ज़किया जाफ़री: अगली सुनवाई 4 अगस्त को

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गुजरात दंगों(2002)के दौरान गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दिए जाने के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर अगली सुनवाई अब चार अगस्त को होगी.

साल 2002 में गुजरात के गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड में कांग्रेसी सांसद एहसान जाफ़री समेत 69 लोग मारे गए थे.

गुजरात हाई कोर्ट में सोमवार को इस मामले की सुनवाई होने वाली थी. हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए चार अगस्त की तारीख़ तय की है.

एहसान जाफ़री की पत्नी ज़किया जाफ़री ने गुलबर्ग हत्याकांड मामले में निचली अदालत के फ़ैसले को चुनौती दी थी.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गुजरात दंगों से जुड़े कुछ मामलों में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया था.

एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में मौजूदा प्रधानमंत्री और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दूसरे कई संदिग्धों को क्लीन चिट दी थी. निचली अदालत के फ़ैसले में एसआईटी की इस रिपोर्ट का समर्थन किया गया था.

इससे पहले हाईकोर्ट के फ़ैसले में अनुवाद की गड़बड़ी के कारण सुनवाई स्थगित कर दी गई थी.

फ़ैसले के ख़िलाफ़

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Image caption गुलबर्ग सोसायटी हत्याकांड मामले में एहसान जाफरी समेत 68 लोग मारे गए थे.

15 मार्च 2014 को ज़किया जाफ़री ने हाईकोर्ट में निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी.

उन्होंने आरोप लगाया कि निचली अदालत ने एसआईटी की क्लोज़र रिपोर्ट को 'बिना सोचे समझे' स्वीकार कर लिया है.

ज़किया ने 540 पेज की रिव्यू एप्लीकेशन में एसआईटी के जांच की आलोचना की थी और कहा था कि "मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने उन चिज़ों पर ध्यान नहीं दिया है जो पहली नज़र में साज़िश और उकसाने की प्रक्रिया में मोदी की भूमिका को साबित करता है."

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उन्होंने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि मजिस्ट्रेट ने अहम रिकॉर्डों में फेरबदेल के मायने और महत्व का मूल्यांकन सही से नहीं किया.

इन रिकॉर्डों में मीटिंग मिनट्स, पुलिस अधिकारियों के ड्राइवरों की लॉग बुक, पुलिस कंट्रोल रूम रिकॉर्ड्स, पुलिस एक्सचेंज रिकॉर्ड्स, स्टेट इंटेलिजेंस रिकॉर्ड्स, होम डिपार्टमेंट रिकॉर्ड्स शामिल है.

उन्होंने आगे यह भी कहा है कि मजिस्ट्रेट ने इस नतीजे पर पहुंचने में भी ग़लती की है कि 27 फ़रवरी 2002 की मीटिंग में संजीव भट्ट और हरेन पंड्या मौजूद नहीं थे.

उन्होंने अपनी याचिका में तीन गवाहों संजीव भट्ट, आरबी श्रीकुमार और राहुल शर्मा का ज़िक्र किया है और कहा है कि इन तीनों अधिकारियों ने इस बात का प्रमाण दिया है कि अभियुक्त साज़िश में शामिल थे और कई मामलों में इनकी स्पष्ट भूमिका थीं.

ज़किया का कहना है कि इन गवाहों की सच्चाई की जांच केवल आपराधिक मुक़दमे के दौरान हो सकती थी. ऐसी स्थिति में उनपर यक़ीन नहीं करने की कोई वजह नहीं थी.

कब-कब, क्या-क्या हुआ

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27 फ़रवरी, 2002: गुजरात में गोधरा ट्रेन हत्याकांड

फ़रवरी से मई, 2002: गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में दंगे

28 फ़रवरी, 2002: गुलबर्ग सोसायटी में भीड़ के द्वारा आग लगाई गई. इसमें 69 लोगों की जान गई जिसमें एहसान जाफ़री भी शामिल थे.

8 जुन, 2006: एहसान जाफ़री की बीवी ज़किया जाफ़री ने शिकायत दर्ज करते हुए पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिस नरेंद्र मोदी और 62 अन्य लोगों पर एफ़आरआई दर्ज नहीं कर रही है.

हालांकि पुलिस ने शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया.

3 नवंबर, 2007: गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी याचिका सुनने से इंकार कर दिया.

26 मार्च, 2008: सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के नौ मामलों में फिर से जांच करने के आदेश दिए और सीबीआई के पूर्व निदेशक डॉक्टर आर के राघवन के नेतृत्व में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया.

मार्च, 2009: सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को ज़किया की शिकायत देखने को कहा.

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सितंबर, 2009: सुप्रीम कोर्ट ने गुलबर्ग सोसायटी मामले की सुनवाई पर से रोक हटा ली.

27 मार्च, 2010: एसआईटी ने मोदी को समन भेजा.

14 मई, 2010: एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी और कहा कि आरोपों की पुष्टि के लिए कोई सबूत नहीं मिला है.

11 मार्च, 2011: सुप्रीम ने एसआईटी को एमिकस क्युरी राजू रामचंद्रन की ओर से उठाए जा रहे संदेहों की जांच करने को कहा.

18 जून, 2011: रामचंद्रन अहमदाबाद गए और एसआईटी की रिपोर्ट पर अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए सबूतों की पड़ताल की.

25 जुलाई, 2011: रामचंद्रन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में उन्होंने एसआईटी की रिपोर्ट से अलग अपनी राय रखी और कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर उपलब्ध सबूतों के आधार पर मुक़दमा चलाया जा सकता है.

28 जुलाई, 2011: सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट को गोपनीय रखने का फ़ैसला लिया और गुजरात सरकार और एसआईटी को रिपोर्ट देने से मना कर दिया.

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12 सितंबर, 2011: सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि एसआईटी की फ़ाइनल रिपोर्ट के बाद ही मोदी और दूसरों पर जांच संबंधी फ़ैसला लिया जा सकता है.

8 फ़रवरी, 2012: एसआईटी ने निचली अदालत के सामने रिपोर्ट पेश की.

9 फ़रवरी, 2012: ज़किया जाफ़री और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने रिपोर्ट के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. एसआईटी ने इसपर आपत्ती जताते हुए दलील दी कि जब तक पूरी रिपोर्ट नहीं दी जाती है तब तक रिपोर्ट नहीं दी जाए.

15 फ़रवरी, 2012: मेट्रोपोलिटन कोर्ट मजिस्ट्रेट ने एसआईटी को पूरी रिपोर्ट सौंपने को कहा.

15 मार्च, 2012: एसआईटी ने पूरी रिपोर्ट और केस के काग़ज़ात सौंपे.

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10 अप्रैल, 2012: निचली अदालत में एसआईटी ने संदिग्धों के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत न होने के आधार पर केस को बंद करने की अपील की. कोर्ट ने एसआईटी को एक महीने के अंदर ज़किया को रिपोर्ट मुहैया कराने को कहा.

अप्रैल 2013: ज़किया जाफ़री ने मेट्रोपोलिटन कोर्ट में एसआईटी की क्लीन चिट के विरोध में याचिका दायर की.

अक्तूबर 2013: निचली अदालत ने एसआईटी की रिपोर्ट को मान लिया.

26 दिसंबर, 2013: निचली अदालत ने ज़किया जाफ़री की याचिका पर आदेश दिया. मोदी के ख़िलाफ़ कोई भी मामला नहीं दर्ज किया गया.

15 मार्च, 2014: ज़किया जाफ़री ने निचली अदालत के फ़ैसले को ख़ारिज करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट में रिवीज़न एप्लीकेशन दायर किया.

27 जुलाई, 2015: दो बार टालने के बाद हाई कोर्ट ने ज़किया जाफ़री की याचिका पर सुनवाई करने का फ़ैसला लिया.

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