भारत में बन पाएंगे पौने दस करोड़ टॉयलेट?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते अक्तूबर में स्वच्छ भारत अभियान के तहत आह्वान किया था कि 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त किया जाए.

लेकिन अभी जो ज़मीनी हालात हैं, उनमें लक्ष्य हासिल करने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करने की ज़रूरत दिखाई पड़ती है.

साल 2012 तक भारत के 11 करोड़ से ज़्यादा ग्रामीण घरों में टॉयलेट की सुविधा नहीं थी. सरकार अभी तक केवल 1.1 करोड़ घरों में ही टॉयलेट बनाने में मदद कर पाई है.

इसका मतलब है कि अगर मोदी सरकार अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहती है तो अगले चार सालों में उसे 9.9 करोड़ घरों में टॉयलेट बनवाने पड़ेंगे.

यानी इसके लिए सरकार को बहुत विशाल फंड आवंटित करना पड़ेगा.

पिछले 15 सालों में विभिन्न स्वच्छता अभियानों में सरकार ने जो 25 हज़ार 885 करोड़ रुपए आवंटित किए थे उसमें से 88 फ़ीसदी राशि खर्च की जा चुकी है.

यूनिसेफ़ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साल 2014 में 59.5 करोड़ से ज़्यादा लोग खुले में शौच करते थे.

हालांकि सरकार एक ऐसा क़ानून बनाने पर विचार कर रही है जिसके तहत स्थानीय सरकारों को ये अधिकार मिल जाएगा कि वो सार्वजनिक जगहों पर थूकने, पेशाब करने और कूड़ा फैलाने वालों को सज़ा दे सकें.

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इस तरह केंद्र सरकार स्वच्छ भारत अभियान को क़ानूनी हथियार देने की उम्मीद कर रही है.

साथ ही सरकार सभी ग्रामीण घरों को टॉयलेट युक्त बनाने की उम्मीद पाले है और सभी ग्राम पंचायतों में सॉलिड-लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट की शुरुआत करना चाहती है.

( इंडियास्पेंड के रिसर्च पर आधारित.)

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