17 साल बाद भी मां ने बेटे को पहचान लिया

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पहचान का 'अनोखा पासवर्ड' होता है. इसे केवल एक मां और उसकी संतान ही समझ सकती है.

एक महिला ने फ़ोन पर एक युवक से कहा कि जब वो बहुत छोटा था तो उसकी बहुत पिटाई हुई थी, "क्या तुम इसका कारण बता सकते हो?"

सवाल सुनकर युवक ने महिला से कहा, ''सड़क के किनारे कुछ लोगों को मैं ताश खेलते हुए देख रहा था. वो जुआ खेल रहे थे और तुमने पास ही पड़ी एक गंदी रस्सी से मेरी पिटाई की थी.''

इतना सुनते ही उस महिला की आंखों से आंसू बहने लगे और उन्होंने कहा, ''हां...हां तुम मेरे ही बेटे हो.''

इतना कहकर वह महिला रोने लगी और 17 साल पहले गुम हुए बेटे से जल्द से जल्द घर लौट आने की गुहार लगाने लगी.

यह कहानी है कर्नाटक के टुमकुरु में रहने वाले ज़ाहिद पाशा की. वो अपने मां-बाप और भाई-बहनों से मिलने के लिए हरियाणा के मेवात ज़िले में स्थित अपने घर 24 जुलाई को पहुंच रहे हैं

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Image caption ज़ाहिद पाशा अपने चाचा फ़ारुख़ के साथ.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के एक मदरसे में पढ़ रहे ज़ाहिद को उनके एक दोस्त ने बहका दिया था. वो उसके साथ भाग गए. लेकिन उनका दोस्त उन्हें बंगलुरु से 70 किलोमीटर दूर टुमकुरु रेलवे स्टेशन पर छोड़कर भाग गया.

इसके बाद वो टुमकुरु में ही भटकने लगे. न रहने का ठिकाना और न खाने पीने की व्यवस्था. जब फ़ारूख़ पाशा की नज़र उन पर पड़ी तो वो ज़ाहिद को अपने घर लेकर आए. उन्हें पाला-पोसा और क़ाबिल बनाया.

फ़ारूख़ पाशा ने एक अच्छी लड़की देखकर उनकी शादी भी कर दी. आज ज़ाहिद दो बच्चों के पिता हैं. वो फ़ारुख़ और उनकी पत्नी को चाचा-चाची कहते हैं.

ज़ाहिद अब अपने असली मां-बाप और रिश्तेदारों से मिलने हरियाणा में स्थित अपने गांव जाने वाले हैं.

जब उनसे पूछा कि क्या वो अपने मां बाप के पास जाकर वहीं रह तो नहीं जाएंगे?

इस पर ज़ाहिद ने बीबीसी से कहा, ''मेरे मां-बाप ने मुझे जन्म दिया. लेकिन उन्होंने (चाचा और चाची ने) मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया. उन्होंने मुझे एक ईमानदार ज़िंदगी जीने लायक बनाया. मैं मां-बाप से मिलने जाऊंगा. लेकिन वापस आकर यहीं रहूंगा.''

ज़ाहिद अपनी उम्र 27 साल बताते हैं.

फ़ारूख़ सिम कार्ड बेचते हैं. उन्हें ठीक-ठीक याद नहीं है कि जब उन्हें यह बच्चा मस्जिद के पास मिला तो वह साल 1997 था या 1998.

वो कहते हैं, ''मैं उस बच्चे को कुछ दिनों से देख रहा था. मैंने एक दिन उससे पूछा कि वह क्यों दुकानों के सामने सोता है और मस्जिद के आस-पास चक्कर लगाता है.''

वो कहते हैं, ''बच्चे ने उन्हें बताया कि उसका एक दोस्त उसे यहां ले आया और रेलवे स्टेशन पर अकेला छोड़ दिया. उसके पास जो 70-80 रुपए बचे थे उसी से रेलवे स्टेशन पर जीने की कोशिश कर रहा था. मैं उसे घर ले आया.''

ज़ाहिद ने बताया, ''उन्होंने मुझे पढ़ाई करने को कहा, लेकिन मैंने नहीं की. उन दिनों चाचा केबल नेटवर्क चलाते थे. मैं उनकी मदद करने लगा. उन्होंने मुझे सब-कुछ सिखाया. आज भी मैं वही काम करता हूं. मैं केबल नेटवर्क की लेनदेन देखता हूं.''

बेटे से बढ़कर सम्मान

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Image caption ज़ाहिद पाशा अपनी पत्नी अखिला बानो और अपने दोनों बच्चों के साथ.

वो बताते हैं, ''चाचा-चाची ने अपने बेटे से बढ़कर मुझे माना. हालांकि उनके दो बेटे थे. लेकिन जब भी मैं देर से आता, चाची मेरा इंतज़ार करती मिलतीं. वो मेरे खाने के बाद ही खाना खाती थीं. मैं अपनी चाची को बहुत मानता हूँ.''

फ़ारूख़ ने ज़ाहिद की शादी एक स्थानीय लड़की अकीला बानो से कराई.

ज़ाहिद कहते हैं, ''लड़की के कुछ रिश्तेदार हिचक रहे थे. लेकिन मेरे ससुर चिंचित नहीं थे क्योंकि चाचा ने कह दिया था कि वह मुझ पर भरोसा करते हैं.''

अकीला बताती हैं, ''निजी तौर पर तो मुझे डर नहीं था, लेकिन मेेरे मां बाप को कुछ शंका थी. जल्द ही वह भी जाती रही.''

इतने प्यार-मोहब्बत के बावजूद ज़ाहिद का अपने परिजनों से मिलने की चाहत बरक़रार रही.

ज़ाहिद ने बताया, ''मैं लगातार उन्हें खोजने की कोशिश करता रहा. मैं केवल अपने मां-बाप का नाम जानता था और मेवात ज़िले में अपने गांव के नाम की धुंधली सी याद थी, शायद उसका नाम सुनहेड़ा या सुनेढा था.''

ज़ाहिद ने सेल्फ़ी विद डॉटर अभियान की वजह से मशहूर हो चुके हरियाणा के जिंद ज़िले के बीबीपुर गांव के सरपंच सुनील जगलान से संपर्क साधा.

जगलान की मदद

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सुनील ने कई गांवों के सरपंचों और स्थानीय पुलिस से संपर्क किया.

ज़ाहिद के मां बाप ने गुमशुदगी की एक रिपोर्ट पुलिस थाने में लिखाई थी. पूरा गांव उस गुम हुए बच्चे के बारे में जानता था.

ख़बर मिलने पर पुलिस ने ज़ाहिद से बात की. इसके बाद ज़ाहिद के चाचा आबिद और दूसरे रिश्तेदारों ने उनसे बात की. आबिद का नाम ज़ाहिद को अब तक याद था.

इसके बाद उनकी मां फ़ोन पर आईं और पहचान के लिए वह 'अनोखा पासवर्ड' पूछा.

ज़ाहिद ने बताया, ''मैं अपने मां बाप को यहां लाऊंगा. चाचा-चाची भी उन्हें यहां बुलाना चाहते हैं. वह पहले ही उनके स्वागत की तैयारी में जुटे हैं.''

तो क्या, उन्हें किसी किस्म की दुविधा नहीं है?

ज़ाहिद कहते हैं, ''मैं इनमें से किसी को भी नहीं भूल सकता. मैं दोनों को अपने पास रखना चाहता हूँ. मैं यहां बस चुका हूँ, अब मैं कहीं और नहीं रह सकता.''

फ़ारूख़ पूरे भरोसे से कहते हैं, ''वह कहीं नहीं जाएगा. वह वापस आएगा.''

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