फ़िक्सिंग पर जिनकी स्टोरी ने तहलका मचाया

  • 18 जुलाई 2015
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क्रिकेट में मैच फिक्सिंग को उजागर करने वाले व्हिसिल ब्लोअर्स में से एक हैं पत्रकार अनिरुद्ध बहल.

उन्होंने 1990 के दशक के आखिर में मैच फिक्सिंग पर स्टोरी की तो तहलका मच गया.

शुरुआत में उनकी खबर को खारिज किया गया, लेकिन, बाद में क्रिकेट में फिक्सिंग की परत दर परत खुलती गईं.

आईपीएल की दो टीमों पर प्रतिबंध के फैसले के बाद एक बार मैच और स्पॉट फिक्सिंग सुर्खियों में है.

वरिष्ठ पत्रकार अनिरुद्ध बहल का कहना है कि ऐसे मामले जब शुरू में प्रकाश में आए तो बीसीसीआई छुपाने में लगा हुआ था.

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साल 1997 में मैंने और कृष्ण प्रसाद ने वो स्टोरी ब्रेक की थी. मई या जून की बात थी. सब लोग तब ये बोलते थे कि ये मनगढ़ंत स्टोरी है. मैच फिक्सिंग पर पतंगबाज़ी कर रहे हैं.

लेकिन उसके बाद जो घटनाक्रम शुरु हुए, तो बीसीसीआई ने जांच की. मनोज प्रभाकर सामने आए. हैंसी क्रोनिए वाली घटना हुई. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के इंसीडेंट हुए. ऑस्ट्रेलिया के इंसीडेंट हुए. जो बाद में जो घटनाएँ सामने आईं, उनसे ये साबित हो गया कि ये तो आम है और न केवल उस समय हो रहा था बल्कि उसके बाद भी होता रहा.

प्रभाकर का रोल

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उस समय प्रभाकर का तो बहुत योगदान था. मैं तो कहूंगा कि बहुत ही बहादुर आदमी थे.

सामने आए उन्होंने नाम लिए और घटनाएं बताईं जो सिंगर कप श्रीलंका में हुई थी. वो एक तरह से मजबूत इरादे वाले इंसान थे.

भारतीय क्रिकेट के लिए बहुत अच्छा था कि वो सामने आए.

लेकिन इस देश में व्हिसिल ब्लोअर की कोई कद्र नहीं होती है. उस समय तो बीसीसीआई लगा हुआ था मामले को छुपाने में. वो अलग माहौल था.

नतीजे नहीं मिले?

तीन-चार भारतीय खिलाड़ी भी बैन हुए थे. कार्रवाई भी बीसीसीआई ने खुद ही की थी. उस सिलसिले में देखिए एक चीज रामबाण नहीं होती है.

अब भी अगर हितों के टकराव को खेल से न हटाया गया, अगर आपकी निगरानी ठीक न हुई और अगर आपको सबक नहीं सिखाया गया.

जैसे ये दो टीम बैन हुई हैं इनके ऊपर एक सबक सा आया है कि अगर आप ऐसा करेंगे तो न केवल खिलाड़ियों का नुकसान होगा बल्कि जिन लोगों ने उनको शह दी जिनके छाते में वो हैं उनको भी नुकसान पहुंचेगा.

बडे प्लेयरों का बचाव?

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वो तो शुरू से ही रहता है. हर एक खेल में शुरू में यही प्रतिक्रिया रहती है बोर्ड की कि किसी तरह हम अपने टैलेंट को बचा लें जो बहुत गलत रिएक्शन होता है.

वो रिएक्शन यहां बहुत ज्यादा था. नब्बे के दशक के आखिर में तो बहुत ज्यादा था.

बंद होगी फिक्सिंग?

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क्रिकेट एक खेल है. आपको निगरानी रखनी पड़ेगी. आपको नियम बनाने पड़ेंगे. आपको हितों का टकराव हटाना पड़ेगा.

आपको हर समय सतर्क रहना पड़ेगा कि कोई खिलाड़ी या टीम फिर से ऐसा न कर रहा हो.

उसके लिए पूरा मापदंड होना चाहिए कि अगर किसी ने कोई घटना रिपोर्ट नहीं की तो उसके लिए पेनल्टी के बारे में सही जानकारी होनी चाहिए.

पूरे सिस्टम की जवाबदेही होनी चाहिए. ऐसे करेंगे तो उम्मीद रहेगी कि आगे की पीढ़ी इसमें नहीं घुसेगी.

(वरिष्ठ पत्रकार अनिरुद्ध बहल से बीबीसी संवाददाता प्रभात पांडे की बातचीत के आधार पर)

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