मोदी ने मध्य एशिया में क्या खोया, क्या पाया?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रूस और पाँच मध्य एशियाई देशों का दौरा पूरा हो गया है. पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद नरेंद्र मोदी दूसरे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने मध्य एशियाई देशों का दौरा किया.

यह दौरा इसलिए अहम था कि पांच देशों के इस आठ दिवसीय दौरे में भारत की मौजूदगी देखी भी गई और महसूस भी की गई.

दौरे का मक़सद था कि इन देशों में भारत को लेकर भरोसा बढ़े और आपसी कारोबार को भी बढ़ावा मिले.

भारत चाहता है कि वो इन देशों को यकीन दिला सके कि वो उनको लेकर बहुत गंभीर है.

नरेंद्र मोदी का दौरा ताजिकिस्तान, उज़बेकिस्तान, कज़ाक़स्तान, तुर्कमेनिस्तान और किर्गिस्तान में भारत की मौजूदगी बढ़ाने का सुनहरा मौका था.

इस दौरे में भारत को कई फ़ायदे मिले, लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हैं जिन्हें पहले से बेहतर किया जा सकता है.

रक्षा सहयोग

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रक्षा सहयोग की बात करें तो कज़ाक़स्तान, उज़बेकिस्तान और ताजिकिस्तान में भारत अपनी सामरिक पैठ को बनाने में सफल हुआ है.

भारत, ताजिकिस्तान के फरख़ार में सैन्य अस्पताल का निर्माण करा रहा है.

भारत यहाँ अपनी एक ऐसी उपस्थिति रखना चाहता है जो बहुत ही हावी न दिखाई दे और रूस जैसे देशों को कोई परेशानी भी न हो.

ख़तरों का सामना

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इन देशों को जो ख़तरे हैं, वहीं ख़तरे भारत को भी हैं. मसलन, चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट(आईएस) से पैदा हुआ ख़तरा.

आईएस से जो ख़तरा इराक़ और सीरिया में सामने आया है, भारत भी उससे बचना चाहता है और मध्य एशिया वाले भी उससे बचना चाहते हैं.

इस सिलसिले में भारत ने पेशकश की है कि ये सभी देश मिलकर इसका सामना करें.

भारत की इस पहल में ख़ासकर उज़बेकिस्तान शामिल है. इस मामले पर किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान से भी वार्ता हुई है.

तेल और गैस

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तेल और गैस ऐसे मुद्दे हैं जो भारत के लिए काफी अहम हैं. भारत में अगर उत्पादन बढ़ेगा तो इसके लिए अधिक तेल और गैस की ज़रूरत पड़ेगी.

ऐसे में तेल और गैस जैसे ईंधन इन देशों से कैसे हासिल किया जाए यह एक अहम सवाल है.

इसे देखते हुए तुर्कमेनिस्तान से गैस और कज़ाक़स्तान से गैस और तेल दोनों के कारोबार पर भारत ने समझौता किया है.

अंतरिक्ष मिशन

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इस दौरे में भारत और कज़ाक़स्तान के बीच अंतरिक्ष मिशन में मदद के लिए क़रार हुआ है.

इस समझौते के बाद भारत कज़ाक़स्तान के अंतरिक्ष केंद्र का इस्तेमाल रॉकेट लॉन्चिंग, चांद मिशन और मंगल मिशन के लिए कर सकता है.

भारत के मौजूदा परमाणु रिएक्टरों के लिए जो यूरेनियम चाहिए उसके लिए उसने कज़ाक़स्तान और उज़बेकिस्तान से क़रार किया है.

जिसके अनुसार कज़ाक़स्तान अगले तीन से पाँच सालों तक दो हज़ार टन यूरेनियम भारत को उपलब्ध कराएगा.

आपसी कारोबार

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चीन की तुलना में मध्य एशियाई देशों के साथ भारत का कारोबार काफ़ी कम है.

इसलिए भारत को ये सुनिश्चित करना होगा कि इन देशों के साथ उसका कारोबार बढ़े.

इन देशों के साथ भारत के रिश्ते अच्छे माने जाते रहे हैं लेकिन इसे तकनीकी रिश्ते में बदलना अभी बाक़ी है.

भारत को इन देशों के साथ टेक्नॉलॉजी ट्रांसफर की दिशा में ध्यान देने की ज़रूरत है.

फ़ैसले में देरी

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कैस्पियन सागर से जो तेल सप्लाई होती है उसमें भारत एक हिस्सा लेना चाहता था.

भारत ने इस मामले में फ़ैसला लेने में थोड़ी देरी की जिसकी वजह से कज़ाक़स्तान ने उसका हिस्सा चीन को बेच दिया.

इस तरह के फ़ैसले लेने में ऐसी देरी देरी नहीं करनी चाहिए, इससे देश की साख कम होती है.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

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