भारतीय प्रवासियों में बढ़ती साहित्यिक चोरी

  • 26 जुलाई 2015
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पश्चिमी देशों में मशहूर कहावत है कि देह व्यापार सबसे पुराना पेशा है. लेकिन आज की कहावतों की मानें तो मिलावट और प्लेजियरिज़्म, जिसे साहित्यिक चोरी या आइडिया की चोरी भी कह सकते हैं, उससे भी पुराने पेशे हैं.

मिलावट और साहित्यिक चोरी उस रचना से छेड़ छाड़कर उसकी मौलिकता को ख़त्म कर देते हैं या उसे घिसापिटा बना देते हैं.

मिलावट में भ्रष्ट संस्करण के ही मूल होने का दिखावा किया जाता है, जबकि साहित्यिक चोरी खुद को मौलिक होने का दिखावा करती है.

साहित्यिक चोरी बड़े स्तर पर भी हो सकती है और व्यक्तिगत भी. परीक्षाओं में सामूहिक रूप से नकल बड़े पैमाने पर होने वाली चोरी का एक उदाहरण है.

जबकि शोध कार्य के किसी मौलिक हिस्से का नकल करना कहीं ज़्यादा व्यक्तिगत बात है. लेकिन भारत में शोध कार्यों की नकल करना आम बात है.

असल में एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर यह बौद्धिक मौलिकता को ख़त्म कर देता है.

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विज्ञान और मानविकी (ह्यूमैनिटीज़) जैसे क्षेत्रों में ज्ञान किसी उपहार जैसा होता है. एक वैज्ञानिक या लेखक बेहद मौलिक चीज़ पैदा करता है.

उसका काम बिकाऊ माल नहीं है. इसके बदले जो कुछ उसे मिलता है वो उसके लेखन के प्रति आभार और तवज्जो है.

असल में, फ़ुटनोट और उद्धरण इस तरह की व्यवस्था की शुद्धता बचाते हैं.

फ़ुटनोट देना, विचारों के प्रति आभार जताना है दरअसल शोध की सामूहिक प्रवृत्ति को मान्यता देता है.

किसी दूसरे के काम का हवाला देना केवल आभार प्रकट करना नहीं है बल्कि इसमें बिरादरी का भाव भी है.

हर लेखक जानता है कि दूसरा लेखक भी उसे मान्यता देगा और मान्यता देने की यह संस्कृति ही विज्ञान की सामाजिक दुनिया बनाती है.

ऐसी कृति, जिसका नाम मूल खोजकर्ता या बनाने वाले के नाम पर रखा गया हो, जैसा कि रमन इफ़ेक्ट या मैक्सवेल डेमन के मामले में है, मौलिकता, खोज और सज्जनता की संस्कृति को बढ़ाती है.

मल्होत्रा विवाद

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हाल ही में राजीव मल्होत्रा को लेकर हुआ विवाद दिखाता है कि इस तरह की साहित्यिक चोरी शोध के लिए ख़तरा है.

विद्वान रिचर्ड फ़ॉक्स यंग ने बड़े दिलचस्प तरीक़े से इशारा किया कि मल्होत्रा ने एंड्र्यू जे निकोल्सन की कृति से नकल की थी. भारत से जुड़े पहलुओं का अध्ययन करने वाले कई पश्चिमी विचारकों के लिए यह हंसी का कारण बन गया.

मल्होत्रा का जवाब तो और दुखद था. पहले तो उन्होंने कहा कि संस्कृत में उद्धरण या कोटेशन मार्क्स का कोई चलन नहीं है और यह पश्चिमी परम्परा है.

इसके बाद उन्होंने कहा कि निकोल्सन का हवाला दिया गय था, लेकिन कोटेशन मार्क्स को लेकर थोड़ी कंजूसी बरती गई थी और ये तर्क यकीन करने लायक नहीं लगा.

अपने दो जवाबों से मल्होत्रा ने अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार ली है, क्योंकि फ़ुटनोट और कोटेशन मार्क्स हर जगह इस्तेमाल किए जाते हैं.

वैसे भी मल्होत्रा का काम अंग्रेजी में प्रकाशित हो रहा है न कि संस्कृत में.

मल्होत्रा का मामला कई अन्य मुद्दों की ओर इशारा करता है.

'साहित्यिक चोरी का चलन'

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हॉवर्ड में विश्वनाथन से लेकर न्यूज़वीक में फ़रीद ज़कारिया तक, भारतीय प्रवासियों में बढ़ती साहित्यिक चोरी, मल्होत्रा के मामले तक फैल रही है.

ऐसा लगता है कि दौड़ में बने रहने के लिए वो आसान तरीक़ों पर भरोसा कर रहे हैं.

दूसरी बात, जब प्रवासी भारतीय जोर देते हैं कि आभार जताने के रूप में कोटेशन मार्क्स देना उनके लिए अनजानी और अजीब बात है तो यह सही नहीं लगता.

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Image caption राजीव मल्होत्रा भारतीय अमरीकी शोधकर्ता हैं और न्यूजर्सी में रहते हैं.

क्योंकि उससे संदेश जाता है ये लोग ग़ैर पढ़ लिखे हैं और हज़ारों भारतीय वैज्ञानिकों और विद्वानों के सम्मान पर धब्बा लगता है.

तीसरी बात ये कि, ख़ुद का बचाव करते हुए वो शोध के नियमों का न केवल उल्लंघन करते हैं बल्कि बौद्धिकता को लेकर भारतीय क़ानूनों के अलग होने का बहाना बनाते हैं.

'प्रमाना', 'करेंट साइंस', 'कांट्रीब्यूशन टू इंडियान सोशियोलॉजी' जैसे जर्नल ने समीक्षा और उद्धरण प्रक्रिया, दोनों में ईमानदारी का सबूत दिया है.

मल्होत्रा मौलिक तर्क देने की बजाय, आडंबरपूर्ण, रक्षात्मक और अनाड़ी बन रहे हैं.

असल में कुछ जगहों पर ये कहकर कि उन्होंने लेख में निकोल्सन का हवाला दिया है, वे इस बहस को पहले ही हार चुके हैं.

कभी कभी ईमानदारी में भी अपनी तरक़ीबें छिपी होती हैं. लेकिन इन तरक़ीबों को एक मूर्खता भरे मानवशास्त्र में लपेट कर, मल्होत्रा अपनी ही कोशिशों का सत्यानाश करते हैं.

नकल

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असल में, मल्होत्रा का मुद्दा बौद्धिक क्षेत्र में वैसा ही उबाल पैदा करता है जैसा व्यापमं धांधली बड़े पैमाने पर आम जनता में करती है.

परीक्षाओं में नकल करना आम बात हो चुकी है. नकल करना लोकतांत्रिक है, ये कहकर हम लोकतंत्र का अपमान करते हैं.

यह हमारी शोध व्यवस्था की जड़ों को उजागर करता है, जहां डिग्रियां फ़र्जी हैं और साहित्यिक चोरी आम बात है.

कुछ दशक पहले विज्ञान पर आई रिपोर्ट याद आती है, जिसमें प्रयोगशालाओं के कुछ निदेशकों ने अपने ही सहकर्मियों के कामों को अपने नाम कर लिया था.

यह ऐसा मुद्दा है कि हमें इसका विरोध करना ही होगा. सिर्फ ये शिकायत करना कि भारतीय संस्थाओं की बढ़िया रैंकिंग नहीं है, इस समस्या से निजात पाने का रास्ता नहीं है. अब समय आ गया है कि आलोचक तीखी आलोचना करें.

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