मानसूत्र सत्र में मोदी झेलेंगे इन मुद्दों की बौछार

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संसद के मानसून सत्र की शुरूआत से पहले विवाद के बादल मंडराने लगे हैं.

भूमि अधिग्रहण बिल के मुद्दे पर कांग्रेस प्रशासित 13 राज्यों के मुख्यमंत्री ने नीति आयोग की बैठक के बहिष्कार का फैसला किया.

साथ ही ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और जयललिता जैसे कई क्षेत्रीय नेताओं ने भी कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया है.

वहीं केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि उनकी पार्टी बिल के मामले में जल्दी नहीं दिखाएगी.

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लेकिन सरकार की मुश्किलें यहीं ख़त्म नहीं होने वाली हैं क्योंकि लोगों का ध्यान अब इस बिल से ज़्यादा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और मुख्यमंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर है.

दोनों पक्ष कर रहे हमला

विपक्षी पाटियों की तरफ से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोर्चा संभाल रखा है. उनका कहना है कि वो प्रधानमंत्री की ''56 इंच की छाती को 5.6 का करके रहेंगे.''

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वहीं उन्हीं के लहज़े में भाजपा ने भी उनको ''अपने डायपर से बाहर निकलने'' की हिदायत दी है.

कांग्रेस के उत्साह को देखकर लगता है कि उसने उन नेताओं को भी मना लिया है जो 'ललितगेट' और व्यापमं घोटाले पर कांग्रेस का साथ देने के लिए ज़्यादा उत्सुक नहीं थे.

हालांकि 14 जुलाई को सोनिया गांधी की इफ़्तार पार्टी में राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव, सपा के मुलायम सिंह यादव और वामपंथी पार्टियों ने शिरकत नहीं की थी.

भाजपा के लिए बढ़ेंगी मुश्किलें

व्यापमं में एक टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की संदिग्ध मौत के बाद इस घोटाले में एक नया मोड़ आ गया है. कांग्रेस इसे पूरे ज़ोर-शोर से उठाने की तैयारी में है.

ऐसे में भले ही कई अन्य दलों के प्रमुख व्यापमं में हो रहे घोटाले में पहले दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे, लेकिन अब उनके लिए भी इस मुद्दे से दूर रहना आसान नहीं होगा.

साथ ही पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में भाजपा के सदस्य गजेंद्र चौहान को अध्यक्ष बनाने के मामले में छात्रों के विरोध का भी सरकार को जवाब देना होगा.

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) की स्वायत्तता पर लगाम लगाने के लिए लाए गए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बिल, 2015 का भी भारी विरोध हो रहा है.

बिहार में भी मुश्किलें

एक और अहम मुद्दा है जिसे सभी विपक्षी पार्टियां भुनाना चाहेंगी. बिहार में लालू प्रसाद यादव और नितीश कुमार की सरकार ने भाजपा के ख़िलाफ मोर्चा खोल रखा है.

उनका कहना है कि सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना, 2011 के अंतर्गत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और ऊंची जातियों के जो आंकड़ें जुटाए गए थे उन्हें सरकार राजनीतिक फायदों के लिए जारी नहीं कर रही है.

शरद यादव का कहना है कि सरकार इन आंकड़ों को जारी कर ''मंडल द्वितीय को दोहराना नहीं चाहती.''

ख़बरों के अनुसार माना जा रहा है कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी के कम लोगों का होना और उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति कमज़ोर होना भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकता है.

सरकार का मानना है कि इन आंकड़ों के जारी होने के बाद इस वर्ग की तरफ से आरक्षण की मांग आ सकती है.

ज़ाहिर है, ऐसे में भाजपा के लिए इस मानसून सत्र में, बिहार चुनाव से पहले खुद को 'ऊंची जातियों के हिमायती' के तौर पर दिखने से बचाना मुश्किल होगा.

पार्टी साध रही है चुप्पी

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ऐसे में यह सवाल उठता है कि आख़िरकार सरकार ने राजनीति की दृष्टि से इस स्थिति को किस तरह से संभाला है. प्रधानमंत्री ने तो अभी तक इस पर कोई भी टिप्पणी नहीं दी है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली भी कभी-कभार ही इन मुद्दों पर बोलते हुए दिखते हैं. वहीं गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था, ''एनडीए में कोई भी मंत्री यूपीए के मंत्रियो की तरह इस्तीफा नहीं देगा.''

उनके इस बयान से पार्टी को फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान पहुंचा है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इन मामलों पर चुप रहने की रणनीति अपना रखी है.

वहीं जूनियर प्रवक्ता पार्टी की तरफ से सफाई दे रहे हैं.

छह महीने पहले जैसे स्थिति नहीं

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पार्टी की चुप रहने की रणनीति तब अच्छी काम करती है जब संसद का सत्र नहीं चल रहा होता है और पार्टी अपनी चुनावी जीत का आनंद उठा रही होती है.

लेकिन भाजपा के लिए स्थिति अब छह महीने पहले जैसी नहीं रही. वहीं मीडिया के साथ भाजपा का हनीमून पीरियड भी ख़त्म हो रहा है.

साथ ही चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने जो वादे किए थे उनका भार पार्टी पर बढ़ता जा रहा है. लोग पार्टी से अब उन वादों को पूरा करने की उम्मीद कर रहे हैं.

अब यह ज़िम्मेदारी सरकार और उनके फ्लोर मैनेजरों की है कि मानसून सत्र किस तरह से चलता है. कम से कम सुषमा स्वराज और अरुण जेटली विपक्ष में होते हुए यही कहते थे.

(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित)

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