जानिए क्या होता है भारत-पाक बातचीत में

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भारत और पाकिस्तान एक बार फिर से कूटनीतिक संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इस बात को लेकर बहुत संदेह भी है कि क्या इस बार चीजें पहले के मुक़ाबले अलग मोड़ ले पाएंगी.

ख़ासकर ऐसे समय में जब संबंध सामान्य करने को लेकर दोनों देशों के लोगों में कोई उफ़ान न दिख रहा हो.

ना ही इस बात का कोई संकेत हैं कि दोनों तरफ़ के नेता, सेना या नौकरशाह मेल मिलाप और समझौते को तैयार हों.

(भारत-पाक वार्ता में ट्रैक टू का हश्र)

इस बात की संभावना ज़्यादा है कि कूटनीति भटकती रहेगी.

तनाव कम करने को लेकर सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी ये है कि देशों के बीच सभी विवाद बातचीत और कूटनीति से सुलझाए जाते हैं.

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सच ये है कि कूटनीति केवल ऊपरी चाशनी है. असल फ़ैसला लड़ाई के मैदान में होता है, चाहे प्रत्यक्ष युद्ध हो या शीत युद्ध हो.

उदाहरण के लिए, अमरीकी और वियतनामी सालों और बतिया सकते थे. पर वियतनाम की जंग का अंत बातचीत से नहीं हुआ. ये हुआ था युद्ध के मैदान में उत्तरी वियतनामी सेना की विजय से.

इसी तरह, सोवियत संघ और अमरीका भी लगातार कूटनीतिक चर्चाएं और हथियार नियंत्रण पर संधियां करते रहे.

अंत में उनका टकराव तभी समाप्त हुआ जब एक पक्ष इसलिए धराशायी हो गया क्योंकि वो इस टकराव का ख़र्च नहीं झेल पाया.

इसकी बहुत कम संभावना है कि भारत और पाकिस्तान भी कूटनीति से किसी चीज का हल निकाल पाएंगे.

चाहे ये दोनों देशों के बीच सरकारी स्तर पर बातचीत का मामला हो (ट्रैक वन) या दोनों तरफ़ के लोगों के बीच का मामला हो जिसे ट्रैक टू कहते हैं.

युद्ध विकल्प नहीं

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जब तक दोनों पक्षों में से कोई एक अपनी रुख़ से पीछे नहीं हटता तब तक आपसी संबंध सुधरने की किसी स्थाई प्रक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती.

परमाणु हथियारों के कारण दोनों देशों के बीच सीधा युद्ध विकल्प नहीं है.

सो हर देश अपना काम इस बात से निकालेगा कि वो देश कैसे अपनी बात पर अधिक समय तक अड़ा रहे.

कूटनीति औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत के दरवाजों को खुला रख सकती है.

इससे अधिक से अधिक दो देशों के आपसी संबंधों में रोज़मर्रा की दिक़्क़तों का हल निकल सकता है. जैसे कि कैसे बाढ़ के पानी की सूचना एक दूसरे को दी जा सके.

ट्रैक वन की बात करें तो राजनयिकों को न तो कोई अधिकार होता है और ना ही अपने नेताओं से मिले निर्देशों से परे जाने की उनके पास कोई सोच या अधिकार होता है.

बातचीत की संरचना इस तरह की होती है कि यह किसी नए रास्ते की ओर जाने की कोई संभावना ही नहीं छोड़ती है.

बैठकें और बातचीत

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अधिकांश बैठकें, ख़ासकर दोनों देशों के बीच अधिक विवादित मुद्दों पर आयोजित, एक फ़ारसी कहावत बनकर रह जाती है- ‘नशिस्तन, गुफ़्तन, बरखास्तन,’ यानी वो मिले, बातचीत की और अपनी-अपनी राह हो लिए.

यहां तक कि दूसरे से बात करने के बजाय लोग एक दूसरे के सामने अपनी बातें बोलते भर हैं. कोई दूसरे की सुनता नहीं.

साल 1997 के बाद से संयुक्त बातचीत के हर दौर के बाद जारी होने वाले बयानों को देखें और आप बता नहीं पाएंगे कि कौन सा बयान किस साल दिया गया. सारे बयान कमोबेश एक जैसे ही थे उनमें कोई नई बात नहीं है.

हाँ कूटनीतिक रस्म अदायगी पूरी होती है कम से कम पाकिस्तान की ओर से. वे भारतीय प्रतिनिधिमंडल को ख़ास होने का अहसास दिलाने के लिए कुछ ज़्यादा क़दम उठाते हैं.

रस्म अदायगी

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जैसे ननकाना साहिब की तीर्थ यात्रा करा देंगे या तक्षशिला दिखा देंगे या किसी के पैतृक गांव के दौरा करा देगें.

बदले में ऐसे ही भारत आगरा और अजमेर के दौरे की व्यवस्था करा देता है.

लेकिन जब प्रतिनिधिमंडल बातचीत की मेज पर आते हैं तो ये प्रेम ख़त्म हो जाता है.

दोनों को पता होता है कि दूसरा क्या कहेगा.

अंत में एक नीरस बयान जारी किया जाता है, जिसमें दोनों तरफ़ से ये वादा किया जाता है कि वे आगे की बातचीत जारी रखेंगे.

(अगली कड़ी में जानिए क्या होता है भारत पाक के बीच ट्रैक टू की बातचीत में)

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