मंडल की मंडली के ख़िलाफ़ भाजपा के रथ

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इसे विडंबना कहें या कुछ और बिहार में बीजेपी को रथ और उसके राजनीतिक विरोधियों को मंडल की 25 साल बाद याद आई.

बीजेपा के अध्यक्ष ने 16 जुलाई को पटना के गांधी मैदान से 160 रथों को, जो कि जीपीएस और 52 इंच के एलईडी स्क्रीन से लैस हैं, हरी झंडी दिखा कर रवाना किया.

इस बार रथ किसी मस्जिद की जगह मंदिर बनाने के लिए नहीं बल्कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार की 'नाकामी' और 'जंगल राज' के विरोध में लॉन्च किया गया है.

इसका नाम 'परिवर्तन रथ' रखा गया है और आने वाले सौ दिनों में बिहार के सभी गांवों में बीजेपी के नेता एक लाख सभा करेंगे.

ये अलग बात है कि रथ की शुरुआत पटना में बारिश की वजह से कुछ देर से हुई.

रथ का इतिहास

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इस रथ को नीतीश कुमार के 'बढ़ चला बिहार' अभियान का जबाब माना जा रहा है और चुनावी प्रचार भी.

पच्चीस साल पहले जब पार्टी के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 के सोमनाथ से अयोध्या यात्रा निकाली थी तो उसके दो मतलब थे.

एक- राममंदिर बनाना और दूसरे मंडल कमीशन के लागू होने का विरोध करना.

तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने अगस्त 1990 में मंडल कमीशन की सिफ़ारिश को लागू किया था. जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने आडवाणी को अक्तूबर में समस्तीपुर में गिरफ़्तार कर लिया तो बीजेपी के 88 सांसदों ने (जो सिंह सरकार को बाहर से समर्थन देे रहे थे)समर्थन वापिस ले लिया और उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा.

लेकिन वह बीजेपी का आखिरी रथ नहीं था. उसके बाद आडवाणी ने अनेक रथ निकाले लेकिन इन रथ यात्राओं का इतना नाम नहीं हुआ.

अक्तूबर 2011 में जब उन्होंने बिहार के सितब दियारा से जन चेतना रथ निकाला तो उसे कोई और नहीं बल्कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही हरी झंडी दिखलाई थी.नीतीश ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उस समय वे बीजेपी के उभरते सितारे नरेंद्र मोदी से लोहा ले रहे थे.

लेकिन आडवाणी का रथ कोई ख़ास असर नहीं छोड़ सका और दो साल बाद वे प्रधानमंत्री की कुर्सी की दौड़ में मोदी से हार गए.

मंडल और रथ का खेल

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आज अमित शाह का रथ कुछ और बयान करता है.

ये उस समय हो रहा है जब बीजेपी खुद मंडल की सियासत खेल रही है.

और बड़ी बात ये कि बीजेपी के किसी बड़े कार्यक्रम में आज पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी शामिल हुए जो खुद एक दलित हैं.

अमितशाह इस साल में चौथी बार बिहार आए हैं. इससे पहले वे पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर फिर आंबेडकर जयंती और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर पटना में थे. चुनावी साल में बीजेपी का कर्पूरी और आंबेडकर प्रेम उसकी नई राजनीतिक चाल है.

पिछले साल के चुनावों से ही पार्टी ने बिहार में बैकवर्ड कास्ट का खेल शुरू कर दिया था.

लालू, नीतीश और बीजेपी

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जब नीतीश कुमार जाति को छोड़ कर अपने काम की मज़दूरी यानी वोट मांग रहे थे तो बीजेपी नरेंद्र मोदी को कभी पिछड़ा, कभी तेली और कभी चाय वाले के बेटे के तौर पर पेश कर रही थी.

पार्टी ने यादवों को तोड़ने की भरसक कोशिश की और रामकृपाल यादव, जो लालू के हनुमान माने जाते थे, उन्हें अपनी तरफ़ खींच लिया.

राम विलास पासवान जो कभी बीजेपी को भारत जलाओ पार्टी कह कर पुकारते थे, को भी एनडीए में शामिल कर लिया गया जबकि पार्टी के अंदर इस पर बहुत हंगामा हुआ.

लोकसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश और लालू को ज्ञान प्राप्त हुआ कि बिहार में काम से ज़्यादा शायद जाति पर वोट मिलता है.

इसलिए दोनों ने अपनी दुश्मनी छोड़ी और फिर उसी मंडल के खेल में लग गए जिसमें वे बहुत माहिर हैं.

लालू मंडल पर किताब लिखने की बात कर रहे हैं और जाति जनगणना को पब्लिक करने के लिए राजभवन मार्च और बिहार बंद की बात कर रहे हैं, नीतीश भी उनका पूरा साथ दे रहे हैं.

देखना ये है कि बीजेपी ने जे मंडल खेल शुरू किया है, उसमें सफल कौन होता है.

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