मालेगाँव मामले में सच्चाई सामने आए: रोहिणी

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर

राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए पिछले चार सालों से ऐसे सात बम धमाकों की जांच कर रही है जिन्हें मीडिया में 'सैफ्रन टेरर' यानी 'हिंदू टेरेरिज़्म' का नाम दिया गया है.

ये बम धमाके 2006 से 2008 के बीच हुए थे. इनमें से एक विस्फोट 2008 में महाराष्ट्र के मालेगाँव शहर में हुआ था. इस केस की सरकारी वकील मुंबई की रोहिणी सालियां थीं.

उन्होंने दबाव का आरोप लगाते हुए इस केस से इस्तीफ़ा दे दिया है.

उन्होंने एक इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि एनआईए ने उनसे मुक़दमे की गति धीमी करने को कहा था. हालाँकि एनआईए ने इन आरोपों से इनकार किया है.

बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद ने मुंबई फ़ोन करके उनसे बात की.

बातचीत के अंश-

एनआईए का आरोप है कि आपने मुक़दमे को बढ़ाने में मदद नहीं की.

जांच मैं नहीं करती हूँ, पुलिस वाले करते हैं. 2009 में मुंबई एटीएस ने 12 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाख़िल किया था. इसमें दो लोगों को छोड़कर सभी की जांच हो चुकी थी. वे लोग फ़रार थे, पर उनकी जांच जारी थी. 2011 में यह मामला एनआईए ने अपने हाथ में ले लिया था. लेकिन अभी तक अदालत में उनकी तरफ से कोई साक्ष्य नहीं आया है.

क्या आपको ये निराशाजनक लगता है?

निराशा की बात नहीं है. कोर्ट के सामने साक्ष्य तो आने ही चाहिए. यानी जो सच्चाई है वो आनी चाहिए और ये काम पुलिस का है, मेरा नहीं.

Image caption मालेगाँव धमाके के गवाह रहे अबरार अपने पिता और मां के साथ.

आप कह रही हैं कि एटीएस ने काफ़ी काम कर लिया था, क्या उस आधार पर यह तफ़्तीश आगे नहीं बढ़ाई जा सकती थी?

तफ़्तीश बिल्कुल बढ़ाई जा सकती थी. मेरे पास तो 2008 में मालेगाँव विस्फ़ोट का केवल एक केस है. इसमें तो अभियुक्त गिरफ़्तार हो चुके थे, बस आरोप पत्र दायर होना बाकी था. इसमें जमानत याचिकाएं हाईकोर्ट में ख़ारिज हो गई थीं और अभियुक्त सुप्रीम कोर्ट तक गए हैं.

आपको क्या लगता है कि एनआईए के अधिकारी मामले में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं या उन पर कोई दबाव है?

उनका क्या एजेंडा है, यह मुझे नहीं मालूम. लेकिन मैं यह कह सकती हूं कि इस बारे में मुझे क्या कहा गया था.

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

एनआईए को जो सात मामले सौंपे गए थे, वो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. ये मामले कहां तक पहुंचे हैं और क्या कोई नतीजा निकल पाएगा?

देखिए, इन सारे मामलों की मुझे पूरी जानकारी नहीं है. लोग कहते हैं कि यह सैफ्रन टेरर से जुड़े मामले हैं. लेकिन किसी विशेष समुदाय के सारे लोग तो ख़राब नहीं होते. मेरा कहना है कि जो भी हो, सच्चाई सामने आनी चाहिए. जिनके ख़िलाफ़ अन्याय हुआ है उन्हें तो न्याय मिलना ही चाहिए.

अगर इन मामलों में जांच आगे नहीं बढ़ती है तो जो लोग मारे गए हैं उन्हें इंसाफ़ तो नहीं मिल पाएगा?

ऐसी बात नहीं है. और लोग हैं ना. अब विशेष सरकारी वकील लेकर आएंगे और उनकी मदद से ये मुक़दमा चलाएंगे. अब ये देखना होगा कि क्या होता है.

जब आपको केस की पैरवी धीमी करने के लिए कहा जा सकता है तो इसका मतलब वहां दबाव है. आपने आवाज़ क्यों नहीं उठाई?

अब तो यह साफ़ हो गया है कि उनका एजेंडा अलग है. उन्हें मेरी सेवाएं नहीं चाहिए. पूरी सुनवाई में उनके मुताबिक़ कोई भी फ़ैसला नहीं आया. मेरी सेवा उनके लिए सुविधाजनक नहीं है. इस केस की ज़िम्मेदारी मेरे पास है, इसलिए जनता को इस बारे में पता होना चाहिए. उन्होंने बड़े विश्वास से मुझे यह केस सौंपा था. अगर कोई इसमें हस्तक्षेप करता है तो मुझे ठीक नहीं लगेगा. एक सरकारी वकील होने के नाते निष्पक्ष पैरवी की हमारी ज़िम्मेदारी बनती है. इसीलिए यह बात बताकर मैं केस से बाहर आई.

इमेज कॉपीरइट PTI

जांच एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव के आरोप लगते रहे हैं, ऐसे में इंसाफ़ के लिए रास्ता क्या है?

जनता को लोकतंत्र का झंडा उठाना ही पड़ेगा. ज़िम्मेदार नागरिकों को यह बात जाननी चाहिए और न्याय की मदद करनी चाहिए. जो लोग कुछ कर सकते हैं वो हैं गवाह. लेकिन वे अपने बयानों से पलट जाते हैं. इसकी भी जांच होनी चाहिए कि कहीं डर, दबाव या पैसे लेकर तो वो ऐसा नहीं कर रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार