'जब एक बुकी ने मुझे 50 लाख का ऑफ़र दिया'

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भारत में मैच फ़िक्सिंग को लेकर पहली बार तब अफवाहें फैलीं, जब 1960 के दशक में पाकिस्तान की टीम भारत के दौरे पर आई थी.

यह कितना सच है इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. उसके बाद 1990 के दशक में कुछ खिलाड़ियों के मैच फ़िक्सिंग में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थीं.

तब शेन वार्न ने पाकिस्तानी खिलाड़ी सलीम मलिक पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उन्हें ऑस्ट्रेलियाई टीम के पाकिस्तान दौरे के दौरान पैसा ऑफर किया था.

इसी तरह न्यूजीलैंड के एक खिलाड़ी ने कहा था कि किसी भारतीय खिलाड़ी ने उन्हें पैसा ऑफ़र किया था.

1997 में मैं जब वेस्टइंडीज गया था तो एक बुकी मुझे मिला और उस अनुभव पर मैंने किताब और एक अख़बार में लेख भी लिखा.

मुझे भारत के किसी खिलाड़ी से संपर्क करवाने के एवज़ में 50 लाख की पेशकश भी की गई थी.

उसके बाद तत्कालीन क्रिकेटर मनोज प्रभाकर ने आउटलुक मैगज़ीन में एक लेख लिखा.

अपने लेख में उन्होंने ज़िक्र किया कि उन्हें किसी भारतीय खिलाड़ी ने मैच फ़िक्सिंग के लिए 25 लाख रुपए ऑफर किए थे.

रवैया

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उस समय बीसीसीआई ने इन बातों को गंभीरता से लिया नहीं और इन्हें बकवास क़रार दिया था.

ये रवैया आज भी जारी है, कोई अगर इस पर लिख दे तो वे जांच करवाने के बजाए कहते हैं कि जो लिख रहा है वही ग़लत लिख रहा है.

वो तो दिल्ली पुलिस को अनायास ही अंडरवर्ल्ड के फ़ोन ट्रैक करने के दौरान हैंसी क्रोनिए से किसी की बातचीत का पता चला.

जब यह भांडा फूटा तो इसका दायरा इतना बड़ा निकला कि क्रिकेट की दुनिया ही हिल गई. भारत के खिलाड़ियों अज़हरुद्दीन और मनोज प्रभाकर पर बैन लगा.

इसके बाद आईसीसी की एंटी करप्शन यूनिट बनी, लेकिन इसके बावजूद फ़िक्सिंग रुकी नहीं.

(प्रदीप मैगजीन से बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी की बातचीत पर आधारित)

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