबे तार इस्तेमाल कर लोग एक अदद बांस के ज़रिए देश-दुनिया से अपना कनेक्शन जोड़ते हैं.

मेरा-तेरा-सबका इंटरनेट!

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पासवर्ड को लेकर भारत में अब भी लोग अधिक जागरुक नहीं और इसी का फायदा उठाकर कई लोग जुगाड़ के ज़रिए मुफ्त वाई-फाई का मज़ा लूटते हैं. वाई-फाई पासवर्ड आमतौर पर शून्य से लेकर नौ अंक का कोई जोड़ होता है. अपनी सुविधा के लिए लोग अक्सर अंकों का सीधा-सरल जोड़ यानी 0123456789 या फिर 1234567890, 9876543210, 0987654321 पासवर्ड के तौर पर रखते हैं. ऐसे में एक या दो बार कोशिश कर किसी के इंटरनेट में सेंध लगाना मुश्किल नहीं.

इस तकनीक को आज़माने के आदि एक छात्र के मुताबिक, ''लोग अक्लमंद हों भी तो अक्सर अपने फ़ोन नंबर को पासवर्ड बना लेते हैं. ऐसे में जो कोई आपका नबंर जानता है वो आपका पासवर्ड भी जानता है. मैं तो कहूंगा अगली बार आपके इंटरनेट की स्पीड धीमी हो तो जांच लीजिए कि कहीं कोई सेंध लगाए तो नहीं बैठा.''

सीजीनेट स्वर ऐप

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छत्तीसगढ़ और उसके आसपास के कई इलाकों में मोबाइल फोन के ज़रिए स्थानीय खबरें रिपोर्ट करने वाला पोर्टल है सीजीनेट स्वर.

खबरें जुटाने और प्रकाशित करने का तरीक़ा बेहद आसान है. मोबाइल के ज़रिए खबर, तस्वीरें और आवाज़ रिकॉर्ड कर पोर्टल पर सीधे अपलोड की जा सकती हैं, लेकिन इस सबके के लिए ज़रूरी है इंटरनेट कनेक्शन, जो गांवों में अक्सर मौजूद नहीं होता.

इस समस्या का हल निकालने के लिए सीजीनेट टीम ने एक ऐप बनाया.

सीजीनेट टीम से जुड़ी कृतिका बताती हैं, "सीजीनेट से जुड़े गांव-गांव के जन-पत्रकार फ़ोन पर ही खबरें जुटाते और भेजते हैं. समस्या ये थी कि हर जगह इंटरनेट नहीं था और गांव से निकल कर लगातार सिग्नल पर नज़र रखने में काफी समय बर्बाद होता था. मैंने एक ऐप बनाया जिसके ज़रिए आवाज़ें, खबर और तस्वीरें फोन में एक जगह रिकॉर्ड की जा सकें और सिग्नल वाले इलाके में पहुंचते ही वो पोर्टल पर आपने आप अपलोड हो जाएं."

कुल मिलाकर इस ऐप के ज़रिए फोन रिकॉर्ड का काम करता है और सिग्नल आने पर अपलोडिंग आसान हो जाती है.

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