मोडासा धमाका: सबूतों का अभाव या राजनीतिक दबाव?

  • 25 जुलाई 2015
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भारत में 2006 से 2008 के दौरान बम धमाकों की छह घटनाओं में 120 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और क़रीब 400 लोग घायल हुए थे.

शुरूआती जांच में इनमें राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर जुड़े लोगों के नाम सामने आए थे.

इन्हें 'भगवा आतंक' या 'हिंदू चरमपंथ' के नाम से भी बुलाया गया.

लेकिन इनमें से किसी भी मामले में अबतक किसी को दोषी क़रार नहीं दिया जा सका है.

पहली क़िस्त पढ़ेंः एनआईए 'हिंदू चरमपंथ' के मामलों में नाकाम?

ये मामले एनआईए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी के पास है जो इनकी जांच कर रही है.

बीबीसी की इस विशेष सीरीज़ की पांचवीं और अंतिम क़िस्त में पढ़ें 29 सितम्बर 2008 को मोडासा धमाके के बारे में.

गुजरात के मोडासा में धमाका

रमज़ान के महीने में हुए मालेगांव धमाके के ठीक एक दिन बाद ही 29 सितम्बर 2008 को मोडासा धमाका हुआ था.

इस हमले में एक 15 साल के लड़के की मौत हो गई और 10 अन्य घायल हो गए थे.

गुजरात के एक क़स्बे सुका बाज़ार में खड़ी एक बाइक में विस्फ़ोट हो गया, बाइक में आईडी रखी गई थी.

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इस मामले में गुजरात पुलिस ने 500 लोगों से पूछताछ की.

और कथित तौर पर इनमें क़रीब 200 लोगों का संबंध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों से था.

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हालाँकि, इस मामले में कोई और प्रगति नहीं हुई.

इस मामले में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार विपक्ष के दबाव में थी. उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार थी.

इस मामले को केंद्र ने 2010 में एनआईए के हवाले कर दिया.

एनआईए ने क्या किया?

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इस महीने की शुरुआत में एनआईए ने 2008 के मोडासा धमाके मामले की फ़ाइल बंद कर दी.

कई लोग इसे इस बात का ठोस संकेत मानते हैं कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद ‘हिंदू चरमपंथ’ से जुड़े मामलों में जांच की दिशा बदलने लगी है.

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एजेंसी ने मामले को बंद करने का कारण, पर्याप्त सबूत का न होना बताया.

मोडासा और मालेगांव में हुए धमाकों में इस्तेमाल किए गए बम एक जैसे थे और मोटरसाइकिल में लगाए गए थे.

इस मामले में एनआईए दो मुख्य अभियुक्तों संदीप डांगे और रामजी कालसंग्रा का पता तक नहीं लगा सकी. इनपर धमाके की साज़िश रचने का संदेह था.

सबूत से छेड़छाड़

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अपनी अंतिम रिपोर्ट में एनआईए ने यह भी कहा कि 2008 में हुई इस घटना की जाँच उन्हें 2010 में सौंपी गई, जिसकी वजह से अहम सबूत नष्ट हो चुके थे.

एनआईए ने धमाके में इस्तेमाल मोटरसाइकिल का इंजन और चेसिस नंबर हासिल करने की कोशिश की. बाद में एजेंसी ने कहा कि धमाके की वजह से तीन आख़िरी अंक मिट गए हैं और अब पढ़े नहीं जा सकते थे.

गुजरात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात से इनकार नहीं किया कि साज़िश करने वालों ने संभवतः नंबर के साथ छेड़छाड़ की हो ताकि पहचान छुपाई जा सके.

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